चार करोड़ का ट्रामा सेंटर बनकर रह गया सिर्फ आर्थो वार्ड

ट्रामा सेंटर में न हुई डॉक्टरों की कमी पूरी, न आए संसाधन, इम्प्लांट, डिजिटल एक्स-रे, सोनोग्राफी की भी जरूरत ट्रामा को, एनेस्थेटिक नहीं होने से कई बार टालने पड़ रहे ऑपरेशन

ऑनलाइन खबर : विशाल यादव
बड़वानी. जिले में नेशनल और स्टेट हाईवे पर होने वाली दुर्घटनाओं में गंभीर घायलों को तुरंत बेहतर इलाज मिल सके इसके लिए ट्रामा सेंटर खोला गया था। दो साल पहले चार करोड़ से ज्यादा की लागत से बना ट्रामा सेंटर संसाधनों के अभाव में सिर्फ आर्थो (हड्डी) वार्ड बनकर रह गया है। ट्रामा बनने के बाद जिम्मेदारों द्वारा बेहतर सुविधाओं के दावे किए गए थे। अब तक यहां ट्रामा सेंटर में लगने वाले पूरे संसाधन और डॉक्टर व स्टाफ की पदपूर्ति ही नहीं हो पाई है। एनेस्थेटिक के अभाव में यहां कई बार ऑपरेशन भी टालना पड़ रहे हैं।
जिला अस्पताल परिसर में 4 करोड़ 44 लाख 8 6 हजार रुपए की लागत से बने ट्रामा सेन्टर का लोकार्पण 2016 में किया गया था। जिसे लेकर बड़ी-बड़ी बातें की गई थी, लेकिन दो साल में उन दावों की हवा निकलनी शुरू हो गई। ट्रामा सेंटर में आज तक डिजिटल एक्स-रे मशीन नहीं लग पाई है। अभी भी यहां भर्ती मरीजों को एक्स-रे के लिए जिला अस्पताल तक ले जाना पड़ता है। सबसे ज्यादा परेशानी गंभीर रूप से घायलों की होती है। स्ट्रेचर पर उबड़-खाबड़ रास्ते पर मरीज का दर्द दो-गुना हो जाता है।वहीं, ट्रामा में इम्प्लांट की व्यवस्था भी नहीं है। हड्डी टूटने पर डाली जाने वाली राड, प्लेट, स्क्रु आदि के लिए इंदौर ही भेजना पड़ता है। यहां कायदे से सोनोग्राफी मशीन भी होना चाहिए, जो कि नहीं है।
स्टाफ की भी कमी
ट्रामा सेंटर भवन निर्माण में भले ही करोड़ो रुपए खर्च कर दिए गए हो, किन्तु यहां पर उपचार कराने के लिए आने वाले मरीजों व घायलों के लिए स्टाफ की पूर्ति अब तक नही हो पाई है। शासन के निदेर्शानुसार ट्रामा सेंटर में मेडिकल विशेषज्ञ, शल्य क्रिया विशेषज्ञ, निश्चेतना विशेषज्ञ, अस्थि रोग विशेषज्ञ, चिकित्सा अधिकारी, स्टाफ नर्स, रोडियोग्राफर, लेब टेक्नीशियन, ओटी टेक्नीशियन, ड्रेसर ग्रेड़-2, वार्ड बाय, वाहन चालक व सफाई कर्मचारी के पद स्वीकृत है। अधिकारियों की माने तो 5 मेडिकल विशेषज्ञ व एक सर्जिकल विशेषज्ञ ही उपलब्ध है, बाकी सभी पद रिक्त पड़े हुए है। ऐसे में यहां पर उपचार के लिए आने वाले मरीजों को किस तरह से इलाज मिलेगा इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है।
दो साल में बिल्डिंग की हालत खराब
दो साल पहले करोड़ों की लागत से बने ट्रामा सेंटर के अंदर देखकर लगता नहीं कि ये बिल्डिंग नया बना हुआ है।दीवारों और पिल्लरों की टाइल्स उखड़कर गिरने लगी है। यहां लगे इलेक्ट्रानिक बोर्ड भी टूट चुके है, जिससे कभी भी किसी को करंट लगने का खतरा भी बना हुआ है। ट्रामा के अंदर की दीवारें स्वच्छता अभियान की भी धज्जियां उड़ा रही है। यहां जगह-जगह लोगों न थूककर पीकदान बना रखा है।यहां हो रही टूट-फूट के सुधार के लिए जिम्मेदार विभाग एक दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे है। बिल्डिंग का निर्माण आरईएस विभाग ने किय था। मरम्मत के लिए आरईएस इसे पीडब्ल्यूडी का काम बता रहा है। जबकि पीडब्ल्यूडी का कहना है कि ये भवन उनकी आरसी बुक में नहीं है। ऐसे में ट्रामा की बिल्डिंग की देखभाल कौन करेगा ये एक सवाल बनकर रह गया है।
ऑपरेशन के लिए हो रही परेशानी
जिला अस्पताल में तीन एनेस्थेटिक है, जो मुख्य ओटी और महिला ओटी में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। ट्रामा का अपना कोई एनेस्थेटिक नहीं है, जिला अस्पताल के डॉक्टर्स को समय मिलने पर यहां ऑपरेशन होते है। कईबार तो ऑपरेशन टालने भी पड़ते है। डॉक्टर्स और स्टाफ की कमी को लेकर प्रशासन को कईबार अवगत कराया जा चुका है।
डॉ. अवधेश स्वर्णकार, ट्रामा सेंटर प्रभारी

मनीष अरोड़ा Bureau Incharge
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