30 अक्टूबर 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

बॉक्सिंग का जुनून: दो बार चोटलगने पर कोमा में रही लेकिन नहीं मानी हार

-बॉक्सिंग कोच मनीषा चाहर की सफलता की कहानी, अब भी बच्चों को दे रही निशुल्क प्रशिक्षण, पति डॉ.राकेश चाहर ने निभाईगुरू की भूमिका
2 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

भरतपुर

•

image

Meghshyam Parashar

•

Updated: 26 Mar 2021, 4:28 PM IST

बॉक्सिंग का जुनून: दो बार चोटलगने पर कोमा में रही लेकिन नहीं मानी हार

बॉक्सिंग का जुनून: दो बार चोटलगने पर कोमा में रही लेकिन नहीं मानी हार

भरतपुर. बॉक्सिंग के लिए इतना जुनून हर किसी में बमुश्किल ही देखने को मिलता है। इसमें मनीषा चाहर की कहानी भी प्रेरणा से कम नहीं है। दो बार प्रशिक्षण के दौरान चोटलगने पर वह करीब 10 से भी अधिक दिन तक बेहोश रही, लेकिन कभी हार नहीं मानी। मेहनत ही सफलता की कुंजी है यह कहावत सत्य है कि कोई भी व्यक्ति मेहनत करके अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। यह कहना है राजस्थान पुलिस की बॉक्सिंग कोच मनीषा चाहर का।
मनीषा वर्ष 2008 में सामान्य परीक्षा पास कर पुलिस में कांस्टेबल पद पर भर्ती हुई। उन्होंने अपने स्कूल के समय में कभी कोई स्पोट्र्स नहीं किया। इनके पति सैनिक स्कूल के पूर्व छात्र रहे एवं नेशनल स्तर के बॉक्सिंग खिलाड़ी रहे हैं और वर्तमान में आगरा में शिक्षा विभाग में प्रधानाध्यापक पद पर कार्यरत हैं। वर्ष 2010 में शादी के बाद मनीषा ने पति राकेश चाहर से प्रेरणा लेकर बॉक्सिंग खेल के अभ्यास में पूरी लगन व मेहनत से जुट गई। उनके पति ही उनके प्रारम्भिक प्रशिक्षक तथा बॉक्सिंग कोच रहे हैं। उन्होंने पति से ही बॉक्सिंग का प्रशिक्षण लिया है। दो बच्चों की देखभाल करने के साथ बॉक्सिंग खेल का अभ्यास करना जैसा कठिन कार्य जारी रखा। शुरुआती वर्षों में राजस्थान पुलिस की महिला खिलाड़ी न के बरावर थीं एवं खेल सुविधाएं भी नगण्य थीं। वर्ष 2010 से 2014 तक चार बार अखिल भारतीय पुलिस बॉक्सिंग प्रतियोगिताओं में कड़ी मेहनत के बाद भी वो पदक जीतने में असफल रहीं, लेकिन उन्होंने हिम्मत और मेहनत को नहीं छोड़ा। कहा जाता है कि 'मन के हारे हार है और मन के जीते जीतÓ। उन्होंने अपने आत्म विश्वास को डगमगाने नहीं दिया। वर्ष 2015 में मधुबन (हरियाणा) और वर्ष 2016 में कोलकाता (पश्चिम बंगाल) में आयोजित ऑल इण्डिया पुलिस वूशू प्रतियोगिताओं में लगातार दो कांस्य पदक जीते इसके बाद वर्ष 2017 में पूना (महाराष्ट्र) में आयोजित ऑल इण्डिया पुलिस बॉक्सिंग प्रतियोगिता में रजत पदक तथा वर्ष 2018 में जयपुर में आयोजित ऑल इण्डिया पुलिस बॉक्सिंग प्रतियोगिता में कांस्य पदक प्राप्त किया। इस पर इन्हें गैलेन्ट्री प्रमोशन के अलावा तीन बार राजस्थान पुलिस डीजीपी की ओर से तीस-तीस हजार रुपए कैश रिवार्ड भी दिया गया। इसके बाद वर्ष 2019 में एनआइएस करने के लिए एन्ट्रेन्स एग्जाम श्रेष्ठ अंकों से उत्तीर्ण कर वर्ष 2020 में पटियाला (पंजाब) स्थित स्पोटर््स अथॉरिटी ऑफ इण्डिया की नेताजी सुभाष नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोटर््स से बॉक्सिंग खेल में एक वर्षीय एनआइएस डिप्लोमा पूरा किया। मनीषा के मार्च 2017 और जनवरी 2019 में प्रेक्टिस के दौरान सिर में गम्भीर चोट लगने से कई दिनों तक कोमा में रहीं, इससे चिकित्सकीय कारणवश इनकी प्रेक्टिस प्रभावित हुई और दोनों बार ऑल इण्डिया पुलिस बॉक्सिंग प्रतियोगिताओं में स्वर्ण पदक जीतने से वंचित रहीं। लेकिन गत वर्ष एनआइएस डिप्लोमा कर बॉक्सिंग कोच बनने का सपना पूरा हुआ। आज वो पुलिस विभाग में बॉक्सिंग कोच के रूप में अपनी सेवाएं दे रही हैं। पुलिस के खिलाडियों के साथ-साथ छोटे बच्चों एवं महिला मुक्केबाजों को लोहागढ स्टेडियम में नियमित प्रशिक्षण करा रही हैं।

बोलीं...बेटियां किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं

मनीषा चाहर ने कहा कि समाज में बेटियां का दर्जा बढ़ा है। अब बेटियों को किसी से कम नहीं माना जा रहा। बेटियों को भी अधिकार मिलने लगे हैं। आज बेटियां किसी से कम नहीं हैं। खेल के क्षेत्र में ही अब लड़कियों ने वर्चस्व कायम किया है। खेल में ग्रामीण प्रतिभाओं को भी तराशने की आवश्यकता है। क्योंकि उन्हें बहुत कम मौके मिल पाते हैं।

बड़ी खबरें

View All

भरतपुर

राजस्थान न्यूज़

ट्रेंडिंग