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महंगाई की मार और टैक्स की धार: क्यों सिमट रही मध्यम वर्ग की थाली?

आय अठन्नी-खर्चा रुपैया: होम लोन की ईएमआई और बच्चों की फीस में दब रहा 'आम आदमी', बजट से फिर वही पुरानी उम्मीदें

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The impact of inflation and the torrent of taxes: Why is the middle class's plate shrinking?

The impact of inflation and the torrent of taxes: Why is the middle class's plate shrinking?

देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाने वाला 'मध्यम वर्ग' आज एक अजीब से आर्थिक चक्रव्यूह में फंसा महसूस कर रहा है। एक तरफ आसमान छूती महंगाई है, तो दूसरी तरफ स्थिर आय और टैक्स का भारी बोझ। स्थिति यह है कि मध्यम वर्ग की थाली से न केवल दाल-सब्जी का जायका कम हुआ है, बल्कि बचत के नाम पर केवल 'शून्य' हाथ लग रहा है। राजस्थान पत्रिका के इस विश्लेषण में समझिए कि आखिर क्यों इस बजट से पहले मध्यम वर्ग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है।

महंगाई बनाम आय: कमाई से तेज भाग रहे खर्चे

पिछले कुछ वर्षों में औसत आय में होने वाली वृद्धि की तुलना में खाद्य पदार्थों और आवश्यक सेवाओं की दरें दोगुनी गति से बढ़ी हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च अब विलासिता बनता जा रहा है। दाल, तेल और मसालों की बढ़ती कीमतों ने रसोई का बजट 25 से 30 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है। निजी क्षेत्र में सालाना वेतन वृद्धि महंगाई दर के मुकाबले ऊंट के मुंह में जीरे के समान है।

लोन के 'जाल' में उलझा आशियाना और भविष्य

मध्यम वर्ग का सबसे बड़ा सपना 'अपना घर' और 'बच्चों की उच्च शिक्षा' है, लेकिन यही दोनों अब सबसे बड़ा बोझ बन गए हैं। रेपो रेट में उतार-चढ़ाव के कारण होम लोन की ईएमआई बढ़ गई है। एक औसत परिवार की आय का 40 प्रतिशत हिस्सा केवल बैंक की किस्तों में जा रहा है। पढ़ाई महंगी होने के कारण एजुकेशन लोन लेना मजबूरी है। इसकी ऊंची ब्याज दरें युवाओं के करियर की शुरुआत को ही कर्ज के तले दबा रही हैं।

टैक्स स्लैब: राहत की उम्मीद, पर मिला 'झुनझुना'

पिछले बजट में 'न्यू टैक्स रिजीम' को बढ़ावा दिया गया, लेकिन 'ओल्ड रिजीम' में निवेश के जरिए मिलने वाली छूट (80सी आदि) में कोई बदलाव नहीं हुआ। लंबे समय से इसमें बड़ी बढ़ोतरी की मांग हो रही है, ताकि हाथ में आने वाला पैसा बढ़ सके। वही 5 लाख से 7 लाख तक की रिबेट तो मिली, लेकिन 10 लाख से ऊपर की आय वालों के लिए टैक्स का बोझ जस का तस है।

पिछले बजट की 'टीस'

मध्यम वर्ग को उम्मीद थी कि सरकार कुछ बड़े लोकलुभावन कदम उठाएगी, लेकिन पिछले बजट में यह उम्मीदें पूरी नहीं हुईं। पिछले एक दशक से इसकी 1.5 लाख की सीमा नहीं बढ़ी। इससे बचत को प्रोत्साहन नहीं मिल रहा। ईंधन की कीमतों में बड़ी राहत न मिलने से लॉजिस्टिक्स और दैनिक आवागमन महंगा बना रहा।

थाली सिकुड़ने के कई कारण

थाली सिकुड़ने के कई कारण है। मध्यम वर्ग आज टैक्स पेयर तो है, लेकिन बेनेफिशियरी (लाभार्थी) नहीं। हम सिस्टम को पैसा देते हैं, लेकिन जब सुविधा की बात आती है, तो हमें 'संपन्न' मानकर हर सरकारी योजना से बाहर कर दिया जाता है।

नीरज शर्मा, शिक्षक