रियल स्टोरी: इस डाकू की फटकार से कांप गया था ‘शोले का ठाकुर’, कहलाता था चंबल का शेर

छह फीट लंबा कद,चेहरे से बाहर निकलती मूंछे और खाकी वर्दी। एक हाथ में अमेरिकन सेल्फ लोडि़ंग राईफल तो दूसरे हाथ में लाऊडस्पीकर। सालों तक ये चेहरा चंबल के इलाकों में खौंफ की तस्वीर बना रहा।

By: दीपेश तिवारी

Published: 15 Apr 2017, 03:07 PM IST


भोपाल। मध्यप्रदेश के चंबल, शिवुपरी, मुरैना, चित्रकूट, रीवा के इलाकों में कई दशकों तक डाकुओं का खौफ रहा है। कहा जाता है कि पहले ये दस्यु बागी कहलाते थे और इनका काम सिर्फ डकैती करना था। धीरे-धीरे पैटर्न बदलता गया और इन डाकुओं ने अपहरण का काम शुरू कर दिया। ये राजनीति और जमीनी झगड़ों के निपटारे में लग गए। 

इन्हीं में से एक था मलखान सिंह, जो किसी जमाने में चंबल का शेर कहलाता था। उस पर हत्याओं और डकैती के हजारों मामले दर्ज थे। डेढ़ दशक से अधिक समय तक चंबल घाटी में आतंक मचाने के बाद मलखानसिंह ने 32 साल पहले अर्जुन सिंह सरकार के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया था और अब वे बंदूक छोड़ आध्यात्मिक मार्ग अपना चुके हैं।





दरअसल मलखान सिंह के डकैत और फिर डकैत से सामान्य आदमी बनने की कहानी दिलचस्प है। मलखान सिंह ने अपने गांव के सरपंच पर आरोप लगाया था कि उसने मंदिर की जमीन हड़प ली। युवा मलखान ने जब इस घटना का विरोध किया तो सरपंच ने उसे गिरफ्तार करवा दिया और उसके मित्र की हत्या करवा दी।

माना जाता है कि वह सरपंच एक मंत्री का करीबी था और पुलिस उस तक नहीं पहुंच सकती थी। विरोध स्वरूप मलखान सिंह ने राइफल उठा ली और खुद को बागी घोषित कर दिया। मंदिर की 100 बीघा जमीन को मंदिर में मिलाने के लिए उन्होंने हथियार उठाए थे। उस दौरान वे पंच भी थे। कहा जाता है कि पूर्व डाकू मलखान सिंह के गिरोह में करीब डेढ़ दर्जन लोग थे। गिरोह में शामिल लोग उनके गांव और आस- पास के इलाके में रहने वाले लोग थे। इस गिरोह पर 32 पुलिस वालों समेत 185 हत्याएं करने का आरोप था।

1980 के दशक में मलखान सिंह ने अपने गिरोह के अन्य साथियों के साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने आत्मसर्मपण कर दिया। 70 के दशक में चंबल घाटी के गांवों में आतंक का पर्याय बन चुके मलखान सिंह को पकडऩा पुलिस के लिए बहुत ही मुश्किल था। उससे भी ज्यादा उसे पकडक़र जेल में रखना मुश्किल था। मलखान ने करीब 1983 तक चंबल घाटी पर राज किया। आत्मसर्मपण के बाद उसे भूदान आन्दोलन के तहत मिली जमीन भी दी गई, ताकि वह सामान्य आदमी के रूप में अपना गुजर-बसर कर सके।  






मलखान सिंह ने पंचायत चुनाव लड़ा था और इसमें जीत भी हासिल की  थी। वहीं वर्ष 2014 के चुनावों में मलखान ने भारतीय जनता पार्टी और नरेन्द्र मोदी के पक्ष में यह कहते हुए चुनाव प्रचार किया था कि वह कांग्रेस के राज में डकैत बनने के लिए बाध्य हुआ था।

बागी हैं हम, कोई डाकू नहीं...
साढ़े तीन दशक पहले चंबल के बीहड़ में आतंक फैलाने वाले मलखानसिंह खुद को डाकू कहना गलत बतलाते हैं। मलखान सिंह के अनुसार वे अन्याय के खिलाफ बगावत करते हुए बागी हुए थे। 




संजीव कुमार को भी लौटा दिया था 
अभिनेता संजीव कुमार मलखान सिंह के जीवन पर फिल्म बनाना चाहते थे, लेकिन वे फिल्म में घोड़े और शराब के दृश्य रखना चाहते थे, पर हकीकत इससे कहीं अलग थी। बीहड़ में 500-500 फीट तक के गड्ढे हैं। यहां घोड़े दौड़ नहीं सकते। बागी रहते मलखान खुद हफ्ते-हफ्ते भूखे रहे। ऐसे में घोड़े को चना-चारा कहां से खिलाते, इसलिए उन्होंने डायरेक्टर मुकेश चौकसे को मना किया और अभिनेता संजीव कुमार दृश्य नहीं शूट कर सके।




नोटबंदी के दौरान लगे लाइन में....
कहा जाता है कि पहले आमतौर पर मलखान सिंह जिधर से भी गुजरता था, वहां से लोग भाग खडे होते थे। इसके बाद आत्मसम्र्पण के चलते धीरे-धीरे मानसिंह की छवि लोगों के बीच में सेलिब्रिटी की हो गई, लेकिन अक्टूबर 2016 में नोटबंदी के दौरान जब वह अपने नोट बदलवाने ग्वालियर के महाराज बाड़ा स्थित एसबीआई की मुख्य शाखा पर पहुंचे तो भीड में से इस बार कोई मलखान के लिए नहीं हटा। यहां उसे घंटों रुपए बदलवाने के लिए शांति से लाइन में खड़े रहना पड़ा। कंधे पर लटकी बंदूक भी इस समय लोगों को डराने का काम नहीं कर सकी। 



malkhan in politics

एक ओर जहां 70-80 के दशक में मलखान और कई राज्यों की पुलिस के बीच टकराव होता रहता था और दोनों ओर से फायरिंग में लोग मारे भी गए थे। वहीं नोटबंदी के दौरान पुलिस भी मलखान सिंह के साथ हंस-हंस कर बात करती दिखी। 

चंबल में खौफ की तस्वीर...
छह फीट लंबा कद, चेहरे से बाहर निकलती मूंछे और खाकी वर्दी। एक हाथ में अमेरिकन सेल्फ लोडि़ंग राईफल तो दूसरे हाथ में लाऊडस्पीकर। सालों तक ये चेहरा चंबल के इलाकों में खौंफ की तस्वीर बना रहा। अपहरण, लूट, डकैती, हत्या और हत्या के प्रयास के सैकड़ों मामले मलखान सिंह के सिर पर रहे, लेकिन मलखान सिंह उस समय भी बीहड़ों में बेखौंफ घूमता रहा। 



कहा जाता है कि मलखान सिंह ने शुरूआत तो की गांव की दुश्मनी में अपनी जान बचाने से, लेकिन जल्दी ही चंबल में लोग उसके नाम से थर्राने लगे। पुलिस के साथ आधार दर्जन मुठभेड़ों के बीच जिंदा बचा रहे मलखान सिंह को चंबल में हीरो का दर्जा हासिल हो गया। 
पुलिस उसके पीछे लगी रही, लेकिन मलखान तो दूर की बात है उसकी परछाईं को भी पुलिस कभी छू नहीं पाई। मलखान सिंह के नाम पर सैकडों मुकदमे पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हं,ै तो ऐसे मामलों की संख्या भी कम नहीं जिसमें मलखान के खौंफ के चलते लोगो ने पुलिस में मामला दर्ज कराने की जरूरत तक महसूस नहीं की।  



डकैतों की परंपरा का आखिरी दस्यु सम्राट...
चंबल में आतंक बना मलखान, कभी भी स्वयं पर आरोप लगाने वाले सरपंच को नहीं भूला। इस सरपंच की तलाश में मलखान चंबल की खाक छान रहा था। लेकिन सरपंच को पुलिस ने जालौन में एक अभेद सुरक्षा कवच में रखा हुआ था। मलखान सरपंच से बदला लेने के लिए छटपटा रहा था। 
मलखान सिंह की छवि एक अलग तरह के दस्यु सरगना की बन चुकी थी। चंबल के उसूलों वाले डकैतों की परंपरा के आखिरी दस्यु सम्राट कहलाना मलखान को पंसद था। 





चंबल में मलखान का एक किस्सा बेहद चर्चित है जिसमें कहा जाता है कि एक बार उसके जानीदुश्मन सरपंच की लडक़ी को गांव आते समय मलखान गिरोह के सदस्यों ने पकड़ लिया था तो उन्होंने पूरे गिरोह को फटकार लगाई थी और पैर छूने के साथ-साथ भेंट देकर लडक़ी को विदा किया था। 
गैंग के लोगों को भी इस बात की सख्त हिदायत दी हुई थी कि किसी भी औरत या बहू-बेटी से बदतमीजी ना हो और यदि कोई गैंग मेंबर इस तरह की किसी हरकत में शामिल होता था तो उसकी सजा सिर्फ मौत तय थी। ऐसे में मलखान को चंबल के गांव में हीरो की इमेज मिल चुकी थी। गांव-गांव में मलखान को दद्दा के नाम से पुकारा जाने लगा था।

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दीपेश तिवारी
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