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संगीत के सुरों ने बदल दी जिंदगी

संगीत ने बनाया ऑटिज्म पीडि़त लडक़ी को सक्षम, दस भाषाओं में गाने के दक्ष, राष्ट्रीय बाल श्री आवॉड सम्मान प्राप्त करने के साथ निकाला अपना एलबम...

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संगीत के सुरों ने बदल दी जिंदगी

भोपाल . मैं आम बच्चों जैसी नहीं हूं। मुझे मंदबुद्धि कहा जाता है। लेकिन गुरुजी, माता-पिता और ईश्वर के आशीर्वाद से मैं अपना मुकाम बनाऊंगी। मेरी जिद है कि मैं एक दिन लता जी के साथ गाऊं। बड़ी गायिका बनूं। मुझे किसी की मदद नहीं चाहिए। मैं भी आपकी तरह सामान्य हूं, मुझे सहानुभूति नहीं आपका प्यार चाहिए।


यह कहते-कहते रूचिका की आंखे भर आर्इं। वो पीड़ा, समाज से मिलना वाला दूसरे दर्जे का व्यवहार सामने उभर आया जो उसने बचपन से देखा और झेला। मगर वो दूसरे पल संभलते हुए बोली मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं। मैं तो बस संगीत के साथ जीना चाहती हूं।

जिसे दुनिया ने पत्थर समझा, जब वो तराशा गया तो हीरा निकला....
बचपन से वो कम बोलती थी, दिमागी तौर पर अविकसित। टीचर कहती थी कि बच्ची हाइपरएक्टिव है, लेकिन वह तो अपने अंदर ही कुछ खोज रही थी। ऑटिज्म से पीडि़त। मां से कहती थी कि एक दिन मुझे पूरी दुनिया जानेगी। संगीत में राष्ट्रीय स्तर के अवॉर्ड समेत दर्जनों अवॉर्ड हासिल कर चुकी रूचिका न केवल 10 भाषाओं में गा रही है, बल्कि धु्रपद गायन, शास्त्रीय संगीत, गजल, भजन और बॉलीवुड गीतों पर भी समान अधिकार के साथ देश के नामी मंचों पर परफार्म कर रही है।


रूचिका को समाज ने मानसिक विकलांग कहा था, वो न बोल पाती थी, न नजरें मिला पाती थी, हमेशा हंसी का पात्र बनना मजबूरी सी हो गई थी, लेकिन संगीत की ताकत से रूचिका ने न केवल ऑटिज्म जैसी बीमारी पर जीत हासिल की, बल्कि वह 10 भाषाओं में पकड़ बनाने में कामयाब हुई। रूचिका को नई दिल्ली में राष्ट्रीय बालश्री अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है। रूचिका का म्यूजिक एलबम कहना चाहूं कह न सकूं भी रिलीज हो चुका है।

अब डर नहीं लगता....

रूचिका ने बताया कि संगीत का शौक मुझे बचपन से था। बड़ी दीदी भूमिका को गाते हुए देखती थी। मैं हाइपरएक्टिव थी। जब कई स्कूलों में एडमिशन लेने गई तब मुझे कई स्कूलों ने पागल कहकर निकाला। साथ ही बच्चे मुझे मारते थे, छेड़ते थे, मेरी क्या गलती थी। मुझे समझ नहीं आता था।

कई स्कूलों ने निकाला मुझे। मेरी मम्मी कर्इं दिनों तक स्कूल में मेरे साथ बैठती थी। मैं स्कूल जाने के नाम से डरने लगी थी, लेकिन मुझे पढऩा अच्छा लगता था। फिर मेरी दीदी भूमिका ने मुझे संगीत गुरूओं के बारे में बताया। काफी चक्कर लगाने के बाद वे मुझे संगीत सिखाने के लिए तैयार हुए। मुझे बालश्री अवॉर्ड मिला। अब मुझे डर नहीं लगता। मेरे संगीत के कारण अब सब मुझे प्यार करते हैं। मैंने नौवीं तक पढ़ाई की। अब पूरी तरीके से संगीत की तालीम ले रही हूं।

ये हैं खूबियां
.मैंने 6 साल की उम्र में पहली बार सरस्वती वंदना गई थी।
.मैं कन्नड़, तमिल, हिंदी, अंग्रेजी, पंजाबी, मराठी, बांग्ला, गुजराती, हरियाण्वी और उडिय़ा में गा लेती हूं। यह सभी भाषाएं टीवी चैनल में देखकर.सुनकर सीखी हैं।
.मैं हर चीज को देखते-देखते सीख जाती हूं। टीवी पर हर भाषा के चैनल देखती हूं। वहीं से गाने और भाषा सीखती हूं।