
भोपाल. ओलंपिक और अन्य बड़े आयोजनों के बाद खेलों को लेकर बड़ी बड़ी बातें की जाती हैं, लेकिन ऐसे बड़े इवेंट के बाद खेलों की चिंता करने की फुर्सत नहीं रहती। ऐसा ही हाल है केंद्र सरकार की एक योजना पायका (पंचायत युवा क्रीड़ा एवं खेल योजना) का। देहात के युवाओं की खेल में रुचि बढ़े और देश- विदेश में अपनी प्रतिभा दिखा सकें। इसके लिए योजना के तहत प्रदेश के हर ब्लॉक में इंडोर और आउटडोर स्टेडियम की योजना बनाई। इसमें खेल विभाग ने 4600 की आबादी वाले चयनित गांव में एक खेल मैदान निर्माण के लिए ब्लॉक स्तर पर पांच से सात एकड़ जमीन आवंटित कराई। हर मैदान के लिए ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (RES) और खेल विभाग ने 80-80 लाख रुपए का बजट दिया। योजना के अचानक बंद होने से स्टेडियम आधे अधूरे बन सके।
ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (Rural Engineering Service Madhya pradesh) ने इन आधे-अधूरे स्टेडियम को खेल विभाग (Sprots Department Madhya Pradesh ) के सुपुर्द करना चाहा तो मंत्री और पीएस स्तर से यह कहते हुए अधिपत्य लेने से इंकार कर दिया कि स्टेडियम की सुरक्षा के लिए चौकीदार और कोच स्टाफ आदि के पद स्वीकृत नहीं हुए। बिना स्टाफ स्टेडियम की देखरेख कैसे होगी। बाद में आरइएस ने पत्र लिखकर प्रदेश के 100 से ज्यादा आधे-अधूरे खेल मैदान पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग (panchayat and rural development department madhya pradesh) को सुपुर्द कर दिए। अब विभाग इनकी देखरेख नहीं कर पा रहा, ऐसे में ये स्टेडियम खंडहर हो गए या चारागाह और शराबियों का अड्डा बनकर रह गए। वहीं बच्चों के लिए मिला सामान भी गायब हो गया।
ऐसे समझें कहां क्या हुआ
रायसेन: सरपंच और सचिवों ने हड़पे उपकरण
जिले को एक करोड़ रुपए की खेल सामग्री मिली, जिसे स्कूलों में वितरित किया। एक साल खेल एवं युवा कल्याण विभाग ने इनकी मॉनिटरिंग की। इसके बाद पायका बंद होने से पंचायतों को मिली खेल सामग्री सरपंचों, सचिवों के हाथ लग गई। जिला अधिकारी खेल जलज चतुर्वेदी का कहना है कि योजना के चलने तक मॉनीटरिंग की गई। उसके बाद तो सामग्री ही नष्ट हो गई होगी। इस योजना से बच्चों को कितना लाभ मिला कहना मुश्किल है।
सीहोर में भैंसे चर रहीं
जिले के अल्हादाखेड़ी में बने खेल मैदान में अब भैंस चल रही हैं। जिला खेल अधिकारी अरविन्द इलियाजर का कहना है कि आधे अधूरे होने के कारण खेल विभाग ने ये स्टेडियम नहीं लिए। अभी इनकी देखरेख ग्राम पंचायत स्तर पर ही जा रही है। किसी दूसरी योजना से इनका जीर्णोंद्धार कर उपयोगी बनाया जा सकता है।
ऊबड़-खाबड़ जमीन पर चारदीवारी, वो भी ताले में
रायसेन जिले में सांची के आमखेड़ा में ऊबड़-खाबड़ जमीन पर चारदीवारी कर दी। वो भी अभी ताले में है, निर्माण के बाद से अब तक इस खेल मैदान का कभी उपयोग नहीं हो पाया। खिलाडिय़ों की पहुंच से दूर।
अपने दम पर खेलो और आगे बढ़ो
प्रदेश में खेलों के लिए सरकारी और संगठनों के स्तर पर प्रतियोगिताएं तो बहुत होती हैं, लेकिन ऐसी कोई योजना नहीं है, जो ग्रामीण प्रतिभाओं को निखार सके। वर्ष 2008-09 से 2014 तक पायका योजना में काम हुआ। फरवरी 2014 में यूपीए सरकार ने पायका योजना का नाम बदलकर राजीव गांधी खेल अभियान कर दिया, जो कुछ समय बाद बंद हो गई। योजना का नाम बदलने के बाद 2017 के बाद इस मद में कोई राशि नहीं मिली। अब खेलो इंडिया योजना शुरू हुई है, जो शुरुआती दौर में है।
योजना बंद हो चुकी है, इसलिए किसी का रुझान नहीं
जिलों के लिए केंद्र सरकार की पायका योजना बंद हो चुकी है। प्रदेश के कई जिलों में स्टेडियम समेत अन्य संसाधन होंगे, लेकिन उनके बारे में अब विभाग के पास कोई जानकारी नहीं है। मुझे तो उनको लेकर ज्ञान भी नहीं है। (यह पूछने पर कि आप भी तो जिले में पदस्थ रहे हैं, फिर भी जानकारी नहीं है) वर्ष 2018 के बाद से पायका को लेकर विभागीय स्तर पर कोई प्रक्रिया नहीं चल रही है।
- प्रदीप असथिया, सहायक संचालक, टीटी नगर स्टेडियम, भोपाल
Published on:
04 Mar 2022 07:58 pm

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