राजमाता ने लिखी थी ऐसी वसीयत, बेटा नहीं करेगा मेरा अंतिम संस्कार

आखिर राजमाता को ऐसा क्यों लिखना पड़ा। उनके एकमात्र बेटे माधवराव सिंधिया से उनके संबंध क्यों खराब हो गए थे। राजमाता विजयाराजे सिंधिया की पुण्य तिथि पर mp.patrika.com आपको बताने जा रहा है ग्वालियर राजघराने के कुछ किस्से....।


ग्वालियर राजघराने की राजमाता विजयाराजे सिंधिया की एक वसीयत ने सभी को चौंका दिया था। उन्होंने अपनी वसीयत में राजघराने की संपत्ति का बंटवारा नहीं किया था, उसमें लिखा था कि मेरा बेटा मेरा अंतिम संस्कार नहीं करेगा।

राजमाता विजयाराजे सिंधिया अपने ही इकलौते पुत्र कांग्रेस नेता रहे माधवराव सिंधिया से बेहद खफा थीं। कहा जाता था कि विजयाराजे का सार्वजनिक जीवन जितना ही प्रभावशाली और आकर्षक था, उनका व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन उतना ही मुश्किलों भरा था। राजमाता का देहांत 25 जनवरी 2001 को हो गया था। इसके बाद कुछ माह बाद ही 30 सितम्बर 2001 को उत्तरप्रदेश के मैनपुरी में हेलीकाप्टर दुर्घटना में माधवराव सिंधिया की मौत हो गई थी।

आखिर राजमाता को ऐसा क्यों लिखना पड़ा। उनके एकमात्र बेटे माधवराव सिंधिया से उनके संबंध क्यों खराब हो गए थे। राजमाता विजयाराजे सिंधिया की पुण्य तिथि 25 जनवरी पर mp.patrika.com आपको बताने जा रहा है ग्वालियर राजघराने के कुछ किस्से....।


क्यों कहा था- बेटा नहीं करेगा अंतिम संस्कार

विजयाराजे सिंधिया अपने इकलौते बेटे माधवराव सिंधिया से क्यों इतनी खफा थी कि उन्होंने 1985 में अपने हाथ से लिखी वसीयत में कह दिया था कि मेरा बेटा माधवराव सिंधिया मेरे अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हो। हालांकि 2001 में जब राजमाता का निधन हुआ तो मुखाग्नि माधवराव सिंधिया ने ही दी थी।

बेटे से मांगा था महल में रहने का किराया
विजयाराजे पहले कांग्रेस में थीं, लेकिन इंदिरा गांधी ने जब राजघरानों को ही खत्म कर दिया और संपत्तियों को सरकारी घोषित कर दिया तो उनकी इंदिरा गांधी से ठन गई थी। इसके बाद वे जनसंघ में शामिल हो गई थी। उनके बेटे माधवराव सिंधिया भी उस समय जनसंघ में शामिल हो गए थे, लेकिन वे कुछ समय ही रहे। बाद में उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया। इससे विजयाराजे अपने बेटे से काफी नाराज हो गई थी। उस समय विजयाराजे ने कहा था कि इमरजेंसी के दौरान उनके बेटे के सामने पुलिस ने उन्हें लाठियों से पीटा था। उन्होंने अपने बेटे तक पर गिरफ्तार करवाने का आरोप लगाया था। दोनों में राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता बढ़ने लगी थी और पारिवारिक रिश्ते खत्म होने लग गए थे। इसी के चलते विजयाराजे ने ग्वालियर के जयविलास पैलेस में रहने के लिए लिए अपने ही बेटे माधवराव से किराया भी मांगा था। हालांकि एक रुपए प्रति का यह किराया प्रतिकात्मक रूप से लगाया गया था।


बेटियों को दे दी सारी जायदाद
2001 में विजयाराजे का निधन हो गया था। उनकी वसीयत के हिसाब से उन्होंने अपनी बेटियों को काफई जेवरात और अन्य बेशकीमती वस्तुएं दी थीं। अपने बेटे से इतनी खफा थी कि उन्होंने अपने राजनीतिक सलाहकार और बेहद विश्वस्त संभाजीराव आंग्रे को विजयाराजे सिंधिया ट्रस्ट का अध्यक्ष बना दिया, लेकिन बेटे को बेहद कम दौलत मिली। हालांकि विजयाराजे सिंधिया की दो वसीयतें सामने आने का मामला भी कोर्ट में चल रही है। यह वसीयत 1985 और 1999 में आई थी।


एक बेटी राजस्थान की CM, दूसरी मध्यप्रदेश में मंत्री

विजयाराजे की शादी 1941 में ग्वालियर के महाराजा जीवाजीराव सिंधिया से हुई थी। उनके पांच बच्चे थे। एक बेटी वसुंधरा राजे राजस्थान की मुख्यमंत्री बनी। यशोधरा राजे MP में उद्योग मंत्री बनी। उनके बेटे माधवराव सिंधिया कांग्रेस सरकार में रेल मंत्री, मानव संसाधन विकास मंत्री रहे। 30 सितम्बर 2001 में उत्तरप्रदेश के मैनपुरी में हेलीकाप्टर दुर्घटना में उनकी मौत हो गई थी।

यह था राजमाता का असली नाम
सागर जिले में 12 अक्टूबर 1919 में राणा परिवार में जन्मी विजयाराजे के पिता महेन्द्र सिंह ठाकुर जालौन जिले के डिप्टी कलेक्टर हुआ करते थे। उनकी मां विंदेश्वरी देवी उन्हें बचपन से ही लेखा दिव्येश्वरी बुलाती थी। हिन्दू पंचांग के मुताबिक विजयाराजे का जन्म करवाचौथ को मनाया जाता है।




आठ बार रही सांसद
ग्वालियर के महाराजा जीवाजी राव सिंधिया से उनका विवाह 21 फरवरी 1941 को हुआ था। पति के निधन के बाद वे राजनीति में सक्रिय हुई थी और 1957 से 1991 तक आठ बार ग्वालियर और गुना से सांसद रहीं। 25 जनवरी 2001 में उन्होंने अंतिम सांस लीं।


आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में की पढ़ाई
महाराज माधवराव सिंधिया का जन्म 10 मार्च 1945 को हुआ था। माधवराव राजमाता विजयाराजे सिंधिया और जीवाजी राव सिंधिया के पुत्र थे। माधवराव ने सिंधिया स्कूल से शिक्षा हासिल की थी। उसके बाद वे ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी पढ़ने चले गए। माधवराव सिंधिया का नाम MP के चुनिंदा राष्ट्रीय राजनीतिज्ञों में काफ़ी ऊपर लिया जाता था। माधवराव राजनीति के लिए ही नहीं बल्कि कई अन्य रुचियों के लिए भी विख्यात थे। क्रिकेट, गोल्फ, घुड़सवारी जैसे शौक के चलते ही वे अन्य नेताओं से अलग थे।


लगातार 9 बार सांसद रहे माधवराव
9 बार सांसद रहे माधवराव ने 1971 में पहली बार 26 साल की उम्र में गुना से चुनाव जीता था। वे कभी चुनाव नहीं हारे। उन्होंने यह चुनाव जनसंघ की टिकट पर लड़ा था। आपातकाल हटने के बाद 1977 में हुए आम चुनाव में उन्होंने निर्दलीय के रूप में गुना से चुनाव लड़ा था। जनता पार्टी की लहर होने के बावजूद वह दूसरी बार यहां से जीते। 1980 के चुनाव में वह कांग्रेस में शामिल हो गए और तीसरी बार गुना से चुनाव जीत गए। 1984 में कांग्रेस ने अंतिम समय में उन्हें गुना की बजाय ग्वालियर से लड़ाया था। यहां से उनके सामने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी मैदान में थे। उन्होंने वाजपेयी को भारी मतों से हराया था।

माधवराव सिंधिया के बेटे हैं ज्योतिरादित्य



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