दानों में श्रेष्ठ दान अभयदान

दानों में श्रेष्ठ दान अभयदान

Ritesh Ranjan | Publish: Sep, 08 2018 01:24:12 PM (IST) | Updated: Sep, 08 2018 01:24:13 PM (IST) Chennai, Tamil Nadu, India

आचार्य ने पर्यूषण के संदर्भ में कहा वर्ष के बारह महीनों में चातुर्मास के चार माह सबसे उत्तम होते हैं। उनमें भी श्रावण और भाद्रपद माह विशिष्ट होते हैं। इनमें भाद्रपद का अपना महत्व है। भाद्रपद में भी इन नौ दिनों का अति विशिष्ट महत्व होता है। यह पर्व अध्यात्म से जुड़ा हुआ है

चेन्नई. माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में आचार्य महाश्रमण ने पर्यूषण पर्व की शुरुआत में उपस्थित श्रद्धालुओं से कहा हमारी दुनिया में दान चलता है। दान कई प्रकार का होता है और हर व्यक्ति अपनी इच्छानुसार दान करता है। कोई अन्नदान, वस्त्रदान, जलदान करता है तो कोई आवासदान, ज्ञानदान करने में रुचि रखता है। सभी प्रकार के दान का अपना-अपना महत्व हो सकता है किन्तु अभयदान दुनिया में सर्वश्रेष्ठ दान होता है। सभी प्रकार के प्राणियों को अभय का दान दे देना सर्वश्रेष्ठ दान है।
आचार्य ने पर्यूषण के संदर्भ में कहा वर्ष के बारह महीनों में चातुर्मास के चार माह सबसे उत्तम होते हैं। उनमें भी श्रावण और भाद्रपद माह विशिष्ट होते हैं। इनमें भाद्रपद का अपना महत्व है। भाद्रपद में भी इन नौ दिनों का अति विशिष्ट महत्व होता है। यह पर्व अध्यात्म से जुड़ा हुआ है। इसमें जितना संभव हो सके आगम स्वाध्याय का क्रम चलना चाहिए। प्रवचन करना और प्रवचन सुनना दोनों ही स्वाध्याय की श्रेणी में आते हैं। आदमी प्रवचन भी ध्यान से श्रवण करे तो स्वाध्याय का लाभ प्राप्त हो सकता है। पर्यूषण के प्रथम दिन को खाद्य संयम दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसलिए इस दिन आदमी को अपने खान-पान का सीमाकरण करने पर ध्यान देना चाहिए। आहार शरीर का एक आधार है। सभी को भोजन में संयम बरतने का प्रयास करना चाहिए। आज के ही तेरापंथ के चतुर्थ आचार्य जयाचार्य का जन्मदिवस आता है। इसलिए उनका श्रद्धा के साथ स्मरण किया गया। इसके पूर्व मुख्यमुनि ने ‘गाथा गौरव’ का संगान किया।

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आचरण से आत्मा को बनाएं परमात्मा

चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने पर्यूषण पर्व के दूसरे दिन कहा पर्यूषण आने से घर घर में आनंद छाता है। पर्व और त्योहार हमारे समाज के अंदर हमेशा से चलते आए हैं। त्योहार मनुष्य की इन्द्रियों, मन और शरीर को पुष्ट करते हैं जबकि पर्व मनुष्य के आत्मगुणों को। इससे आत्मा को बहुत बड़ा लाभ होता है। त्योहार पर लोग अच्छे कपड़ा पहनते हैं, लेकिन पर्व के दिनों में त्याग और तप करने की इच्छा होती है। दिल को सद्गुणों से जोडऩे की इच्छा होती है। पर्यूषण पर्व पर लोगों को तप तपस्या कर अपना जीवन सफल बनाने की ओर आगे बढऩा चाहिए। इस आठ दिन में अपनी आत्मा की निर्जरा कर लेनी चाहिए। इसका वास्तविक लाभ तब मिलेगा जब अपने द्वारा कोई भी भूल हुई हो तो उससे क्षमा याचना करलें। छोटा हो या बढ़ा, गलती के लिए क्षमा मांग लेनी चाहिए।
पर्यूषण में मनुष्य अपने आत्महित के लिए जो भी करना चाहे कर सकता है। सागरमुनि ने कहा आचरण आत्मा को परमात्मा बना देता है लेकिन सबसे पहले प्रवचन श्रमण कर ज्ञान का प्रकाश प्राप्त करें। आचरण का महत्व तो बहुत होता है लेकिन तप के बाद ही उसका लाभ मिल पाता है। बिना तप आराधना के कोई भी आत्मा परमात्मा नहीं बन सकती। उसके लिए सबसे पहले ज्ञान प्राप्त करने की जरूरत होती है। वर्तमान में मनुष्य ऊंचाई पर जाने का विचार तो करता है लेकिन याद रहे केवल विचार करने से कुछ भी हासिल नहीं होता। पर्यूषण यही संदेश लेकर आता है कि मनुष्य अपने प्रयासों से लोक के अंधेरे में उजाला करे। यह मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। उसे अपने भीतरी अंधकार को पहचान कर प्रकाश की ओर बढऩा चाहिए। इससे पहले उपप्रवर्तक विनयमुनि ने अंतगढ़ सूत्रवाचन किया। धर्मसभा में संघ के अध्यक्ष आंनदमल छल्लाणी भी उपस्थित थे। मंत्री मंगलचंद खारीवाल ने संचालन किया।

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