ग्रेनाइट पत्थर खदान में घुट रहा मजदूरों का दम, पीने तक के लिए नहीं साफ पानी

ग्रेनाइट पत्थर खदान में घुट रहा मजदूरों का दम, पीने तक के लिए नहीं साफ पानी

Neeraj soni | Publish: Sep, 04 2018 12:33:18 PM (IST) Chhatarpur, Madhya Pradesh, India

25 सालों से चल रही खदान के क्षेत्र में मजदूरों के लिए आज भी नहीं मूलभूत सुविधाएं

छतरपुर। जिले में माइनिंग का काम लंबे समय से चल रहा है। पत्थर खदानों से हर साल कंपनियां करोड़ों-अरबों रुपए का खनिज अयस्क निकालकर ले जा रही है। कंपनियों की आय बढ़ी, मुनाफा बढ़ता चला गया, लेकिन पत्थर खदानों में काम करने वाले मजदूरों की जिंदगी पत्थरों के बीच ही खांसते, बीमार होते हुए खत्म हो रही है। मजदूरों के हित और उनकी तरक्की के दवों के बीच जमीनी हकीकत उससे अलग है। कटहरा गांव स्थित ग्रेनाइट पत्थर की खदान में काम करने वाले मजदूरों कम मजदूरी में हाड़तोड़ मेहनत कर रहे हैं, लेकिन न तो उन्हें बाजिव मजदूरी मिलती है और ही स्वास्थ्य सेवाओं सहित जरूरी सेवाएं दी जा रही है। पिछले महीने लवकुशनगर क्षेत्र के ग्राम कटहरा और बगमऊ के तीन मजदूरों की सिलकोसिस की बीमारी से मौत हो जाने के बाद भी यहां के हालात नहीं सुधरे हैं। मजदूरों की मौत के बाद यह एक एनजीओ के अध्ययन में यह बात सामने आई है कि खदान का संचालन करने वाली फॉरच्र्यून स्टोन्स लिमिटेड कंपनी मजदूरों को रोजगार देने के नाम पर मानव अधिकारों को दरकिनार करके उनका शोषण कर रही है। जबकि कंपनी का दावा है कि वे मजदूरों के हित में लगातार काम करते हैं। हालांकि इस दावा के विपरीत जमीनी हकीकत चौकाने वाली मिली।
जिले के लवकुशनगर तहसील क्षेत्र के ग्राम कटहरा में कटहरा ग्राम के 2 किमी दूर उतर पूर्व में करीब 30 साल पहले ग्रेनाइट की खदान फॉरच्र्यून स्टोन्स लिमिटेड कंपनी को दी गई थी। वर्ष 2008 में 21.७३६ हेक्टेयर क्षेत्रफल में ग्रेनाइट की खदान फिर से फॉरच्र्यून स्टोन्स लिमिटेड कंपनी को 20 साल के लिए लीज पर देकर उसे नवीनीकृत कर दिया गया था। 4 जुलाई २००८ से शुरू हुई खदान की लीज 3 जुलाई २०२८ में खत्म होनी है। भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से जिन शर्तों पर इस खदान की लीज के लिए अनुमति मिली थी, उसका पालन करना तो यहां मजदूरों के मानवीय हितों का भी ध्यान नहीं रखा गया है। मप्र स्टेट माइनिंग कार्पोरेशन के पार्टनरशिप में चल रही इस ग्रेनाइट खदान में काम करने वाले मजदूरों की स्थिति पर हुए एक अध्ययन के मुताबिक खदान में काम करने वाले मजदूरों में से हर साल आधा दर्जन मजदूरों की मौत सिलकोसिस बीमारी से होती है। वहीं तीन से चार मजदूरों की मौत दुर्घटना में हो जाती है। इसके अलावा अन्य बीमारी के कारण भी मौत हो जाती है। इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद भी खदान क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों की हालत नहीं सुधरी है।
काई लगे गंदे ड्रमों में हैंडपंप से पानी भरकर पीते हैं मजदूर :
कटहरा स्थित ग्रेनाइट खदान के मजदूरों का जीवन बदहाली की स्थिति में पहुंच चुका है। उनके जीवन की सुरक्षा को लेकर यहां बड़ी लापरवाही की जा रही है। खदान में काम करने वाले मजदूरों के लिए यहां स्वच्छ पेयजल का भी कोई इंतजाम नहीं है। मजदूर यहां प्लास्टिक के गंदे काई लगे ड्रमों मेंं भरे जा रहे हैंडपंप के लाल पानी को पीते हैं। रविवार को दोपहर में लंच करने के बाद मजदूर पत्थरों के नीचे रखे ड्रमों का पानी एक लोहे के डिब्बे से पीते मिले। पानी पीने के लिए मग और गिलास तक उन्हें नसीब नहीं था। एक मजदूर ने बताया कि जिस पानी से लोग नहाना भी पसंद नहीं करते, उसे वे मजबूरी मेंं पीते हैं।
छाया और आराम के लिए भी नहीं कोई जगह :
खदान में काम करने वाले मजदूरों को धूप और बारिश से बचाव के लिए भी यहां कोई इंतजाम नहीं है। पत्थरों को आड़ बनाकर यहां छाया की व्यवस्था की गई है, जिसके नीचे पानी के खुले ड्रम रखे थे, इसी के नीचे बैठकर मजदूर खाना खाते हैं और यही सर छिपाते हैं। खदान क्षेत्र में मजदूरों के लिए जो टीनशेड है उसमें भी मशीनरी रखी रहती है। चट्टानों के नीचे खतरें में ही मजदूरों का जीवन कट रहा है। १५ साल से इस खदान में काम कर रहे रामदीन सौंर और हरसेवक बाल्मीकि ने बताया कि सालों से उनका जीवन ऐसे ही चल रहा है। जिस पानी से नहाने भी परहेज होता है, उसे मजबूरी में पीना पड़ता है। खाना खाने के लिए छाया नहीं है, इसलिए चट्टानों की ओट में ही बैठकर खाना खाते हैं। प्लास्टिक के ड्रमों में भरा पानी धूप में तप जाता है, उसे ही पीना पड़ता है। इस पानी को पीकर हर माह कोई न कोई मजदूर बीमार होता है। लेकिन उसके स्वास्थ्य के लिए भी कोई सुविधा नहीं होती। जो भी कमाते हैं एक बार बीमार होने पर पूरा रुपया इलाज में ही लग जाता है।
फेंफड़ों में भरती है डस्ट, नहीं है सुरक्षा इंतजाम :
कटहरा ग्रेनाइट खदान में काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा के लिए यहां केवल हेल्मेट ही दिए जाते हैं। लेकिन मास्क, ग्लब्स, जूते सहित अन्य सुरक्षा उपकरण किसी भी मजदूर को नहीं दिए जा रहे हैं। पत्थरों की कटिंग और उत्खनन व विस्फोट के समय मजदूर मुंह खुला रखकर ही काम करते हैं। ऐसे में मजदूर सिलकोसिस नाम की बीमारी का शिकार हो रहे हैं।
यह है सिलिकोसिस की बीमारी :
1. सिलिका धूल (पत्थरों की डस्ट) फेफड़ों में जाकर सांस में मुश्किल पैदा करती है। इससे दम घुटने लगता है और खासी की शिकायत हो जाती है। धीरे-धीरे इससे फेंफड़े कमजोर होते चले जाते हैं। बाद में व्यक्ति की मौत हो जाती है। सिलिकोसिस सिलिका धूल से पैदा होने वाली बीमारी है। आमतौर पर मजदूर धूम्रपान करते हैं। इसी से यह बीमारी बढ़ती है और फेफड़ों को नुकसान पहुंचता रहता है।
इन कामों से होती है बीमारी :
1. पत्थरों को तोडऩे व ड्रिलिंग करने से सिलकोसिस की बीमारी होती है।
2. खनन संबन्धी या स्टोन के्रशर में काम करने वाले मजदूर इस बीमारी का शिकार होते हैं।
3. मकान बनाने या उजाडऩे का काम करने से यह बीमारी होती है।
4. शीश बनाना या हीरा तराशने और. भवन या सड़क बनाने में राजगीरी करने वाले लोगों में यह बीमारी होती है।
सिलिका धूल से ऐसे किया जाता है बचाव:
1. कार्यस्थल पर पानी का छिड़काव किया जाना चाहिए।
2. कटाई, ड्रिलिंग और पिसाई में पानी का प्रयोग किया जाना चाहिए।
3. डस्ट वाले कार्यस्थल पर मास्क का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
4. सिलिका धूल के नजदीक खाना पीना व धूम्रपान नहीं करना चाहिए।
5. क्रेशर व माइनिंग में काम करते समय दस्ताने, मास्क पहनना चाहिए।
बात सुनने के बाद काट दिया फोन :
कटहरा में ग्रेनाइट खनन का काम करने वाली कंपनी फॉरच्र्यून स्टोन्स् लिमिटेड के जनरल मैनेजर सुरेश शर्मा से जब इस संबंध में बात की तो उन्होंने पूरी बात सुनने के बाद फोन काट दिया। इसके बाद उन्होंने कॉल रिसीव नहीं किया। बाद में मोबाइल बंद कर लिया।
कार्रवाई की जाएगी :
कटहरा पत्थर खदान में काम करने वाले मजदूरों को मूलभूत सुविधाएं मिलनी चाहिए, उन्हें सुरक्षा मानकों के अनुसार सुरक्षा उपकरण भी दिए जाने चाहिए। इसको लेकर कंपनी के लिए स्पष्ट गाइड लाइन है। लेकिन अगर इसका पालन नहीं किया जा रहा है तो यह गंभीर मामला है। जांच कराकर नियमानुसान कार्रवाई की जाएगी।
- देवेष मरकाम, जिला खनिज अधिकारी

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