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Interesting story: 254 वर्ष पहले यहां पाताल से प्रगट हुआ शिवलिंग, मंदिर का नाम पड़ा पातालेश्वर

आमदिनों में भी इस मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है।

छिंदवाड़ा

Published: August 04, 2021 12:22:16 pm

छिंदवाड़ा. सावन माह एवं महाशिवरात्रि पर मुख्यालय में स्थित सिद्ध स्थल पातालेश्वर मंदिर में स्थानीय के साथ-साथ दूर-दराज से हजारों की संख्या में भक्त भोले के दर्शन एवं जल अर्पित करने पहुंचते हैं। आमदिनों में भी इस मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है। रेलवे स्टेशन के पास स्थित इस मंदिर का इतिहास लगभग 254 वर्ष पुराना है। बताया जाता है कि पाताल से शिवलिंग प्रगट होने की वजह से इस मंदिर का नाम पातालेश्वर पड़ा। बताया जाता है कि गुजरात के एक ब्रम्हचारी नागा साधु गंगा गिरी बाबा छिंदवाड़ा पहुंचे थे। उन्होंने कुछ समय के लिए यहां अपना डेरा डाला। गोस्वामी संप्रदाय के गंगा गिरी सिद्ध पुरुष थे और सफेद घोड़े पर सवार होकर चलते थे। यहां रहते हुए उन्होंने धूनी रमाई और नित्य की तरह शिव पूजा की। इसी दौरान रात में स्वप्न में उन्हें साक्षात शिव के दर्शन हुए। उन्हें अपने अवतार लेने का रहस्य और प्रयोजन बताया। अगले दिन साधु ने उस स्थान की खुदाई करवाई और ठीक स्वप्न के हिसाब से नियत दूरी व गहराई पर शिव ***** प्रकट हुए। घनघोर जंगल के बीच पाताल से ईश्वर का प्रकट होना हमेशा से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता रहता है। समय के साथ अब यह स्थल पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित होता जा रहा है।
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पीपल में देवी का वास का होता है आभास
इस सिद्ध स्थल से जुड़ी एक और रोचक बात यह है कि यहां मौजूद पीपल के वृक्ष में देवी का वास माना जाता है। श्रद्धालुओं का मानना है कि यहां रात में देवी भ्रमण करती हैं। इसका आभास उनकी पायल के घुंघरूओं की मधुर ध्वनि से होता है।
तंत्र-मंत्र से है पुराना नाता
पातालेश्वर मंदिर एक मठ के रूप में जाना जाता है। कभी यहां नेपाल के पंडाओं और तांत्रिकों का जमावड़ा लगता था। ये लोग अंचल और प्रदेश में मौजूद अपने शिष्य और यजमानों की समस्या का निवारण के लिए यहां विभिन्न तांत्रिक क्रियाएं और अनुष्ठान संपन्न किया करते थे। इनमें से कुछ को यह मठ ऐसा भाया कि वे पूरी तरह से अंचल में ही बस गए।
अगले सुबह जीवित नहीं रहते थे शिकारी
मंदिर के पास एक बावली है। बताया जाता है कि बावली में गंगा गिरी बाबा ने मछलियां पाली थी। इनमें से कुछ मछलियों को सोने की नथ पहनाई गई थी जो लोगों को काफी आकर्षित करती थी। लोगों का कहना है कि इन मछलियों का शिकार करना पूर्वत: वर्जित था। बाबाजी की गैरमौजूदगी में किसी ने एक बार उनका शिकार कर लिया तो अगली सुबह वह मरा हुआ पाया गया।
पीढ़ी दर पीढ़ी हो रही देखरेख
मंदिर की देखरेख पीढ़ी दर पीढ़ी की जा रही है। मंदिर के मुख्य पुजारी पं. तिलक गोस्वामी ने बताया कि मैं आठवीं पीढ़ी का हूं। उन्होंने बताया कि अब तक नागा संप्रदाय से चार और गृहस्थ से चार लोग मंदिर की देखरेख कर चुके हैं।

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