प्रदेश की धरती में समा जाएगा यह चौदह लाख मैट्रिक टन खतरनाक रसायन, सेहत कैसे रहेगी सुरक्षित

रबी के सीजन में इस बार प्रदेश की कृषि भूमि करीब चौदह लाख मैट्रिक टन यूरिया निगल जाएगी। इस बार प्रदेश में ९८ लाख ८० हजार हैक्टेयर क्षेत्र में रबी की बुवाई का लक्ष्य है। इसके मुकाबले अब तक २९ लाख ८४ हजार २०० हैक्टेयर क्षेत्र में रबी फसलों की बुवाई हो चुकी है, जो लक्ष्य के मुकाबले ३०.२० प्रतिशत है। रसायनिक उर्वरकों के बढते उपयोग से जहां खेती की जमीन तेजी से बंजर होती जा रही है, वहीं मानव देह पर जानलेवा बीमारियों का खतरा मण्डराने लगा है।

By: jitender saran

Updated: 02 Dec 2020, 12:36 PM IST

चित्तौडग़ढ़
किसी जमाने में सोना उगलने वाली धरती की हालत अब पॉल्ट्री फार्म की मुर्गी जैसी होती जा रही है। लगातार उर्वरकों के प्रयोग से धरती की उर्वरक क्षमता में तेजी से गिरावट हो रही है। प्रदेश की कृषि भूमि की हालत अब उस शराबी और अफीमची की तरह हो गई है, जिसमें शराब और अफीम हलक में उतरने के बाद ही कुछ करने की इच्छा शक्ति जागृत होती है। राजस्थान सहित पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे अन्न उत्पादक राज्यों के किसानों की अधिक पैदावार लेने के लिए जरूरत से ज्यादा उर्वरक का उपयोग करना मजबूरी बन गई है। इससे जमीन कठोर होने के साथ ही उसमें पानी सोखने की क्षमता कम होती जा रही है। कम और अधिक वर्षा, अधिक धूप और सर्दी में रसायनिक युक्त फसल पर तापमान और जमीन का संतुलन बिगड़ता जा रहा है। यही नहीं फसल के स्वाद और पौष्टिकता में भी कमी दर्ज हुई है। आंकड़ों पर यकीन करें तो वर्ष २०५० तक देश को साढे चार सौ मिलीयन टन खाद्यान्न की आवश्यकता होगी। ऐसी स्थिति में यदि लगातार रसायनिक उर्वरकों का उपयोग होता रहा तो उपज की वृद्धि दर और मिट्टी के भौतिक गुणों में कमी आएगी। नतीजतन लक्ष्य प्राप्ति से देश कोसों दूर हो जाएगा। अनुसंधान से भी यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि मृदा सजीव है और इसमें कई सुक्ष्म जीव विद्यमान हैं। जो कार्बनिक पदार्थ विघटित कर उन्हें पौधों के पौषक तत्व के रूप में परिवर्तित करते हैं। लेकिन लगातार रसायनिक उर्वरकों के प्रयोग से जमीन में कार्बनिक पदार्थ तेजी से घटते जा रहे हैं। जबकि उत्तम खेती का आधार कार्बनिक पदार्थ को माना गया है। विभिन्न रसायनों के अंधाधुन उपयोग से मृदा व भूमिगत जल प्रदूषण की समस्या भी लगातार बढ रही है। जो मानव और पशुओं की सेहत पर प्रतिकूल असर डाल रही है। साथ ही जमीन की भौतिक संरचना और गुणवत्ता भी नष्ट हो रही है। कृषि वैज्ञानिक यह मत पहले ही जाहिर कर चुके हैं कि रसायनिक उर्वरकों के उपयोग पर आधारित तकनीक लंबे समय तक जमीन की गुणवत्ता को बनाए रखने में समर्थ नहीं है।

सब उदाहरण सामने हैं
केमिकल फर्टिलाइजर, इंसेक्टीसाइड, पेस्टीसाइड तथा वीडी साइड का पन्द्रह साल तक अंधाधुन उपयोग करने के बाद जमीन की हालत यह हो जाती है कि उर्वरकों की चाहे कितनी ही मात्रा दी जाए, फसल उत्पादन में वृद्धि नहीं होती। पंजाब, हरियाणा और दक्षिण भारत के कई इलाके इसका ज्वलंत उदाहरण है।
सहायक निदेशक कृषि विस्तार डॉ. शंकरलाल जाट ने बताया कि देसी खाद पर निर्भरता नहीं बढी तो आने वाले समय में जमीन की बंजरता बढ जाएगी और साथ ही रसायनिक उर्वरक युक्त उत्पादन सेहत के लिए भारी संकट पैदा करने वाला साबित होगा। रसायनिक उर्वरकों से जमीन को होने वाले नुकसान से सबक लेते हुए अमरीका, आस्ट्रेलिया तथा यूरोप में सेन्द्रिय खाद नेचुरल फर्टिलाइजर से निर्मित खाद्यान्न के बाजार विकसित हो चुके हैं।

गंगानगर-हनुमानगढ़ सबसे आगे
सरकार की ओर से इस वर्ष रबी को लेकर यूरिया खाद की जो व्यवस्था की गई है, इसके अनुसार यूरिया की खपत में इस बार गंगानगर व हनुमानगढ प्रदेश में सबसे आगे रहेंगे। गंगानगर में रबी के सीजन में १.२८ लाख मैट्रिक टन व हनुमानगढ़ में ९४ हजार मैट्रिक टन यूरिया की खपत होने का अनुमान है। इसके अलावा जयपुर में ४९ हजार, टोंक में ३६ हजार ५००, अलवर में ७१ हजार ३००, बीकानेर में ६१ हजार, कोटा में ७८ हजार व चित्तौडग़ढ़ जिले में ६६ हजार मैट्रिक टन यूरिया की खपत होने का अनुमान है। विभाग ने इस अनुमान के हिसाब से ही यूरिया की व्यवस्था की है। इस तरह प्रदेश के सभी जिलों के लिए इस बार रबी के सीजन में १४ लाख मैट्रिक टन यूरिया की खपत होने का अनुमान लगाया गया है और इसी के हिसाब से व्यवस्थाओं को अंजाम दिया गया है।

jitender saran Reporting
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