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एक ऐसा गढ़ जहां से दागे थे चांदी के गोले

चूरू अपने आप में कई विशेष जानकारियां संजोए हैं, जिसमें युद्ध के दौरान चांदी के गोले दागना भी एक है। विश्व में यह सबसे अनोखी घटना है, हालांकि लड़ाई में हार के कारण बीकानेर महाराजा ने इसे इतिहास में लिखने नहीं दिया, लेकिन इतिहास के जानकारों ने इसकी पुष्ठी की है।

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एक ऐसा गढ़ जहां से दागे थे चांदी के गोले

एक ऐसा गढ़ जहां से दागे थे चांदी के गोले

चूरू. चूरू अपने आप में कई विशेष जानकारियां संजोए हैं, जिसमें युद्ध के दौरान चांदी के गोले दागना भी एक है। विश्व में यह सबसे अनोखी घटना है, हालांकि लड़ाई में हार के कारण बीकानेर महाराजा ने इसे इतिहास में लिखने नहीं दिया, लेकिन इतिहास के जानकारों ने इसकी पुष्ठी की है। आरपीएससी के प्रश्न पत्र में इस सवाल को कई बार पूछा भी जा चुका है। यह घटना सन् 1814 की बताई जाती है, तत्कालीन बीकानेर महाराजा सूरत सिंह ने चूरू पर आक्रमण कर दिया। उस समय चूरू अलग बड़ी रियासत हुआ करती थी। उस दौरान चूरू के शासक ठाकुर शिवजी सिंह थे। बीकानेर रियासत का चूरू पर तीसरा आक्रमण था। नगरश्री में सचिव श्यामसुन्दर बताते हैं कि बीकानेर की फौजों ने पानी की टंकी (नीमडी धोरा) पर पड़ाव डालकर शहर को चारों तरफ से घेर लिया था। बीकानेर की फौजों ने चूरू को तीन महिनों तक घेरे रखा। ऐसे में राशन सहित गोला बारूद भी खत्म हो गए। गोला बारूद समाप्त होने पर चूरू के शासक को चांदी के गोले दागने का विचार किया, इस पर महल में रखे गहने इकठ्ठे किए, इस काम में शहर के सेठ-साहूकारों ने भी सहयोग कर जेवर दिए गए। जिन्हें पिघलाकर चांदी के गोले तैयार किए गए व दुश्मन की सेना पर छोड़ा गया। रणक्षेत्र में चांदी के गोले देखकर बीकानेर फौज घबरा गई, उन्होंने विचार किया कि चांदी के बाद चूरू की फौज किस तरह के आक्रमण करेगी। ऐसे में घबराई बीकानेर की फौज वापस लौटने लगी। फौज को लौटता देखकर एक भाट जो कि चूरू शासक से जलन रखता था वो बीकानेर शासक के पास पहुंचा। उसने एक दोहे के माध्यम से उन्हें कुछ इशारा किया, भाट के दोहे का अर्थ समझते हुए बीकानेर शासक व फौज दोगुनी शक्ति से वापस लौटी व चूरू पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में तत्कालीन चूरू शासक ठाकुर शिवजी सिंह वीर गति को प्राप्त हुए। हालांकि लड़ाई में चूरू सेना हार गगई। लेकिन चांदी के गोले दागना लोगों की जुबां पर चढ़ चुका है।
किले की दीवारों में नौ बुर्ज
चूरू के शासक ठा.कुशल सिंह ने संवत् 1751 ईस्वी सन 1694 में किले का निर्माण कराया था। इतिहास के अनुसार उस वक्त क्षेत्र में लुटेरों का आतंक था। शासक वर्ग लड़ाई में बाहर जाने से शहर असुरक्षित हो जाता था। लुटेरों से बचने के लिए गढ़ बनवाया। दीवारों में नौ बुर्ज बनाई गई। शहर की सुरक्षा के लिए परकोटा बना चार दरवाजों का निर्माण भी कराया गया। इन दरवाजों में अगुणा मोहल्ला में पूर्वी दरवाजा, पश्चिम में बीकानेर दरवाजा, झारिया मोरी उत्तरी दरवाजा गुदड़ी बाजार जैन मंदिर के पास दक्षिणी दरवाजा बनाया गया। गढ़ में एक दरबार भवन बनाया एवं उसके ऊपर राज परिवार के रहने के लिए आवास बनाया गया। किले के पूर्वी परकोटे पर उल्लेख है कि संवत् 1865 में उस वक्त के शासक ठा.शिवजी ने श्रीगोपाल मंदिर बनावाया। निर्माण ठकुरानी पंवार चंदन कुंवर की प्रेरणा से किया गया। 1814 में बीकानेर शासक ने चूरू को हरा अपने कब्जे में कर लिया। उस वक्त यहां बीकानेर की ओर से एक अधिकारी नियुक्त किया। एक युद्ध में गढ़ से तोपों पर चांदी के गोले दागे गए थे। लगभग डेढ़ दशक पूर्व यहां कुछ मरम्मत कार्य भी हुआ था लेकिन उसके बाद इसकी सुध नहीं ली गई।