TEACHER’S DAY SPECIAL : उनके नजरिए को अपनाने की जरूरत

TEACHER’S DAY  SPECIAL : उनके नजरिए को अपनाने की जरूरत

Jamil Ahmed Khan | Publish: Sep, 05 2018 01:09:31 PM (IST) शिक्षा

शिक्षक समाज के ऐसे शिल्पकार होते हैं जो बिना किसी मोह के इस समाज को तराशते हैं।

शिक्षक समाज के ऐसे शिल्पकार होते हैं जो बिना किसी मोह के इस समाज को तराशते हैं। शिक्षक का काम सिर्फ किताबी ज्ञान देना ही नहीं बल्कि सामाजिक परिस्थितियों से छात्रों को परिचित कराना भी होता है। शिक्षकों की इसी महत्ता को सही स्थान दिलाने के लिए ही सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने पुरजोर कोशिशें की, जो खुद एक बेहतरीन शिक्षक थे। बहुमुखी प्रतिभा के धनी, विद्वान, शिक्षक, वक्ता, प्रशासक, राजनायिक, देशभक्त और शिक्षाशास्त्री जैसे उच्च पदों पर रहे। अपने इस महत्वपूर्ण योगदान के कारण ही, भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन 5 सितंबर को भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। राधाकृष्णन ने अपने जीवन के 40 साल अध्यापन को दिए थे।

दरिद्रता और मजबूरियों का रोना न रोएं
डॉक्टर राधाकृष्णन अपने पिता की दूसरी संतान थे। उनके चार भाई और एक छोटी बहन थी। छह बहन-भाईयों और दो माता-पिता को मिलाकर आठ सदस्यों के इस परिवार की आय बेहद सीमित थी। इस सीमित आय में भी डॉक्टर राधाकृष्णन ने सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा हो तो कोई बाधा आपका रास्ता नहीं रोक सकती। उन्होंने न केवल महान शिक्षाविद के रूप में ख्याति प्राप्त की, बल्कि देश के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद को भी सुशोभित किया। वे स्वतंत्र भारत के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति बने। उन्हें बचपन में कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। मगर उन्होंने कभी इसे बाधा नहीं बनने दिया। इसलिए गरीबी या अभावों का रोना रोने की बजाए अपने लक्ष्य पर नजर रखें और ईमानदारी से मेहनत करें।

जरूरी है शिक्षा को धर्म और जाति से ऊपर रखना
हालांकि इनके पिता धार्मिक विचारों वाले इंसान थे लेकिन फिर भी उन्होंने राधाकृष्णन को पढऩे के लिए क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल, तिरुपति में दाखिल करवाया। इसके बाद उन्होंने वेल्लूर और मद्रास कॉलेजों में शिक्षा प्राप्त की। वे स्वयं भारतीय सामाजिक संस्कृति से ओत-प्रोत आस्थावान हिंदू थे। इसके साथ ही अन्य समस्त धर्मावलंबियों के प्रति भी गहरा आदर भाव रखते थे। जो लोग उनसे वैचारिक मतभेद रखते थे, उनकी बात भी वे बड़े सम्मान एवं धैर्य के साथ सुनते थे। विश्व में उन्हें हिंदुत्व के परम विद्वान के रूप में जाना जाता था।

धन व भौतिक सुखों का मोह जीवन को बनाता है कमजोर
1967 के गणतंत्र दिवस पर डॉक्टर राधाकृष्णन ने देश को संबोधित करते हुए यह स्पष्ट किया था कि वह अब किसी भी सत्र के लिए राष्ट्रपति नहीं बनना चाहेंगे। हालांकि राजनेताओं ने उनसे काफी आग्रह किया कि वे अगले सत्र के लिए भी राष्ट्रपति का दायित्व ग्रहण करें, लेकिन राधाकृष्णन ने अपनी घोषणा पर पूरी तरह से अमल किया। राष्ट्रपति के रूप में अपने कार्यकाल पूर्ण करने के बाद वे गृहराज्य के शहर मद्रास चले गए। वहां उन्होंने पूर्ण अवकाशकालीन जीवन व्यतीत किया। 1968 में उन्हें भारतीय विद्या भवन के द्वारा सर्वश्रेष्ठ सम्मान देते हुए साहित्य अकादमी की सदस्यता प्रदान की गई। डॉक्टर राधाकृष्णन ने एक साधारण इंसान की तरह अपना जीवन गुजारा था। वह परंपरागत वेशभूषा में रहते थे। सफेद वस्त्र धारण करते थे। वह सिर पर दक्षिण भारतीय पगड़ी पहनते थे, जो कि भारतीय संस्कृति का प्रतीक बनकर सारे विश्व में जानी गई। राधाकृष्णन साधारण शाकाहारी भोजन करते थे। उन्होंने एक लेखक के रूप में 150 से अधिक रचनाएं लिखीं।

विद्यार्थियों को डांटकर नहीं, प्यार व दोस्ती से पढ़ाएं
डॉ. राधाकृष्णन अपनी बुद्धि से पूर्ण व्याख्याओं, आनंददायक अभिव्यक्ति और हल्की गुदगुदाने वाली कहानियों से छात्रों को मंत्रमुग्ध कर देते थे। उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारने की प्रेरणा वह अपने छात्रों को देते थे। वह जिस भी विषय को पढ़ाते थे, पहले स्वयं उसका गहन अध्ययन करते थे। दर्शन जैसे गंभीर विषय को भी वह अपनी शैली से सरल, रोचक और प्रिय बना देते थे। जब वह अपने आवास पर शैक्षिक गतिविधियों का संचालन करते थे, तो घर पर आने वाले विद्यार्थियों का स्वागत हाथ मिलाकर करते थे। वह उन्हें पढ़ाई के दौरान स्वयं ही चाय देते थे और साथी की भांति उन्हें घर के द्वार तक छोडऩे भी जाते थे। राधाकृष्णन में प्रोफेसर होने का रंचमात्र भी अहंकार नहीं था। उनका मानना था कि जब गुरु और शिष्य के मध्य संकोच की दूरी न हो तो अध्यापन का कार्य अधिक श्रेष्ठ हो जाता है।

उनका कहना था कि यदि शिक्षा सही प्रकार से दी जाए तो समाज से अनेक बुराइयों को मिटाया जा सकता है। शिक्षक वह नहीं जो छात्र के दिमाग में तथ्यों को जबरन ठूंसे, बल्कि वास्तविक शिक्षक तो वह है जो उसे आने वाले कल की चुनौतियों के लिए तैयार करें। शिक्षा के द्वारा ही मानव मस्तिष्क का सदुपयोग किया जा सकता है। अतत: विश्व को एक ही इकाई मानकर शिक्षा का प्रबंधन करना चाहिए। शिक्षा का परिणाम एक मुक्त रचनात्मक व्यक्ति होना चाहिए जो ऐतिहासिक परिस्थितियों और प्राकृतिक आपदाओं के विरुद्ध लड़ सके।

पुस्तकें वह साधन हैं जिनके माध्यम
से हम विभिन्न संस्कृतियों के बीच पुल का निर्माण कर सकते हैं। इनसे हमें एकांत में विचार करने की आदत और सच्ची खुशी मिलती है। उन्होंने यह भी कहा था कि कष्ट सहने से ही हमें बहुत कुछ मिलता है। इससे भागना नहीं चाहिए।

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