सोशल मीडिया से खुद का आकलन भी युवाओं में डिप्रेशन की वजह

अधिकतर युवा खुद का आकलन सोशल मीडिया से कर रहे हैं जैसे मैं अच्छा या बुरा हूं। मैं अच्छा काम कर रहा हूं या खराब। उनका फोकस इस बात पर अधिक होता है उनके फोटो या काम पर लोग कैसे रिएक्ट करते हैं।

By: Hemant Pandey

Published: 09 Jul 2020, 07:45 PM IST

अधिकतर युवा खुद का आकलन सोशल मीडिया से कर रहे हैं जैसे मैं अच्छा या बुरा हूं। मैं अच्छा काम कर रहा हूं या खराब। उनका फोकस इस बात पर अधिक होता है उनके फोटो या काम पर लोग कैसे रिएक्ट करते हैं। यह युवाओं में डिप्रेशन का कारण बन रहा है।
सो शल मीडिया पर कोई पोस्ट, वीडियो डालने या स्टेट्स लगाने के बाद बार-बार प्रतिक्रिया देखने की आदत भी तनाव का कारण है। हम अपने मनमुताबिक प्रतिक्रिया चाहते हैं। सोशल मीडिया पर दिखना चाहते हैं कि हमें लोग कितना पसंद करते हैं। खुद को परखने की बजाय सोशल मीडिया के माध्यम से दूसरों की नजरों से खुद को आंकने लगते। यदि इच्छानुरूप लाइक, कमेंट, व्यूज नहीं मिलते हैं तो बेचैनी होती है। इस कारण खुद को फेलियर मानते हैं। फिर धीरे-धीरे नेगेटिव विचार आने शुरू हो जाते हैं। युवा दूसरों की नजरों से खुद को परखने लगते हैं। यही परेशानी की मुख्य वजह है। यह सही नहीं है। सोशल मीडिया जीवन का एक हिस्सा है, जीवन नहीं।
मुख्य लक्षण
बार-बार मोबाइल चेक करने का असर खानपान, नींद और दूसरी दिनचर्या पर पड़ता है। आसपास या घरवालों को कम समय देना, फोटो या वीडियो पर लाइक, कमेंट या शेयर कम होने से खराब महसूस होना व गलत विचार आना, दूसरी जरूरतों की अनदेखी करना, सामने वाले की भावनाओं का ध्यान न रखना, खुद को सेलिब्रिटी समझना, अपनी फोटो को ज्यादा खूबसूरत बनाकर पोस्ट करना आदि।
ऐसे कर सकते हैं बचाव
१. सोशल मीडिया बात रखने का माध्यम है, व्यक्तितत्व तय करने का मंच नहीं है।
2. यह हर कोई अपनी बात रख सकता है। जरूरी नहीं है कि आपकी हर बात से लोग सहमत हो। नापसंद भी करेंगे।
3. यह समझें कि किसी पोस्ट या वीडियो से आपका आंकलन नहीं हो रहा है।
4. वर्चुअल की बजाय वास्तविक दोस्त बनाएं। उनसे मिलें और बातें करें। इनका कोई विकल्प नहीं हो सकता है।
5. अपने मन को किसी हॉबी में लगाएं जैसे कि अखबार-मैगजीन या किताबें पढ़े, गार्डनिंग, पालतू जानवर की देखभाल करें।
6. मोबाइल टाइम तय करें। खाना खाते, लोगों के बीच में हैं या पढ़ते समय न देखें।
7. स्थिति को स्वीकारें, उससे लडऩे के लिए खुद को तैयार करें। परिजनों से बातें करें।
डॉ. यतनपाल सिंह, प्रभारी डिजिटल एवं बिहैवियर एडिक्शन सेल, एम्स, नई दिल्ली

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