
रनवीरसिंह कंग@ इंदौर. शहर में निजी डॉक्टर तो दूर प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल में भी डॉक्टर जेनेरिक दवा के बजाय ब्रांडेड दवा लिख रहे हैं, इसका खुलासा पत्रिका ने मंगलवार के अंक में किया था। बड़ा सवाल है, डॉक्टर आखिर क्यों जेनेरिक दवा नहीं लिखना चाहते? इसके मुख्य कारण दवा कंपनियों से मिलने वाला फायदा, जेनेरिक दवाओं को लेकर सरकार की पुख्ता पॉलिसी नहीं होना और दवाओं की गुणवत्ता को लेकर संदेह हैं। हालांकि सरकार द्वारा इस ओर किए गए प्रयासों को भी डॉक्टर्स का समर्थन नहीं मिल रहा है।
केंद्र सरकार के निर्देश पर मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) ब्रांडेड दवा के स्थान पर दवा का रसायन (साल्ट या मॉलिक्यूल) लिखने का सर्कुलर डॉक्टरों को जारी कर चुकी है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) इस संबंध में सदस्यों को साल्ट लिखने के निर्देश दे चुकी है। हालांकि इसमें कहा गया है, साल्ट के साथ अपनी राय के रूप में ब्रांड का नाम दे सकता है, लेकिन शहर के पांच फीसदी डॉक्टर ही ब्रांड की जगह साल्ट लिख रहे हैं।
इसलिए पिछड़ी जेनेरिक दवा
-सरकार ने घोषणा तो की, लेकिन ठोस पॉलिसी नहीं बनाई, जिसे इम्प्लीमेंट किया जा सके।
-९५ फीसदी डॉक्टर्स मरीजों को जेनेरिक दवाएं नहीं लिखते, इनमें से भी अधिकतर पीजी कंपनियों की लिखते हैं।
-डॉक्टर्स और ब्रांडेड दवाइयां बना रही मल्टीनेशनल कंपनियों की मिलीभगत का काम एमआर करते हैं, वहीं पीजी कंपनियों के लोग सीधे दवाएं बाजार में फैलाते हैं। इन पर नियंत्रण के लिए अलग मजबूत एजेंसी नहीं है।
-जितना खर्च ब्रांडेड और पीजी कंपनियां अपनी दवाओं के प्रचार पर करती हैं, उसका एक प्रतिशत भी जेनेरिक दवाओं के प्रचार पर खर्च नहीं होता।
ब्रांडेड जेनेरिक और जेनेरिक का बाजार
ब्रांडेड जेनेरिक : मल्टीनेशनल या नेशनल कंपनियों को जेनेरिक डिवीजन बनाना जरूरी है। उनकी ब्रांडेड और जेनेरिक दवा की एमआरपी एक होती है। जेनेरिक दवा पर ७० से ८० फीसदी डिस्काउंट मिलता है। यह दवाएं होलसेल व एजेंसी के माध्यम से बाजार में पहुंचती हैं।
जेनेरिक: दवा बनाने का अधिकतर काम हिमाचलप्रदेश के ब²ी और हैदराबाद की फैक्ट्रियों में होता है। कंपनियां ऑर्डर देकर दवाएं बनवाती हैं। ये रसायन व उर्वरक मंत्रालय के साथ डब्ल्यूएचओ के मापदंडों का पालन करती हैं। जेनेरिक दवा के फॉर्मूलेशन पर पेटेंट हो सकता है, लेकिन मटेरियल पर नहीं ।
ब्लैकहोल हैं पीजी कंपनियां: पीजी (प्रोपेगंडा) कंपनियां अमूमन एमआर नहीं रखतीं। बड़ी कंपनियों के समान साल्ट पर आधारित दवा का निर्माण कर सीधे डॉक्टर व मेडिकल स्टोर संचालक से कमीशन तय कर मेडिकल स्टोर पर पहुंचाती हैं। उदाहरण के लिए बाजार में एसिडिटी के लिए अरिस्टो कंपनी की पेंटाबीकारेट की दस टेबलेट का दाम 5.70 रुपए है, जबकि पीजी कंपनियों की दवा 90 रुपए के आसपास मिल रही है। यानी १०० रुपए में बेची जाने वाली दवा की असल कीमत १० रुपए है तो ३० फीसदी डॉक्टर और ४० फीसदी मेडिकल स्टोर वाले को हिस्सा देने के बाद भी कंपनी के पास २० फीसदी सुखा मुनाफा आता है। इन्हीं कंपनियों की दवाएं ज्यादा लिखी जाती हैं।
यहां मिलती हंै जेनेरिक दवाएं
शहर में हर केमिस्ट से लेकर दवा बाजार के होलसेल व्यापारियों के पास जेनेरिक दवाओं की भरपूर रेंज है। सरकार ने जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता के मापदंड के अनुसार एक्जीक्यूटिव स्टोर भी खुलवाए हैं। एमवाय अस्पताल में पायलट प्रोजेक्ट के तहत अमृत फॉर्मेसी खोली गई है। यहां गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाओं पर ८० फीसदी तक छूट है। अमृत और आरोग्य स्टोर जेनेरिक दवाएं नहीं लिखने पर ब्रांडेड दवाएं बेच रहे हैं।
आरोग्य रिटेल- १३ स्टोर
जनऔषधि केंद्र- ५
अमृत आउटलेट- १
नियंत्रण नहीं
जेनेरिक दवा लिखने में किसी डॉक्टर को परेशानी नहीं है। भय दवा की गुणवत्ता को लेकर है। केमिस्ट जेनेरिक दवा को लेकर क्या भाव लेता है और कौन सी क्वालिटी की दवा देता है, इसे लेकर कोई नियंत्रण नहीं है। सरकार क्वालिटी मैनेजमेंट करे तो डॉक्टर्स को परेशानी नहीं है।
-डॉ. अनिल विजयवर्गीय, अध्यक्ष, आईएमए, इंदौर
सभी दवा उपलब्ध
हम बिना डॉक्टर की पर्ची के दवा नहीं बेचते। ९५ फीसदी पर्चों पर ब्रांडेड दवा लिखी जाती है। पांच फीसदी डॉक्टर साल्ट ही लिखते हैं। यह प्रतिशत बढऩे पर ही जनता के लिए कम कीमत पर सभी जेनेरिक दवा उपलब्ध होगी।
-केपी सिंह, डायेक्टर, आरोग्य रिटेल
Published on:
30 Mar 2018 04:12 pm
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