10वीं शताब्दी का आयुर्वेद कॉलेज, ये है 64 योगिनी मंदिर में 81 मूर्तियों का रहस्य

इस स्थान पर 950 ईसवीं के बाद अर्थात 10 वीं शताब्दी में आयुर्वेद का विख्यात महाविद्यालय हुआ करता था। 

By: Abha Sen

Published: 21 Jan 2017, 12:40 PM IST

जबलपुर। इतिहास का खजाना उपलब्धियों, संपन्नता, रहस्यों और कलाकृतियों से समृद्ध है। आज हम आपको एक ऐसे ही स्थान की ओर लेकर जा रहे हैं। जो कलाकृति से ही समृद्ध नही है बल्कि कई रहस्य अब भी इसमें छिपे हुए हैं। अब तक इसके संबंध में ढेरों रिसर्च हो चुकी हैं और अब भी शोधार्थी रहस्यों को सुलझाने के लिए प्रयासरत हैं...


- इस स्थान पर 950 ईसवीं के बाद अर्थात 10 वीं शताब्दी में आयुर्वेद का विख्यात महाविद्यालय हुआ करता था। जहां आयुर्वेद की शिक्षा दी जाती थी। उन दिनों शिक्षा खुले आसमान के नीचे ही दी जाती थी। ऐसी ही व्यवस्था यहां भी थी।

- पाशुपथ धर्म कालमुख के महंत यहां रहा करते थे। उन्होंने कई पुस्तकें भी लिखीं। जिनमें इसकी जानकारी प्राप्त होती है। आयुर्वेद विज्ञान के महान शिक्षास्थल के रूप में भी इस स्थान को जाना जाता है।    


temple

-  भेड़ाघाट धुआंधार के समीप स्थित 64 योगिनियों के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर में दरअसल, 81 प्रतिमाएं हैं। जिनमें 15 प्रतिमाएं गुरूदेव, गणेश, हनुमान आदि की हैं। 

- नाड़ीतंत्र आयुर्वेद शरीर विज्ञान का एक प्रमुख ग्रंथ है। 64 योगिनियों को मनुष्य के शरीर में उपस्थित 64 नाडिय़ों से जोड़कर देखा जाता है। 

- इस मंदिर में 64 अनुषंगिकों को देवी दुर्गा का स्वरूप भी बताया जाता है। जहां युद्ध जीतने के लिए शासक तांत्रिक क्रियाएं, पूजन व अनुष्ठान भी किया करते थे। 

- इसकी विषेशता इसके बीच में स्थापित भागवान शिव की प्रतिमा है, जो कि देवियों की प्रतिमा से घिरा हुआ है। इस मंदिर का निर्माण सन 950 ई. के बाद करवाया जाना बताया जाता है। 

- स्थानीय लोगों का मानना है कि ये सभी चौंसठ योगिनी बहनें थीं तथा तपस्विनियां थीं, जिन्हें महाराक्षसों ने मौत के घाट उतारा था। राक्षसों का संहार करने के लिए यहां स्वयं दुर्गा को आना पड़ा था। 


- मंदिर के अंदर भगवान शिव व मां पार्वती की नंदी पर वैवाहिक वेशभूषा में नंदी पर बैठे हुए पत्थर की प्रतिमा स्थापित है। माना जाता है कि भगवान शिव की इस स्वरूप में यह प्रतिमा विश्व में एकमात्र है। 

- मंदिर की चारदीवारी जो गोल है, उसके ऊपर मंदिर के अंदर के भाग पर चौंसठ योगिनियों की विभिन्न मुद्राओं में पत्थर को तराश कर मूर्तियां स्थापित की गई हैं। 


इनका कहना है 
यह स्थान उन दिनों आयुर्वेद का महान शिक्षास्थल हुआ करता था। यहां आयुर्वेद के बड़े-बड़े महंत, विशेषज्ञ रहा करते थे छात्रों को शिक्षा रूपी दान दिया करते थे। शिक्षा के रूप में यह बहुत ही समृद्धशाली स्थान रहा है।  
-राजकुमार गुप्ता, प्रसिद्ध इतिहासकार, लेखक
Abha Sen
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