
किसने बनवाया था दुनिया का सबसे बड़ा सोने का सिक्का, कीमत जानकर रह जाएंगे हैरान
Story Of 12 KG Priceless Artifact : सोने की गिनती महंगे धातुओं में की जाती है और इससे बने गहनों या सिक्कों की मांग कई सदियों से चली आ रही है। आज के मुकाबले राजा-महाराजाओं के समय तो केवल सिक्कों का ही चलन होता था। व्यापार, खरीददारी, घर बनवाना सहित अन्य कई चीजों के लिए ऐसे ही सिक्कों का इस्तेमाल किया जाता था। यहां तक कई राजा अपने सैनिकों को वेतन भी सोने या चांदी के सिक्कों में ही देते थे। हम आपको एक ऐसे सोने के सिक्के के बारे में बताने जा रहे हैं जिसे मुगहल बादशाह जहांगीर ने बनवाया था। इसे दुनिया के सबसे बड़े सिक्के के रूप में जाना जाता है।
यही नहीं, इसके वजन के बारे में जानकर भी आप हैरान रह जाएंगे। इसका वजन 12 किलोग्राम था। जहांगीर (Mughal Emperor Jahangir) द्वारा निर्मित यह बेशकीमती कलाकृति कथित तौर पर आखिरी बार हैदराबाद के आठवें निजाम, मुकर्रम जहह के कब्जे में थी, जिन्होंने कथित तौर पर स्विस बैंक में इस सिक्के को निलाम करने की कोशिश की थी। हालांकि, कई सालों की 'गुमनामी' के बाद यह सिक्का फिर से खबरों में है।
वजह, करीब चार दशक की निरर्थक खोज के बाद केंद्र सरकार द्वारा इसकी नए सिरे से खोज की जा रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के अनुसार, भारत की केंद्रीय एजेंसी सीबीआई उस सिक्के का पता लगाने में विफल रही जो जाह को उनके दादा और हैदराबाद के आखिरी निजाम मीर उस्मान अली खान से मिला था। निजाम को 12 किलो सोने का यह सिक्का विरासत में मिला था।
जानें सिक्के को लेकर इतिहासकारों का क्या कहना है
एचके शेरवानी सेंटर फॉर डेक्कन स्टडीज, मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी की प्रख्यात इतिहासकार सलमा अहमद फारूकी, जिन्होंने दुनिया के सबसे बड़े सोने के सिक्के के इतिहास और विरासत पर शोध किया, ने टीओआई को बताया कि सिक्का अमूल्य है और हैदराबाद का गौरव है। उन्होंने कहा कि अब, भारत सरकार ने 35 साल बाद सिक्के का पता लगाने के लिए नए सिरे से प्रयास शुरू कर दिए हैं।
जिनेवा में सिक्के की निलामी और सीबीआई की एंट्री
फारूकी ने कहा, वर्ष 1987 में जब यूरोप में भारतीय अधिकारियों ने केंद्र सरकार को विश्व प्रसिद्ध नीलामीकर्ता हैब्सबर्ग फेल्डमैन एसए द्वारा 9 नवंबर को पेरिस स्थित इंडोसुएज बैंक की जिनेवा शाखा के माध्यम से जिनेवा के होटल मोगा में 12 किलो सोने के सिक्के की नीलामी करने की सूचना दी, इसके बाद सीबीआई हरकत में आई। उन्होंने आगे कहा, जांच शुरू हुई और कई जानकारियां सामने आईं। सिक्के के इतिहास को आगे बढ़ाते हुए, सीबीआई अधिकारियों ने इतिहासकारों की भूमिका निभाई। कई सीबीआई अधिकारी, जो जांच का हिस्सा थे, अब रिटायर हो चुके हैं, इसलिए इसकी तलाशी अभी तक अधूरी ही रह गई।
उस वक्त इतनी आंकी गई थी सिक्के की कीमत
सीबीआई के पूर्व संयुक्त निदेशक शांतनु सेन द्वारा लिखी गई किताब में इस बात का जिक्र है कि सीबीआई अधिकारियों ने पाया कि जहांगीर ने ऐसे दो सिक्के चलवाए थे। एक को ईरान के शाह के राजदूत यादगार अली को प्रस्तुत किया गया था, जबकि दूसरा हैदराबाद के निजामों की संपत्ति बन गया था। फारूकी ने आगे कहा कि 1987 में एक अधीक्षक-रैंक अधिकारी की अध्यक्षता वाली सीबीआई (CBI) विशेष जांच इकाई XI ने प्राचीन और कला खजाना अधिनियम, 1972 (Antique and Art Treasures Act 1972) के तहत एक FIR दर्ज की थी।
फारूकी ने कहा कि जांच से पता चला कि मुकर्रम जाह (Nizam VIII of Hyderabad Mukarram Jah) 1987 में स्विस नीलामी में दो सोने के मोहरों की नीलामी करने की कोशिश कर रहे थे। इनमें से एक माना जाता है कि 1,000 तोला का सिक्का था जिसकी कीमत 1987 में 16 मिलियन डॉलर थी।
Published on:
01 Jan 2024 09:36 pm
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