script साल में 50 दिन का बूम भी नही रहा संभल | The boom could not be controlled even for 50 days in a year. | Patrika News

साल में 50 दिन का बूम भी नही रहा संभल

locationजैसलमेरPublished: Jan 31, 2024 01:03:13 pm

Submitted by:

Deepak Vyas

- पर्यटकों के सैलाब में बह जाती है व्यवस्थाएं
- सुनियोजित योजना की खल रही कमी
- सैलानियों के साथ स्थानीय बाशिंदे भी हो रहे परेशानियों से रू-ब-रू

साल में 50 दिन का बूम भी नही रहा संभल
साल में 50 दिन का बूम भी नही रहा संभल
चन्द्रशेखर व्यास
जैसलमेर. जैसलमेर में पिछले दिनों गणतंत्र दिवस और उसके बाद शनि और रविवार की सरकारी छुट्टियों के दौरान दिवाली, क्रिसमस व नववर्ष के मौके आने वाला सैलानियों का सैलाब उमड़ा नजर आया। निश्चित ही इससे पर्यटन से जुड़े हजारों लोगों के साथ परोक्ष रूप से पर्यटकों की आवक से लाभान्वित होने वाले जिलावासियों में खुशी की लहर देखी गई लेकिन एक बात जो पिछले प्रत्येक पर्यटन-बूम के अवसर पर देखी जा रही है, वह चिंता में डालने वाली है...और वह है- पर्यटकों की भारी आवक के पूरे साल में बमुश्किल 50 दिनों की समयावधि जैसलमेर से लेकर सम सेंड ड्यून्स तक व्यवस्थाओं का डगमगा जाना। सैलानियों की भीड़ के समानांतर ही यातायात, साफ-सफाई, भिक्षावृत्ति करने वालों की भीड़ की समस्या चौड़ी हो जाती है। दूसरी तरफ पर्यटन को दूषित करने वाले तत्वों के मनमानेपन पर प्रशासन, संबंधित सरकारी महकमों व पुलिस की तरफ से किसी तरह की रोक-टोक नजर नहीं आती। हर किसी को मनमर्जी चलाने का मानो लाइसेंस दिया जा चुका है। इससे देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों में तो निराशाजनक स्थितियां बनती ही हैं, स्थानीय बाशिंदे भी हैरान-परेशान हुए बिना नहीं रह पाते।
हर कहीं टै्रफिक जाम
बम्पर सीजन के समय जैसलमेर शहर में जगह-जगह टै्रफिक जाम के हालात इस बार भी नजर आए। एक साथ सैकड़ों की तादाद में पर्यटकों की गाडिय़ों के आगमन को देखते हुए यातायात व्यवस्था को जिस अंदाज में चाक-चौबंद किया जाना चाहिए, वैसा नहीं किया गया। यही कारण रहा कि सोनार दुर्ग की अखे प्रोल के ठीक बाहर दर्जनों की तादाद में टैक्सियों व अन्य वाहनों की चिल्ल-पौं में सैलानी हो या स्थानीय निवासी का वहां से पैदल गुजरना तक मुहाल हो गया। यही स्थिति गोपा चौक से शिव मार्ग होते हुए एसबीआई चौराहा से अन्यत्र जाने वाले रास्ते में देखने को मिली। पटवा हवेली, गड़ीसर सरोवर के आसपास भी हालत कमोबेश ऐसी ही रही। जब यातायात व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ाने की जरूरत होती है, वे आम दिनों की तुलना में भी कम दिखते हैं।
- पर्यटकों की भीड़ के मद्देनजर जल-बिजली आपूर्ति निर्बाध ढंग से की जाने की अपेक्षा संबंधित विभागों से रहती है, उनके जिम्मेदारों को भी मानो इससे कोई मतलब नहीं होता।
- शहर की सफाई व्यवस्था से लेकर सडक़ों पर मनमाने ढंग से रखे गए ठेलों और दुकानदारों की ओर से आम रास्तों पर सामान-साइन बोर्ड आदि रख दिए जाने के चलते पर्यटकों को पैदल भ्रमण करने में बेजा परेशानियां उठानी पड़ी हैं।
- सैलानियों के पैदल भ्रमण पथ पर जगह-जगह दुपहिया व चार पहिया वाहन खड़े कर दिए जाने की समस्या इस बार भी कायम रही है।
सम में हालात दिखे विषम
जैसलमेर के बाद सबसे ज्यादा सैलानियों का रुझान सम सेंड ड्यून्स भ्रमण का रहता है। दिवाली, क्रिसमस, नववर्ष की भांति गत गणतंत्र दिवस व सरकारी छुट्टियों के दौरान वहां प्रतिदिन 5 से 10 हजार या कभी-कभी इससे भी ज्यादा तादाद में सैलानी जुटे। इतनी भीड़ के वक्त भी पुलिस न तो लपका तत्वों पर अंकुश लगा पाई और न ही लखमणा ड्यून्स पर जीप सफारी, क्वॉड बाइकिंग, पैरासेलिंग व पैरा मोटरिंग जैसी गतिविधियों को अंधाधुंध ढंग से अंजाम देने वालों पर ही अंकुश नजर आया। पूरा लखमणा ड्यून्स वहां लगी दुकानदारियों से अट गया है और कई बार सैलानी सिर धुनने के लिए विवश हो जाते हैं। इस ड्यून्स पर शाम के समय चारों तरफ मशीनों का शोर सुनाई देता है। सैलानियों से अधिकाधिक कमाई करने में हर कोई जुटा नजर आता है लेकिन उन्हें कैसे शांति व सुकून महसूस हो, इसकी चिंता जब सरकारी तंत्र को ही नहीं है तो अन्य लोग भला क्यों करेंगे?

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