scriptLives of 940 pre-mature newborns saved in three years | संजीवनी बना SNCU: तीन साल में 940 प्री-मेच्योर नवजातों की बची जिंदगी | Patrika News

संजीवनी बना SNCU: तीन साल में 940 प्री-मेच्योर नवजातों की बची जिंदगी

locationजांजगीर चंपाPublished: Nov 26, 2023 03:31:45 pm

CG News: जन्म के दौरान क्रिटिकल रूप से गंभीर बच्चों की जान बचाने की दिशा में जिला अस्पताल का एसएनसीयू (विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई) एक वरदान की तरह साबित हो रहा है।

संजीवनी बना SNCU: तीन साल में 940 प्री-मेच्योर नवजातों की बची जिंदगी
संजीवनी बना SNCU: तीन साल में 940 प्री-मेच्योर नवजातों की बची जिंदगी
आनंद नामदेव। जांजगीर। CG News: जन्म के दौरान क्रिटिकल रूप से गंभीर बच्चों की जान बचाने की दिशा में जिला अस्पताल का एसएनसीयू (विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई) एक वरदान की तरह साबित हो रहा है। खासकर उन गरीब परिवारों के लिए जिनके लिए इस तरह की नौबत आने पर इलाज का खर्च उठाना मुश्किल हो जाता है। जिला अस्पताल में ऐसे प्री-मेच्योर नवजातों का इलाज मुफ्त में हो रहा है। 24 घंटे इलाज की सुविधा मिल रही है।
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बीते तीन साल में यहां 940 ऐसे नवजातों की जान बचाई गई है जो जन्म के दौरान काफी कमजोर रूप से पैदा हुए थे और गंभीर थे। एसएनसीयू में हर साल तकरीबन 450 से 500 की संख्या में इस तरह के प्री-मेच्योर नवजात भर्ती हो रहे हैं। जिसमें ने 80 फीसदी नवजातों का सफल ट्रीटमेंट हो रहा है। वहीं मात्र 2 प्रतिशत नवजातों की ही जान नहीं बच पा रही है। इस हिसाब से देखे तो यहां भर्ती होकर स्वस्थ होने वाले बच्चों के आंकड़े अच्छे हैं।
जिला अस्पताल में 12 बेड का एसएनसीयू 2018 से संचालित हो रहा है। यहां एक साथ 12 गंभीर नवजातों का इलाज किया जा सकता है। साथ ही 15 वॉर्मर मशीनें भी है। एनएनसीयू की डीसीएस पिड्रियाटिक्स डॉ. संगीता देवांगन ने बताया कि एसएनसीयू में इलाज की जरूरत ऐसे नवजातों की पड़ती है जिनका जन्म या तो समय से पहले (प्री मेच्योर) हुआ हो। वजन काफी कम हो, जन्म से कोई गंभीर समस्या हो या किसी तरह की अन्य क्रिकिटल समस्या हो, 30 दिन तक के नवजात को यहां भर्ती कर इलाज किया जाता है।
34 माह में 185 केस रेफर भी...

हालांकि इन 34 माह में एसएनसीयू में भर्ती 16 नवजातों की मौत भी हुई है। वहीं 185 नवजातों को स्थिति और अधिक क्रिटिकल होने पर यहां से हायर ट्रीटमेंट के लिए बिलासपुर रेफर किया गया। वहीं 60 परिजनों ने भर्ती के बाद खुद से लामा (डिस्चार्ज) ले लिया जिससे बेहतर इलाज में थोड़ी कमी भी नजर आ रही है। हालांकि इसके पीछे यहां सेटअप के विरुद्ध स्टाफ और और जरूरी उपकरणों की कमी बताई जा रही है। 12 में से 9 स्टाफ ही पदस्थ हैं।
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प्राइवेट अस्पतालों में 15 से 20 हजार तक खर्च...

निजी अस्पतालों में इस तरह के इलाज के लिए एक दिन का खर्च ही 2 से 4 हजार रुपए तक आता है। अधिकांश मामलों में नवजात बच्चों को कम से कम 5 से 6 दिन तक भर्ती करना ही पड़ता है। इस तरह 6 दिन भी नवजात को रखना पड़ा तो 12 से 15 हजार रुपए फीस चुकानी पड़ती है। ऐसे में गरीब परिवारों के लिए ऐसी नौबत आने पर आर्थिक समस्या खड़ी हो जाती है। वहीं जिला अस्पताल में विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई में यह इलाज पूरी तरह से मुफ्त मिल रहा है।
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गंभीर रूप से बीमार नवजातों के इलाज के लिए एसएनसीयू की सुविधा 24 घंटे उपलब्ध कराई जा रही है। हर साल करीब 80 फीसदी नवजातों का सफल ट्रीटमेंट हो रहा है। सुविधाओं में विस्तार को लेकर और प्रयास भी कर रहे हैं ताकि रेफर करने की नौबत ही न आए।
डॉ. एके जगत, सिविल सर्जन

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