जोधपुर के हजारों श्रमिकों के नसीब में क्यों नहीं है 'पत्थर', भारत सरकार की हरी झंडी बदल सकती है तकदीर

मंडोर के बेरीगंगा वन क्षेत्र में खनन बंद होने से पलायन को मजबूर हजारों श्रमिक

By: Nandkishor Sharma

Published: 24 May 2018, 03:45 PM IST

जोधपुर . मंडोर रेंज में स्थित बेरीगंगा वनक्षेत्र के सेण्ड स्टोन क्वारी लाइसेंस के लिए खसरा संख्या 1259, 1262, एवं 1294 में खानों को डी रिजर्व करने का मामला लंबे अर्से से ठंडे बस्ते में होने के कारण खनन कार्य बंद हो चुका है। नतीजन करीब 500 से अधिक खानों से जुड़े दस हजार से अधिक श्रमिक और खनन व्यवसाय से प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से जुड़े हजारों परिवारों के समक्ष रोजी रोटी का संकट पैदा हो गया है। पत्थर खनन कार्य के साथ बजरी खनन पर अंकुश के कारण हजारों श्रमिक जोधपुर से अन्य राज्यों की ओर पलायन होने को मजबूर हो गए है। वर्ष 2009 में क्षेत्र की वनभूमि के अनारक्षण के लिए खनिज अभियंता ने कुल 118.82 हेक्टेयर वन भूमि के लिए डायवर्जन (प्रत्यावर्तन ) प्रस्ताव तैयार कर वनविभाग को सौंप दिया था। मुख्य वन संरक्षक ने लखनऊ ने क्षेत्र का मौका निरीक्षण कर कुछ कमियां गिनाई और संशोधित प्रस्ताव में करीब 146 हेक्टेयर कर दिया। पूर्ण संशोधित प्रस्ताव वन एवं पर्यावरण मंत्रालय भवन नई दिल्ली में डायरेक्टर जनरल ऑफ फॉरेस्ट की मंजूरी के लिए विचाराधीन है। यदि वन क्षेत्र में स्थित क्वारी क्षेत्र को अनारक्षण घोषित किया जाता है तो वनविभाग को प्रति हेक्टेयर 9 लाख रुपए नेट प्रजेंट वेल्यू राशि और बदले में उतने ही जमीन तथा राज्य सरकार को प्रतिमाह करोड़ों का राजस्व मिल सकता है।

कुल 5067.52 एकड़ वनक्षेत्र
वनविभाग मंडोर रेंज के मोतीसरा व बेरीगंगा वन क्षेत्र का क्षेत्रफल 12 हजार 668.16 बीघा याने करीब 5067.52 एकड़ है। सरकारी रेकर्ड में बेरीगंगा वन क्षेत्र का कुल 20.5 किलोमीटर एरिया वन विभाग की मिल्कियत है। मंडोर रेंज के बेरीगंगा वन क्षेत्र में खसरा संख्या 46, 47, 48, 1259, 1262, 1287, 1288, 1289, 1290, 1291, 1292, 1293, 1294, 1295, 1296, 1297, 1298, 1299, 1300, 1301,1302, 1302, 1303, 1304, 1305,1306, 1307, 1308, 1405, 1406 शामिल है। इनमें डायवर्जन प्रस्तावित केवल चार खसरे ही है जो 1294, 1405, 1259 व 1262 है। भारत सरकार की अनुमति जरूरी

रक्षित वन क्षेत्र में वन संरक्षण अधिनियम 1980 व सर्वोच्च न्यायालय के 12 दिसम्बर 1996 के आदेश के मुताबिक (सरकारी विभाग सहित) कोई भी व्यक्ति गैर वानिकी कार्य नहीं कर सकता है जब तक कि उसे भारत सरकार की अनुमति नहीं मिलती। डायवर्जन की मंजूरी नहीं होने तक वनक्षेत्र में खनन, अतिक्रमण अवैध माना जाएगा।

दो बार गजट नोटिफिकेशन
राज्य सरकार ने 1962 में बेरीगंगा वन क्षेत्र को रक्षित वन क्षेत्र घोषित किया था । उसके बाद पुन: 1994 में संशोधित गजट नोटिफिकेशन जारी किया गया परन्तु खनन विभाग ने बेरीगंगा वन क्षेत्र में खनन पट्टे जारी कर दिए एवं साथ ही क्षेत्र में खनन गतिविधियां संचालित की जा रही है। इसके कारण बालसमंद नहर का आगोर क्षेत्र भी पूरी तरह तबाह हो चुका है। जोधपुर के पर्यावरणविद् रामजी व्यास की ओर से एनजीटी के समक्ष एडवोकेट विकास बालिया की ओर से दायर याचिका पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ) की चल पीठ ने बेरीगंगा वन क्षेत्र एवं बालसमंद नहर आगोर क्षेत्र में किसी भी तरह की खनन गतिविधि बिना पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की अनुमति के संचालित नहीं करने का आदेश दिया था। 20 हजार परिवारो की रोजी रोटी का सवाल

बेरीगंगा खनन क्षेत्र के मात्र चार खसरे वनविभाग के नाम दर्ज हो गए। जबकि बेरीगंगा में खनन कार्य 1952 से अनवरत चल रहा था। अधिकारियों की उस भूल सुधार के लिए करीब 118 हेक्टेयर वनभूमि डायवर्जन का प्रस्ताव वर्ष 2004 में तैयार किया गया। संशोधित और अन्य औपचारिकताओं के बाद 2011 में 128 हेक्टयेर का प्रस्ताव भेजा गया। तीन साल पहले 146 हेक्टेयर वनभूमि डायवर्जन का प्रस्ताव भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के समक्ष विचाराधीन है। प्रभावित वन क्षेत्र के अधीन खानों में खनन कार्य लंबे अर्से पहले ही बंद हो चुका है।

20 हजार परिवारों के समक्ष रोजी रोटी का संकट
पश्चिमी राजस्थान में खनन क्षेत्र ही ऐसा उद्योग है जो जरूरतमंद को आसानी से रोजगार दिलाने में सहायक है। इसमें कुशल-अकुशल श्रमिक को भी सहज रूप से रोजगार मिलता है। जोधपुर खनन व्यवसाय में नागौर, बाड़मेर, जैसलमेर , मारवाड़ सहित मकराना, चुरू, सीकर, सीकर आदि विभिन्न क्षेत्रों के श्रमिक भी रोजगार के लिए जोधपुर पहुंचते है। राज्य व केन्द्र सरकार को खनन व्यवसाय से जुड़े प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष करीब 20 हजार से परिवारों के समक्ष रोजी रोटी के संकट को देखते हुए बेरीगंगा वन क्षेत्र के डायवर्जन प्रस्ताव को जल्द मंजूरी देनी चाहिए।

निर्मल कच्छवाह, अध्यक्ष जोधपुर पत्थर उद्योग संघ

जलग्रहण क्षेत्र में नहीं मिले इजाजत
बेरीगंगा में बालसमंद नहर के जल ग्रहण और बहाव क्षेत्र में किसी भी तरह के खनन की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए। बालसमंद नहर के केचमेंट एरिया में वन्यजीवों के आश्रय स्थल उजडऩे से हनुमान लंगूर, जरख, सियार, लोमड़ी, खरगोश, जंगली बिल्ली, नेवले, चंदनगोह, कछुए सहित विभिन्न प्रजाति के वन्यजीवों के आवास स्थल खत्म हो चुके है। वन्यजीवों के साथ पक्षियों की खाद्य शृंखला कुमटिया, पलाश, गुगल, बेर, केर आदि औषधिय पौधों का वजूद खत्म होने के कगार पर है। खनन के साथ अंधाधुंध हो रहे अतिक्रमण भी हटाने चाहिए।

रामजी व्यास, अध्यक्ष आध्यात्मिक क्षेत्र पर्यावरण संस्थान

डायवर्जन प्रस्ताव शीर्ष स्तर पर लंबित
बेरीगंगा वन क्षेत्र के सभी खसरों में खनन कार्य पिछले लंबे अर्से से पूरी तरह बंद है। बेरीगंगा वन क्षेत्र के डायवर्जन प्रस्ताव संशोधित कर भारत सरकार के पर्यावरण मंत्रालय के पास भेजे जा चुके है। जल्द ही डायवर्जन की प्रक्रिया पूरी होने की संभावना है।

आरएस शेखावत, मुख्य वन संरक्षक जोधपुर संभाग

Nandkishor Sharma Desk
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