रहस्य: नदी के बीच में विराजित हैं ये पत्थर, कही भी रखो सुबह वहीं मिलता है स्थापित

रहस्य: नदी के बीच में विराजित हैं ये पत्थर, कही भी रखो सुबह वहीं मिलता है स्थापित

Anjalee Singh | Publish: Jun, 15 2019 07:00:00 AM (IST) Kawardha, Kabirdham, Chhattisgarh, India

छत्तीसगढ़ के मंदिरों और पुरातात्विक स्थलों में कुदरत के कई रहस्य अब भी लोगों का इंतजार कर रहे हैं।

एक ऐसा ही रहस्य लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

कवर्धा/रायपुर. छत्तीसगढ़ के मंदिरों और पुरातात्विक स्थलों में कुदरत के कई रहस्य अब भी लोगों का इंतजार कर रहे हैं। एक ऐसा ही रहस्य लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यहां के गांव के तालाब मेें एक पत्थर है जो आसपास कहीं भी हटा देने पर रात में खुद ही अपनी नियत स्थान पर लौट आता है। स्थानीय ग्रामीण इसे चलने वाला पत्थर कहते हैं। इसे बगरंगपाठ देव मानकर अब इसकी पूजा की जा रही है।

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कवर्धा के भाटकुंडेरा गांव के पुराने तालाब के पास बरगद का पेड़ है। इसके नीचे शिव मंदिर व शीतला मंदिर बने हैं। इसी तालाब के अंदर बगरंग पाठ देव का वह चलने वाला पत्थर मौजूद है। आकृति में आयताकार यह पत्थर रवादार है। लगभग चार फीट लंबा और ढाई फीट चौड़ा है। गांव के लोगों ने पत्रिका को बताया कि 40-50 साल पहले हम लोग ने कुछ ग्रामीणों को साथ लेकर बगरंग पाठ पत्थर को उनके स्थान से उठाकर तालाब किनारे स्थापित करने की कोशिश की। पत्थर वहां रख भी दिया गया, लेकिन सुबह वहां पहुंचने पर पता चला कि पत्थर अपने पुराने स्थान पर पहुंच गया है।

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एक नहीं, कई बार की गई कोशिश
ग्रामीणों ने बार-बार कोशिश किए, लेकिन वे सफल नहीं हो सके। ऐसा कई बार हुआ, तब लोगों को लगा कि इस पत्थर में स्वत: चलने की क्षमता है। उसके बाद सभी उसे देवतुल्य मानकर पूजा करने लगे। ग्रामीणों की मान्यता है कि यह देव उनकी समृद्धि की रक्षा करते हैं।
कहां से आया यह चमत्कारी पत्थर
यह चमत्कारी पत्थर कहां से आया, इसके बारे में गांव में किसी को सही जानकारी नहीं है। कुछ लोगों का मानना है कि यह आसमान से गिरा था। तो कुछ इसे जमीन से निकला हुआ बता रहे हैं। इस पत्थर के पीछे की कहानी अब तक कोई नहीं सुलझा पाया है। हां अब यह लोगों के आस्था का केन्द्र बन चुका है।

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ऐसे हुई पत्थर में कला की जानकारी
ग्रामीण ने बताया कि पत्थर तालाब के एक किनारे पर है। जहां से ग्रामीण निस्तारी करते है। रास्ते में होने के कारण कुछ लोगों ने पत्थर को सुरक्षित तालाब किनारे पर स्थापित किया, लेकिन रात्रि बाद सुबह पत्थर अपने नियत स्थान पर पुन: विराजमान हो जाते। लोगों को कुछ समझ नहीं आया। यह सिलसिला कई बार दोहराया गया। इसके बाद इस पत्थर में स्वत: चलने की कला विद्यमान सामने आई।

सुरक्षित रखने की आवश्यकता
अपनी खुबियों के कारण यह पत्थर लोगों के बीच आकर्षण और आस्था का केन्द्र बना हुआ है। इसे देखने दूर-दूर से लोग आते हैं। स्थानीय ग्रामीण इसकी सुरक्षा और संरक्षण के लिए भी चिंतित हैं। उनका कहना है कि ठीक से देखभाल नहीं हुई तो यह पत्थर नष्ट भी हो सकता है। कुछ वर्ष पहले गांव के शितला मंदिर समिति के सदस्यों ने पत्थर के स्थान पर ही एक चबूतरा बनवा दिया है जहां श्रद्धालु पूजा-पाठ कर पाते हैं।

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बिना जांच इस संबंध में कुछ नहीं कहा जा सकता है। हां पत्थर में ऐसी कला गुरुत्वकर्षण के कारण हो सकती है।
आदित्य श्रीवास्तव, सदस्य, जिला पुरातत्व समिति कबीरधाम

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