ऐसे पड़ी अवध किसान आंदोलन की नींव, हक की खातिर किसानों ने लड़ी लड़ाई

20वीं सदी की शुरुआत से ही किसानों की दशा-दुर्दशा,समस्याएँ, उनके विरोध, विद्रोह, मुखरताओं तथा सक्रियताओं को हिन्दी के रचनाकार सामने लाते रहे हैं

By: Hariom Dwivedi

Updated: 22 Oct 2019, 05:07 PM IST

लखनऊ. भारत विश्व में प्राचीनतम कृषि-प्रधान देश है। सम्राट अकबर के समय में टोडरमल की पहल और सूझ-बूझ से किसानों के जोत-ज़मीन की पहली व्यवस्थित प्रणाली बनी और लागू हुई। उससे पहले की मान्यता है कि हमारे यहाँ का किसान खेती-बाडी़ के साथ ही अपनी ज़मीन का भी मालिक होता था। परम्परागत रूप से अपनी उपज के एक तय-अंश को राजकोष में नियत समय तक दे देना उसका दायित्त्व होता था। अकाल,सूखा,अतिवृष्टि या महामारी जैसी आपदा से यदि कभी उसकी फसल का नुकसान हुआ,तब उपज का अंशदान देने की अनिवार्यता के बजाय फसल की क्षति के एवज में राजकोष से उसकी यथेष्ट भरपायी की जाती थी। राज-समाज के बीच यही पारम्परिक-व्यवस्था स्वीकृत व प्रचलित थी।

इसमें दिक़्क़त और तब्दीली का सिलसिला तब शुरू हुआ, जब व्यापार करने के बहाने अँगरेज़ हिन्दुस्तान में आ जमे और अपने व्यापारिक-हित की आड़ लेकर मुगल-बादशाह से उन्होंने सुरक्षा-तन्त्र के नाम पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना बनाकर रखने का अधिकार प्राप्त कर लिया। इसी के साथ कुटिल-कपटी अंग्रेज बेहद चालाकी से यहाँ के राजे-रजवाडो़ं के बीच अपनी पहुँच-पैठ बनाते हुए इन सब के सत्ताधिकारों में भी जबर्दस्त;और कभी-कभी तो उससे भी कहीं आगे तक की दख़लन्दाजी़ करने लग गये! और भी दुर्भाग्यपूर्ण तो दरअस्ल तब ये हुआ कि कमजो़र होती व छीजती मुगलसत्ता के उस दौर में प्रभावशाली होती ईस्ट इण्डिया कम्पनी,यहाँ के देशी राजिओं और-रजवाडों की जोत-ज़मीन में हस्तक्षेप के द्वारा ब्रिटिश-प्रणाली की ऐसी पद्धति संचालित करने में कामयाब होती गयी, जिसमें कम्पनी समेत बिचौलियों की भी पौ बारह रहे और किसान के बजाय ज़मीन पर राजा से लेकर जमींदार तक के ही स्वत्त्वाधिकार स्थापित रहें।इससे ज़मीन को जोतते-बोते रहने से उस पर इस देश के अन्नदाता का परम्परागत रूप से जो मालिकाना-हक़ कायम रहता आया था,अन्नदाता का वह अधिकार ही ख़त्म हो गया!अब तो ज़मीन किसान को तय-अवधि के लिये और बँधी-बँधाई शर्तों पर ही जोतने-बोने को मिलनी थी।धन-धान्य व उपज न होने पर,राजकोष की ओर से भरपायी होने की कौन कहे,अब तो उसकी नियति हुकुम के मज़बूर-गुलाम की बनाकर छोड़ दी गयी थी!

अतएव सनातन-काल से इस देश की धरतीमाता की कोख से अन्न उपजाते और अन्नदाता कहलाते किसान के हाथ से उसकी ज़मीन जाने के साथ-साथ यह देश भी ईस्ट इण्डिया कम्पनी के चंगुल में शनैःशनैःजकड़ता गया! तब से 'सोने की चिडि़या' कहलाते भारत पर ज़मीनी हक़ की खा़तिर यहाँ के राजे रजवाडे़ नहीं,किसान और उससे जुड़े आम-अवाम ही हमेशा सारी लडा़इयाँ लडते आये हैं।१७६७ से१९००ई.तक की तक़रीबन१३३वर्षों की इन सभी लडा़इयों समेत 'भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम' कहलाता सन्१८५७ का वह विप्लव भी रहा है,जिसकी विफलता के फलस्वरूप यहाँ पर 'अँगरेजो़ं का विक्टोरिया-राज' का़यम हो गया।

१७वीं-१८वीं शताब्दी के दौरान गंगा-जमुना के मैदान से लेकर देश के धुर दक्षिण तक आदिवासी मुण्डा,चेरो,नील,भील,कूका,मोपिला, सन्यासी,तमाड़,पहाडियाभूमिज,पागल पन्थी,कोली,संथाल, तिलकामाँझी,संन्यासी,संथाल आदि अनेक किसान-विद्रोहों में अंग्रेजो़ंं और उनकी औपनिवेशिक फौजों को नाकों चने चबवाते रहे हैं।इतिहास के पन्नों मे़ंं इन सबकी सम्यक्-चर्चा हुई है किन्तु;तब कवियों,लेखकों आदि में वह जागरूकता नहीं थी कि वे इन सबकी चर्चा अपनी रचनाओं में साहस के साथ करते।

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वस्तुतःराष्ट्रीयता और देशप्रेम की व्यापक चेतना की दृष्टि से सबसे पहले भारतेन्दु हरिश्चन्द१९वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में बताते हैं कि हमारी गफ़लतों से भारत का धन लूटकर अंग्रेज़ अपने देश लिये जा रहे हैं।उनके व्यंग्य-मिश्रित नाटक 'भारत -दुर्दशा'(१८७३)में दारुण-विलाप वाले शोक-गीत के रूप में वह सब इस तरह से अभिव्यक्त हुआ था--
'आवहु सब मिलिके रोवहु भाई!
हा!हा!!भारत-दुर्दशा न देखी जाई!'
भारतेन्दु के इस स्वर में 'अँगरेज-राज,सुख-साज सजे सब भारी' लिखते हुए जिस तरह से भरे-पेट तबकों की कलई यहाँ उतार दी गयी है,वैसे ही इसमें विषाद के साथ 'सब धन बिदेस चलि जात,यहै अति ख्वारी' के आर्तनाद को भी पढा़ जा सकता है,जिसमें अन्तर्वेदना के रुदन व विलाप और भी सघन एवं मर्मान्तक होकर आये है!इस सबने रचनाकारों में लिखने के हौसलों को हिम्मत दीं और पत्रिकाओं,सम्पादकों, अख़बारों आदि के जरिये किसानों की तकलीफों,समस्याओं समेत दारुण-दुख वगैरह भी उजागर होने लग गये!

आज १७अक्तूबर से शुरू हो रही 'अवध किसान आन्दोलन' की शताब्दी पर एतद्विषयक लेखन तथा पत्रकारिता आदि में झाँकने की यहाँ एक कोशिश भर है। हम पाते हैं कि २०वीं सदी की शुरुआत से ही किसानों की दशा-दुर्दशा,समस्याएँ, उनके विरोध,विद्रोह,मुखरताओं तथा सक्रियताओं को हिन्दी के रचनाकार सामने लाते रहे हैं।द्विवेदी युगीन 'भारत भारती प्रसिद्ध-कवि मैथिलीशरण गुप्त की पहली कृति है,जो--'हम क्या थे,क्या हो गये और क्या होंगे अभी,आओ विचारें आज मिलकर ये समस्याएँ सभी' जैसी आत्मालोचकीय-दृष्टि देते हुए किसानों की दुरवस्थाओं से भी हमें रूबरू कराती है।महावीरप्रसादजी द्विवेदी भी 'सरस्वती' में किसान-विषयक रचनाओं को जगह देते हुए स्वयं भी लिख रहे थे।'सरस्वती' में गयाप्रसाद शुक्ल'सनेही' की कविताएँ 'किसान' व'अभागा कृषक'(जनवरी१९१२ व अप्रैल१९१४),मैथिलीशरण गुप्त की 'कृषक-कथा' तथा 'भारतीय कृषक' कविताएँ क्रमशः (जन.१९१४-मई १९१६) में आयीं।अन्यान्य रचनाकारों की रचनाओं के साथ बडे़ फलक वाली कृतियों में मैथिलीशरण गुप्त की 'किसान'(१९१५),'कृषक क्रन्दनःगयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'(१९१६) व 'अनाथ':सियारामशरण गुप्त (१९१७) प्रबन्ध काव्य भी उस समय जनमानस का ध्यान व्यापकता से आकृष्ट कर रहे थे।

गणेशशंकर विद्यार्थी ने अपनी पत्रकारिता से नया इतिहास रचा!उनके सम्पादन में निकलता 'प्रताप' देश की स्वाधीनता व क्रान्तिकारियों के आन्दोलनों के समान्तर देश के किसानों से जुडे़ सभी आन्दोलनों की गतिविधियों को भी हमेशा बेहद प्रमुखता से छापता रहा है।विद्यार्थीजी ने मेवाड़(राजस्थान) की 'बिजोलिया रियासत के 'बिजोलिया किसान आन्दोलन' से शुरुआत से ही 'प्रताप' को तो जोडा़ ही,वह खुद भी इससे बेहद घनिष्टता से जुडे़ रहे,जो१९१४-'३९ तक चला।यह देश में दीर्घकालिक किसान आन्दोलनों में से एक था।लगभग८० तरह के लगान व देनदारियों के बोझ तले दबे किसान यहाँ की रियासत के अलग-अलग ओहदेदारों से बराबर प्रताडि़त होते रहते थे।इस किसान आन्दोलन को प्रमुखता से अपने पन्नों में 'प्रताप' ने जगह दे करके राष्ट्व्यापी बना दिया!इसके नेता विजय सिंह 'पथिक' तथा उनके सहयोगी रामनारायण चौधरी के बीच उठे मतभेद दूर करने के लिये विद्यार्थीजी अस्वस्थता के बावजूद बिजोलिया गये!तिलक का 'केसरी' अख़बार भी तब 'बिजोलिया किसान आन्दोलन' से गहरे से जुडा़ था किन्तु;'प्रताप' तथा विद्यार्थीजी जैसी घनिष्टता एवं संलग्नता और उसके गहरे-प्रभाव को इसी से समझिये कि बिजोलिया रियासत में 'प्रताप' को पूरी तरह से प्रतिबन्धित कर दिया गया!'प्रताप' के पूरे प्रकाशन-काल में यह पहली बार हुआ कि 'प्रताप' पर प्रतिबन्ध लगा तो इससे 'प्रताप' की साख बढी़ ही!

किसान आन्दोलन से जूझती बिजोलिया रियासत ने अपनी इस कार्रवाई को तसल्लीबख्श भले समझा हो एवं इस नाते वहाँ ग्राहकों को 'प्रताप' की प्रतियाँ मिलनीं मुहाल हो गयीं!परन्तु इतने से ही 'बिजोलिया किसान आन्दोलन' को राष्ट्रीय -पहचान मिल चुकी थी।अब रियासत ने सोचा कि किसानों को जेलों ठूँसकर उनकी एकजुटता को बलपूर्वक तोड़ देंगे, तो बदले में किसानों की महिलाओं ने इसमें अपनी जबर्दस्त भागीदारी से ऐसी चेतना भरी कि उसकी प्रखरता की धार व गति अप्रत्याशित रूप से और भी तेज़ हो गयी।'बिजोलिया किसान आन्दोलन' आकाश छूने लगा!'प्रताप' ने दमन की ये सब देश के सामने सविस्तार रखा तो बजोलिया के राजा की बेहद थू-थू हुई और वे समझौते पर आ गये।तभी युवाकवि- सुदर्शन 'चक्र' ने लिखा था:'डर नहीं था तोपों के भी तेवरों के ताप का,यही तो प्रताप था,'प्रताप' के प्रताप का!'विडम्बना कि बिजोलिया किसान आन्दोलन की इस सफलता के शीर्ष -मुकाम से साक्षात् करने से पहले ही विद्यार्थीजी कानपुर के साम्प्रदायिक दंगे में शहीद हो गये थे!

इधर १९१७ के आसपास से उत्तर प्रदेश में कुछ इलाकों व अवध-क्षेत्र के किसानों पर यहाँ के राजे-रजवाडो़ं,ज़मीदारों, ताल्लुकेदारों तथा ब्रिटिशराज के करों,हारी-बेगारी से लेकर १६०-७०से भी ज़्यादा कोटि की देनदारियों का पहाड़ टूटा पड़ता था। इससे उबरने के लिये कांग्रेस तथा गाँव के लोगों द्वारा बनायी किसान सभा की गतिविधियाँ से रियासतों एंव जमीदारों में बेचैनी तो होती थी।परन्तु प्रतिपक्षी रियासतों की दबंगई व ब्रिटिशसत्ता की भरपूर सरपरस्तीं;किसान सभाओं की कोशिशें को परवान नहीं चढ़ने देती थीं।विद्यार्थीजी को भी इसका अहसास था।वह इन सबकी टोह ले-लेकर 'प्रताप' में खबरें छापते थे।साथ ही किसान सभाओं व उनसे जुडे़ लोगों तक नज़दीकी सम्पर्क व संवाद कायम रखते हुए वह 'प्रतापं' के लिये प्रामाणिक तथा त्वरित समाचार पहुँचाने में सक्षम व परम्-विश्वसनीय-सूत्र भी जुटाते रहते थे।किसान सभाओं में अपनी आकस्मिक-उपस्थिति से भी कभी-कभी वह अचम्भित कर देते!किसाअरणीन आन्दोलनों के इस पूरे दौर में विद्यार्थीजी कि ये तत्पर-त्वरित कार्यशैली ही थी कि 'प्रताप' किसानों के संघर्ष का प्रमुख-संवाहक और मुखपत्र के रूप में सदैव अग्णी बना रहा है।उस दौर में प्रताप प्रेस से छपती 'प्रभा'मासिक के पन्ने भी किसानों व उनके आन्दोलन से जुडे़ तथ्यों व रचनाओं को समेटने की भूमिका में मुसतैद रहे हैं। जनवरी१९२२में रायबरेली के मुंशीगंज में घटित अमानवीय गोलीकांड की नृशंसता,अवध-क्षेत्र ही नहीं बल्कि;किसानों के सभी आन्दोलनों के लिये प्रेरणा-स्रोत बन गयी!कितनी ही कहानियाँ,कविताएँ,सम्पादकीय,लेखादि लिखे जाते और छपते रहे हैं।आज उन सबका अल्पांश ही उपलब्ध है।


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कम ही लोगों को पता है कि शुरू से ही उर्दू में लेखन करते आये प्रेमचन्द से विद्यार्थीजी,प्रेमचन्द से हिन्दी में लिखने का आग्रह बराबर करते थे।सो सन्१९१४में प्रेमचन्द ने हिन्दी में जब पहली रचना('परीक्षा' कहानी)लिखी,तब छपने के लिये उसे सीधे विद्यार्थीजी को ही भेजी।प्रेमचंद की ये पहली हिंदी रचना 'प्रताप' के विजय दशमी अंक(अक्तूबर१९१४) में छपी थी।ऐसे में ये कितना हैरत अंगेज़ है कि किसानों के जीवन-संघर्षों और उनकी दुश्वारियों से निकटता से परिचित प्रेमचंद किसानों के आन्दोलनों;विशेषतः'अवध किसान आन्दोलन' के दौर में 'प्रेमाश्रम' उपन्यास व इस पर ही आधारित नाटक 'संग्राम' भी लिखते तो हैं किन्तु;अपने आदर्शवादी व काफी कुछ गान्धी के प्रभावग्रस्त निदान--'आश्रम' के इर्द-गिर्द ही सिमटे रह जाते हैं। ऐसे में अवध के किसान आन्दोलन की अप्रत्याशित तथा चरम परिणति के नाते किसानों की बलि लेते मुंशीगंज-गोलीकाण्ड(जिसको विद्यार्थीजी ने 'दूसरा जलियाँवाला बाग़' काण्ड की संज्ञा दी थी)से प्रेमचन्द की निरपेक्षता हतप्रभ करती है!
यहीं इसे भी जान लेना प्रासंगिक होगा कि उसी दौर में डेढ़- सौ से ऊपर थोपे हुए करों की देनदारियों से बिलबला रहे अवध के किसानों पर जो बीत रही थी,उससे न काँगरेसियों का कुछ लेना-देना था,न मदनमोहन मालवीय व क्रान्तिधर्मा संगठन के सदस्यों का और न इन किसानों से सहानुभूति जताते किसी और का ही!प्रतापगढ़ में रूर गाँव के झिगुरी सिंह-सहदेव सिंह,सारी कोशिशों के बावजूद किसानों को वैसे संगठित करके एकजुटता को धार-रफ़्तार नहीं दे पा रहे थे,जैसा कि बेहद ज़रूरी होता जा रहा था।ऐसे में फीजी से लौटे गिरमिटिया बाबा रामचन्द्र,वकील माताबदल पाण्डेय आदि की एकजुटता से १७अक्तूबर,१९२० को बनी 'अवध किसान सभा',उससे जवाहरलाल नेहरू समेत अवध के किसानों के व्यापक समुदाय का सघन-जुडा़व,और 'अवध किसान आन्दोलन' से उपजी सक्रियता,अग्रगामिता,संघर्ष-जीविता इत्यादि इतिहास की विषय-वस्तु बन गये हैं और मुशीगंज गोलीकाण्ड,अवध से इतर किसानों के प्रासंगिक आन्दोलनों के लिये भी प्रेरणास्रोत बन गया है!
अतःकिसान आन्दोलनों और 'अवध किसान आन्दोलन' से सम्बन्धित अगणित रचनाएँ व पुस्तकें लिखी गयीं व छपी हैं।यहाँ सब का उल्लेख सम्भव नहीं,फिर भी मुख्य कृतियों में ले तो नेहरूजी की 'मेरी कहानी' में अवध किसान आन्दोलन के प्रसंग हैं।प्राणनाथ विद्यालंकार लिखित कृति 'किसानों पर अत्याचार' भी उल्लेख्य है।अवध किसान आन्दोलन को लेकर माताबदल पाण्डेय, (प्रतापगढ़) द्वारा आजा़दी से पूर्व प्रकाशित हुई पुस्तक-माला की तीन पुस्तकें हैं।रायबरेली में सक्रिय किसान आन्दोलन पर अमरबहादुर सिंहजी 'अमरेश' की 'एक और जलियायाँवाला...'(१९८१)पुस्तक मुख्य रूप से मुंशीगंज-गोलीकाण्ड पर है तो श्रीराम सिंह द्वारा लिखित 'रायबरेलीःकिसान आन्दोलन की यज्ञ-भूमि'(१९८५) पुस्तक में रायबरेली जिले के ४किसान आन्दोलनों के दमन में घटित गोलीकाण्डों की विषय-वस्तु को समेटा गया है।किसानों एवं उनकी जीवन स्थितियों,विभिन्न किसान आन्दोलनों;'अवध किसान आन्दोलन' से सम्बन्धित एम०एच०सिद्दीकी़,निशा राठौर,जे.एस.नेगी व अंशु चौधरी आदि के गहन अध्ययन व शोध भी सुविज्ञ हैं।इनमें से कुछेक शोध-प्रबन्ध,पुस्तक रूप में भी आये।यथाः'किसान-विद्रोह,कांग्रेस और अंग्रेजी़राजः १८८६-१९२२';लेखक:कपिल कुमार।वीर भारत तलवार की 'किसान राष्ट्रीय आन्दोलन और प्रेमचन्द' व डाँ.महेन्द्र प्रताप कृत 'उत्तर प्रदेश में किसान आन्दोलन' नाम की पुस्तकें भी इसी क्रम में उल्लेखनीय हैं।कथाकार कमलाकान्त त्रिपाठी का उपन्यास 'बेदखल'(१९९७)'अवध किसानों आन्दोलन' के इतिहास और लोक-श्रुति का रोचक समन्वय है।आर.पी. सरोज ने हरदोई के 'एका'आन्दोलन के नायक पर केन्द्रित 'क्रान्तिवीर मदारी पासी' पुस्तक तथा लेखक बृजमोहन ने 'क्रान्तिवीर मदारी पासीं' नाम से उपन्यास लिखा तो इसी क्रम में लिखी-छपी राजीवकुमार पाल की नवीनतम् कृति 'एका'(२०१९)कई विधाओं का सम्मोहक समुच्चय है।बाबा रामचन्द्र की पत्नी पर 'किसानिन जग्गी देवी' पुस्तक प्रिया मेहरोत्रा ने लिखी है।सुभाषचन्द्र कुशवाहा कृत 'अवध का किसान विद्रोह'(२०१८) भी मेहनत से लिखी हुई पठनीय पुस्तक है।

किसान आंदोलन के नायकों को भुला दिया
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन लोगों ने किसान आन्दोलनों में खुद को खपाया,उनमें से बहुतायत के वंशज, अपने हुतात्मा पुरखों के बारे में अधिकांशतयः आज न के बराबर जानते हैं। कोई प्रामाणिक अभिलेख व धरोहर इनमें से यदि किसी के पास मिले तो अपवाद ही होगा! अतः प्रयत्न पूर्वक 'अवध किसान आन्दोलन' के इस शताब्दी वर्ष में जो भी दुर्लभप्राय सामग्री और प्रमाणिक जानकारियाँ मिल सकेंगी, निश्चय ही वे सब बडी़ उपलब्धि होंगी।

हम थे क्या,क्या हो गये और क्या होंगे
युगीन कवियों में सबसे पहली है--मैथिलीशरण गुप्तजी की विशिष्ट-कृति 'भारत भारती'!इसमें 'हम थे क्या,क्या हो गये और क्या होंगे अभी' जैसी एक पंक्ति सें अपने अतीत तक को खँगालता कवि जब भारतीयों को आत्मालोचन से अपने पथ को प्रशस्त करने के लिये सनद्ध करता है,तब हमार यहाँ के किसानों की दुरवस्था के भी कारुणिक चित्र उभरे मिलते हैं!स्फुट कविताओं के लेखन-प्रकाशन पर दृष्टि दौडा़ते हैं तो 'सरस्वती' पत्रिका में गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' की 'किसान'व 'अभागा कृषक' क्रमशः(जनवरी२०१२ व अप्रैल१९१४)एवं मैथिलीशरण गुप्त की 'कृषक-कथा' व 'भारतीय कृषक'क्रम से(जनवरी १९१४व मई१९१६)के अंकों में'किसानों पर छपी मिलती हैं।किसानों के प्रति कई उल्लेख्य कवियों की अनेक संवेदना-सिक्त व श्रेष्ठ कविताएँ भी छपती रही हैं।

यही वह दौर है,जब अवध-क्षेत्र के किसान ब्रिटिशराज समेत अपने-अपने इलाके के राजे-रजवाडो़ं,ताल्लुके़दारों,ज़मीदारों तथा उनके कारिन्दों-अहलकारों से त्रस्त एवं संतप्त ही नहीं, ऊबे हुए उत्तप्त हो चले थे।यह सब बडे़ फलक की कृतियों-- 'किसान'(१९१५)मैथिलीशरण गुप्त;'कृषक-क्रन्दन'(१९१६) गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' व 'अनाथ'(१९१७)सियारामशरण गुप्त के उपर्युक्त प्रबन्ध काव्यों में अभिव्यक्त हुआ! यद्यपि रूस की क्रान्ति(१९१७)से उस दौर में भारत में उभरे विभिन्न ज़मीनी किसान आन्दोलनों का दूर-दूर तक तनिक भी रिश्ता या प्रभाव रिश्ता या प्रभाव नहीं था।परन्तु विचित्र संयोग है कि साम्य,रिश्ताऔर रिश्ता नहीं था,फिर भी यह विचित्र संयोग है कि रूसी क्रान्ति(१९१७)के दौर में ही अवध के किसान भाँति-भाँति के करों(देनदारी.हारी-बेगारी वगैरह)से त्रस्त-पस्त और बेचैनियों से इस कदर भरे हुए थे कि विरोध और विद्रोह की चेतना से कुलबुलाने लगे थे।इस देश के किसानों के दुखव उनकी तकलीफ़ से काँगरेस का वस्तुतःकभी कोई लेना-देना नहीं रहा।परन्तु मौके़ देख काँगरेस हमेशा किसानों के फटे के प्रति सहानुभूतिशील बनी अपनी टाँग ज़रूर अँडा़ती रही है!सो इस बार भी काँगरेस और उसके भीतरी घटक के कई स्वनाम-धन्य नेतागण अवध के किसानों की इस आँच में अपने नेतृत्त्व की रोटियाँ सेँकने के लिये सक्रिय हो चले थे।

प्रेमचंद के उपन्यास
यहीं उर्दू-हिन्दी के कथाकार प्रेमचन्द याद आते हैं,जो बचपन से तो वह अपने गाँव में रहे ही। डाकमुंशी रहे पिता के साथ भी वह ग्रामीण-वातावरण में रहते आये थे।इसलिये गँवई-जीवन,किसानों के दु:ख,उनकी तकलीफ़ और समस्याओं वगैरह को भी वह बहुत हद तक जानते थे।यही वजह है कि उनके साहित्य में किसान-जीवन तथा खेती-किसानी की दुश्वारियाँ आदि बहुत अन्तरंगता और गहन प्रमाणिकता के साथ दर्ज़ हुई हैं!परन्तु उनके कहानी और उपन्यास-लेखन में अवध किसान आन्दोलन प्रत्यक्षतःलगभग अनुपस्थित है।अवध के तत्कालीन१२ जिलों में से फैजाबाद,सुलतानपुर, बाराबंकी,सीतापुर उन्नाव,हरदोई,लखनऊ,रायबरेली और प्रतापगढ़ में अवध किसान आन्दोलन की सरगर्मिया़ँ तो रही ही हैं,कमोबेस जौनपुर,इलाहाबाद,फतेहपुर और कानपुर भी इस आन्दोलन की जद में रहे हैं। प्रतापगढ़ में अवध किसान आन्दोलन की दागबेल पडी़। तो देश के स्वाधीनता आन्द रायबरेली के मुंशीगंज में सई नदी पर आन्दोलन को आर या पार के निर्णायक मुहाने पर पहुँचाने के लिये एकजुट किसानों पर चली गोलियों से हुआ नरसंहार इस किसान आन्दोलन का चरमोत्कर्ष रहा है,जिसे गणेशशंकर विद्यार्थी ने 'दूसरा जलियाँवाला बाग काण्ड' की संज्ञा से अभिहित किया था! उस समय विद्यार्थीजी के द्वारा सम्पादित 'प्रताप' अवध किसान आन्दोलन के मुख-पत्र की भूमिका में था।नेहरूजी इस आन्दोलन से सीधे जुडे़ और फिर गहर से चशजुड़ते गयहुए थे। इसी अवध किसान आन्दोलन से गहरे जुडा़व के नाते जवाहरलाल देश के गाँवों-किसानों से भी बेहद नज़दीक से जुडे़।किसानों की समस्याओं,साथ ही देश की तत्कालीन-आन्दोलनी-राजनीति को गहराई से जानते-समझते हुए वह 'युवक हृदय सम्राट' के रूप में काँगरेस की राजनीति में भी तेजी से उभरे हैं।
विडम्बना है,इसी दौर में लिखा जाता प्रेमचन्द का किसान-केन्द्रित 'प्रेमाश्रम';अवध किसान आन्दोलन से निरपेक्ष व और गान्धी-प्रभाव से ऊभ-चूभ है।इस उपन्यास का संक्षेपित नाट्यरूप 'संग्राम' भीतथा 'रंगभूमि' जिसकी अगली परिणति है!

- बन्धु कुशावर्ती

Hariom Dwivedi
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