बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में ऐतिहासिक फैसले सुनाने के बाद स्पेशल जज सुरेंद्र कुमार यादव अब नहीं देंगे कोई फैसला

सीबीआई के स्पेशल जज सुरेंद्र कुमार यादव के जीवन में बुधवार 30 सितम्बर के दिन दो अहम पल थे। जहां पूरे देश दुनिया की निगाहें उनके उपर लगी हुई थी तो वह भी सुबह से लगातार घड़ी पर अपनी निगाहें बनाए हुए थे।

By: Mahendra Pratap

Published: 30 Sep 2020, 02:24 PM IST

लखनऊ. सीबीआई के स्पेशल जज सुरेंद्र कुमार यादव के जीवन में बुधवार 30 सितम्बर के दिन दो अहम पल थे। जहां पूरे देश दुनिया की निगाहें उनके उपर लगी हुई थी तो वह भी सुबह से लगातार घड़ी पर अपनी निगाहें बनाए हुए थे। क्योंकि आज उनके पास वक्त कम था। दोनों वजह साफ थी, आज बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले पर अपना फैसला देना था तो शाम पांच बजे उनकी नौकरी समाप्त हो जानी थी। कई साल से न्यायिक सेवा में काम करने के बाद आज उनका अंतिम दिन था। जज सुरेंद्र कुमार यादव 30 सितम्बर शाम पांच बजे के बाद रिटायर्ड जज सुरेंद्र कुमार यादव हो जाएंगे।

अपने रिटायरमेंट से कुछ घंटे पहले सीबीआई के स्पेशल जज सुरेंद्र कुमार यादव ने देश का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले पर सभी 32 आरोपियों को बरी कर दिया। जज ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं मिला हैं। फैसले के आने के बाद सभी के चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने जज सुरेंद्र कुमार यादव को बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले के मुक़दमे में स्पेशल जज के तौर पर मुक़र्रर किया था। 19 अप्रैल 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने जज सुरेंद्र कुमार यादव को रोज़ाना ट्रायल कर बाबरी मस्जिद मामले की सुनवाई दो साल में पूरा करने का निर्देश दिया था। वैसे तो विशेष जज एसके यादव 30 सितंबर 2019 को रिटायर होने वाले थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें 30 सितंबर 2020 तक सेवा विस्तार दिया।

फैज़ाबाद से जज सुरेंद्र यादव का गहरा कनेक्शन है। जज यादव की पहली पोस्टिंग फ़ैज़ाबाद ज़िले में ही हुई थी और एडीजे के तौर पर पहला प्रमोशन भी फ़ैज़ाबाद में ही मिला था। और आज सुरेंद्र यादव फैसला सुनाने के बाद रिटायर हो जाएंगे। पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर ज़िले के पखानपुर गांव के रामकृष्ण यादव के घर पैदा हुए सुरेंद्र कुमार यादव 31 बरस की उम्र में राज्य न्यायिक सेवा के लिए चयनित हुए थे।

फ़ैज़ाबाद में एडिशनल मुंसिफ़ के पद की पहली पोस्टिंग से शुरू हुआ उनका न्यायिक जीवन ग़ाज़ीपुर, हरदोई, सुल्तानपुर, इटावा, गोरखपुर के रास्ते होते हुए राजधानी लखनऊ के ज़िला जज के ओहदे तक पहुंचा। अगर उन्हें विशेष न्यायालय (अयोध्या प्रकरण) के जज की जिम्मेदारी न मिली होती तो वे पिछले साल सितंबर के महीने में ही रिटायर हो गए होते।

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