
केपी त्रिपाठी
मेरठ। देश की शान का प्रतीक और हर भारतीय का गौरव है राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा। यह देश के संविधान का भी प्रतीक है। हम राष्ट्रीय मौकों पर तिरंगा फहराते हैं। राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा भारतीय सरहदों की पहचान है तो वहीं विदेश में भी भारतीयता की पहचान इसी तिरंगे से होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस तिरंगे की रक्षा के लिए सरहद पर सैनिक अपना बलिदान देते हैं। देश के भीतरी दुश्मनों से रक्षा के लिए सिपाही जान दे देते हैं वह कैसे बनता है। उसके बनाने और सिलने के नियम क्या है।
रातों-रात तिरंगे के लिए सूत मेरठ के गांधी आश्रम पहुंचा था :—
15 अगस्त 1947 को आजादी के प्रथम दिन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लालकिले की प्राचीर पर जो तिरंगा फहराया था। वह मेरठ से तैयार होकर गया था। मेरठ के सुभाष नगर के रहने वाले लेखराज ने 15 अगस्त 1947 में पहली बार फहराया गए तिरंगे को अपने हाथों से रातोरात सिलकर तैयार किया था। उस तिरंगे के लिए सूत कोलकता से मंगाया गया था। आज लेखराज तो नहीं रहे लेकिन उनकी तीसरी पीढी आज भी उनके पैत्रिक काम में जुटी है। यानी तिरंगा झंडा बनाने और सिलने के काम में जुटी हुई है। 20 गुणा 20 के एक कमरे में अपनी पत्नी और दो बेटियों के साथ देश की आन,बान और शान के प्रतीक तिरंगे की सिलाई में लेखराज सिंह के पौत्र रमेश उसके सम्मान का पूरा ध्यान रखते हैं। रमेश बताते हैं कि हम लोग भले ही आज ऐसी हालात में हैं लेकिन हमकों अपने हुनर और देश सेवा पर गर्व है कि हमारे बाबा लेखराज ने देश की आजादी के बाद लाल किले पर फहराया जाने वाला पहला तिरंगा सिलकर तैयार किया था।
12 अगस्त 1947 को संसद भवन में पास हुआ था राष्ट्रीय ध्वज का प्रस्ताव:-
रमेश बताते हैं कि 14 अगस्त 1947 को राष्ट्रीय ध्वज का प्रस्ताव संसद में पास हुआ था और उसको सिलकर तैयार करने का काम उनके बाबा लेखराज सिंह केा मिला था। उनके बाबा ने रातों रात लालकिले पर फहराए जाने के लिए तिरंगा तैयार किया था। यह तिरंगा मेरठ से सुबह 4 बजे दिल्ली पहुंचाया गया था। उसके बाद झंडे को लालकिले की प्राचीर से देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने फहराया था।
देश में सिर्फ तीन स्थानों पर तैयार किए जाता है राष्ट्रीय ध्वज:-
रमेश चंद्र बताते हैं कि देश में सिर्फ तीन स्थानों पर ही राष्ट्रीय ध्वज तैयार किया जाता है। पहला कोलकाता, दूसरा मुंबई और तीसरा मेरठ में। मेरठ में गांधी आश्रम में झंडा बनाया जाता है। गांधी आश्रम में तिरंगा बना-बनाया मिलता है। जबकि इसको सिलने का काम वर्ष 1947 से रमेश चंद्र का परिवार का कर रहा है।
सिलाई के दौरान करना पड़ता है कई बातों का पालन:-
रमेश चंद्र बताते हैं कि तिरंगा सिलाई करते समय कई बातों का पालन करना होता है। मशीन पर सिलते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि यह जमीन पर न लटके। या फिर कोई इसके ऊपर से लांघ कर न निकले। इसमें 12 से 16 सिलाई लगाई जाती है। बीच में भी सिलाई लगाई जाती है। संविधान के अनुसार अधिक सिलाई लगाना राष्ट्रीय ध्वज के अपराध की श्रेणी में माना जाता है। यह तिरंगे का अपमान भी होता है।
मेरठ से पूरे मुल्क के लिए होते हैं सप्लाई:-
रमेश चंद्र बताते हैं कि मेरठ में उनके हाथों से सिले गए तिरंगे की सप्लाई पूरे मुल्क में होती हैं। उनकेा देश के हर कोने से आर्डर मिलता है।
Updated on:
14 Aug 2020 05:13 pm
Published on:
14 Aug 2020 05:10 pm
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