सरकारी डॉक्टरों के भरोसे चल रहे निजी अस्पताल, विभाग के आदेशों की खुली अवहेलना

राज्य सरकार के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य निदेशालय ने साढ़े तीन माह पूर्व दिए थे निजी चिकित्सालय व निजी क्लीनिकों में सेवा देने वाले डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश
- तीन महीने में एक भी कार्रवाई नहीं, एमसीआई के निर्देशों की अवहेलना

By: shyam choudhary

Published: 26 Feb 2021, 10:09 AM IST

नागौर. जिला मुख्यालय सहित जिले के कई निजी अस्पताल एवं निजी क्लीनिक सरकारी डॉक्टर के भरोसे संचालित हो रहे हैं। नर्सिंगहोम और प्राइवेट अस्पतालों में सरकारी डॉक्टर ऑपरेेशन से लेकर ओपीडी तक सब संभाल रहे हैं। कुछ निजी अस्पताल तो सरकारी डाक्टरों के ही हैं, लेकिन सरकारी सेवा में होने के कारण उन्होंने किसी और के नाम पर रजिस्ट्रेशन करा रखा है।
करीब साढ़े तीन महीने पहले को चिकित्सा एवं जन स्वास्थ्य सेवाएं के निदेशक ने सरकारी अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टरों को प्राइवेट नर्सिंग होम/निजी क्लीनिकों में जाकर मरीजों को देखने व ऑपरेशन करने की इस प्रवृति को काफी गंभीरता से लिया था, लेकिन जिले में सब कुछ स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की रजामंदी से चल रहा है। अधिकारियों ने सब कुछ जानते हुए भी आंखें बंद कर रखी हैं। डॉक्टर, एमआर, दवा कंपनियों और स्वास्थ्य विभाग की मिलीभगत से मरीजों को इलाज के नाम पर लूटा जा रहा है।

जिला मुख्यालय सहित जिलेभर में 50 से अधिक निजी अस्पतालों का संचालन हो रहा है। 90 प्रतिशत अस्पतालों में बेहोशी के डॉक्टर (एनेस्थेटिक) नहीं है। कुछ अस्पतालों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर में सर्जन, सोनोलोजिस्ट समेत अन्य चिकित्सक भी नहीं हैं। ज्यादातर अस्पतालों में प्रसव पीडि़ताओं को ही भर्ती किया जाता है। नार्मल या फिर सीजर प्रसव कराया जाता है। स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों की ही मानें तो शहर व जिले में संचालित हो रहे ज्यादातर निजी अस्पतालों में सरकारी सर्जन और बेहोशी के डॉक्टर ऑपरेशन करने के लिए जाते हैं। कई अस्पतालों में सरकारी सोनोलोजिस्ट सोनोग्राफी करने जाते हैं। वहीं ग्रामीण इलाके के अस्पतालों में सीएचसी में तैनात सर्जन ऑपरेशन करने जाते हैं।

यह भी चल रहा खेल
जिला मुख्यालय के जेएलएन अस्पताल में सेवा दे रहे कई डॉक्टरों ने तो सारे हदें लांघ दी हैं। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार कुछ डॉक्टर सरकारी अस्पताल में ऑपरेशन करने से पहले घर पर मरीजों के परिजनों से दो से तीन हजार रुपए लेते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो सरकारी अस्पताल में आने वाले मरीजों को अपनी सेटिंग वाले प्राइवेट अस्पताल में इलाज करने के लिए बुलाते हैं। मरीजों से मोटी रकम लेकर उनका ऑपरेशन भी किया जा रहा है। मरीजों को यहां जानबूझकर सुविधाएं नहीं दी जा रही हैं।

ये थे निदेशक के आदेश
10 नवम्बर 2020 को चिकित्सा एवं जन स्वास्थ्य सेवाएं के निदेशक ने एक आदेश जारी कर बताया कि राजकीय चिकित्सालयों में कार्यरत चिकित्सक प्राईवेट नर्सिग होम/निजी क्लीनिकों में जाकर मरीजों को देखते हैं/ऑपरेशन करते हैं। चिकित्सकों की इस प्रवृति को राज्य सरकार द्वारा गम्भीरता से लिया गया है। इस संबंध में पूर्व में भी अदेश प्रसारित कर स्पष्ट निर्देश दिए गण् थे, लेकिन यह प्रवृति अभी भी जारी है। अत: पुन: राज्य के सभी चिकित्सकों को निर्देशित किया जाता है कि वे किसी भी प्राइवेट क्लीनिक/नर्सिंगहोम/अस्पताल/ पैथोलोजिकल लेबोरेट्री /डायग्नोस्टिक सेंटर आदि में जाकर किसी भी मरीज को नहीं देखेंगे, न ही कोई टेस्ट करेंगे और ना ही किसी प्रकार का ऑपरेशन करेंगे। यदि इस प्रकार की कोई सूचना किसी चिकित्सक के सम्बन्ध में राज्य सरकार/निदेशालय को प्राप्त होती है तो उस चिकित्सक के विरूद्ध नियमानुसार आवश्यक अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाएगी। निदेशक ने इसके लिए सभी प्रमुख चिकित्सा अधिकारी, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारियों को इस सम्बन्ध में कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे

न सूचना, न रसीद
नियमानुसार जो चिकित्सक नॉन प्रेक्टिसिंग अलाउन्स नहीं ले रहे हैं, वे अपने आवास पर यदि मरीजों को देखते हैं तो अपनी निर्धारित परामर्श शुल्क ही लेंगे तथा शुल्क की सूचना व दर का प्रदर्शन परामर्श कक्ष में आवश्यक रूप से करेंगे। लेकिन जिला प्रशासन एवं चिकित्सा विभाग के उच्चाधिकारियों की नाक के नीचे जिला मुख्यालय पर घर पर मरीज देखने वाले अधिकतर सरकारी चिकित्सकों ने तो शुल्क की सूचना चस्पा कर रखी है और न ही शुल्क के बदले रसीद दी जा रही है।

शिकायत मिली तो करेंगे कार्रवाई
राजकीय चिकित्सालयों में कार्यरत चिकित्सकों का प्राइवेट नर्सिंग होम या निजी क्लीनिकों में जाकर मरीजों को देखना नियम विरुद्ध है। जिले में यदि ऐसा कोई कर रहा है और उसके खिलाफ शिकायत मिली तो निश्चित तौर पर सम्बन्धि चिकित्सक के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
- डॉ. मेहराम महिया, सीएमएचओ, नागौर

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