
मानसिक रोगी भूले-भटके ही नागौर के जेएलएन अस्पताल आ रहे हैं। कभी महीने में करीब सात-आठ सौ की ओपीडी अब महज 30-35 रह गई है। मानसिक बीमार अब यहां आकर करें भी तो क्या, करीब डेढ़ साल से मनोचिकित्सक है ही नहीं, नर्स पर ही इन रोगियों के उपचार का दारोमदार है।
पत्रिका न्यूज नेटवर्क
नागौर. मानसिक रोगी भूले-भटके ही नागौर के जेएलएन अस्पताल आ रहे हैं। कभी महीने में करीब सात-आठ सौ की ओपीडी अब महज 30-35 रह गई है। मानसिक बीमार अब यहां आकर करें भी तो क्या, करीब डेढ़ साल से मनोचिकित्सक है ही नहीं, नर्स पर ही इन रोगियों के उपचार का दारोमदार है।
सूत्रों के अनुसार पिछले करीब एक माह में अस्पताल अथवा शिविर तक पहुंचे मानसिक रोगियों का आंकड़ा देखें तो यह साफ होता है कि जहां चिकित्सक हैं, वहां रोगियों की भरमार है। जहां की संख्या कम है, इसका यह मतलब नहीं कि मनोरोगी नहीं हैं बल्कि ये अब दूसरे जिले अथवा जगह पर जाकर परामर्श ले रहे हैं। अभी जिले के डीडवाना और कुचामन में मनोचिकित्सक हैं जहां उपचार के लिए मनोरोगी काफी तादात में आ रहे हैं। पिछले महीने डीडवाना में इनकी संख्या 260 थी तो कुचामन में 215, इसके अलावा जेएलएन अस्पताल समेत अन्य उप अस्पतालों में इनकी संख्या काफी घट गई। जेएलएन अस्पताल में मनोचिकित्सक की मौजूदगी में महीने में सात-आठ सौ मनोरोगी उपचार के लिए आते थे जो पिछले माह केवल 35 ही रहे। ऐसा नहीं है कि मनोरोगी कम हो रहे हैं बल्कि जिला अस्पताल तक इसलिए आना इनका बंद हो रहा है क्योंकि यहां मनोचिकित्सक ही नहीं है।
सूत्र बताते हैं कि यों तो मानसिक रोगियों के लिए काउंसलिंग और शिविर लगाने की भी अनिवार्यता है, शिविर लगे या नहीं यह तो नामालूम पर जहां-जहां मनोचिकित्सक नहीं हैं, वहां मनोरोगियों को उपचार के लिए दूरदराज दूसरे ठिकानों पर जाना पड़ रहा है। पिछले माह शिविर अथवा अन्य माध्यम के जरिए चिकित्सकों तक पहुंचे मनोरोगियों का आंकड़ा आंख खोलता है। लाडनूं में 27, जायल में 13, मकराना में 11, परबतसर में आठ, मेड़ता में सात और रियांबड़ी में पांच मनोरोगी परामर्श अथवा उपचार के लिए रजिस्टर्ड हुए।
यहां तो आंकड़ा शून्य रहा
सूत्रों का कहना है कि डेगाना, भैरूंदा और मूण्डवा में पिछले माह एक भी मनोरोगी रजिस्टर्ड नहीं हुआ। तो क्या यह माना जाए कि यहां एक भी व्यक्ति मानसिक रोग से पीडि़त नहीं है, असल में मनोचिकित्सक की गैरमौजूदगी और लडख़ड़ाए सिस्टम के चलते मानसिक बीमार जयपुर-जोधपुर तक जा रहे हैं। जेएलएन अस्पताल समेत आधा दर्जन जगह तो मनोचिकित्सक होना चाहिए, इसके लिए कई बार लिखित में गुहार भेजी जा चुकी है।
हर महीने में चार शिविर
वैसे मनोरोगियों के उपचार के लिए सरकार की ओर से महीने में चार अलग-अलग स्थानों पर शिविर लगाए जाते हैं। अलग-अलग तरह के मानसिक रोगी बढ़ रहे हैं, अवसाद समेत अन्य बीमारियों से ग्रसित मरीज दो-तीन महीने में भी ठीक हो जाते हैं तो कुछ को साल-दो साल भी लग रहे हैं। बढ़ती प्रतिस्पद्र्धा, रहन-सहन बदलने की ललक, आर्थिक तंगी समेत कई अन्य कारण भी इसके लिए जिम्मेदार बताए जा रहे हैं।
भगवान के साथ स्याणा-भोपा की शरण
सूत्रों का कहना है कि मानसिक रोगी को ठीक करने के लिए भगवान के अलावा स्याणा-भोपा की शरण में जाने का क्रेज अभी तक बना हुआ है। गरीब/अनपढ़ लोगों की संख्या इसमें ज्यादा है। नागौर के आसपास आस्था के कई केन्द्र ही नहीं कई धार्मिक स्थलों की शरण ली जाती है। यह भी सच है कि मनोरोगी अस्पताल से ज्यादा आस्था के केन्द्र तक ज्यादा पहुंच रहे हैं।
इनका कहना...
मानसिक रोगियों की तादात बढ़ रही है, शिविरों के माध्यम से जिलेभर में इनका उपचार तो किया जा रहा है पर जेएलएन अस्पताल समेत कुछ बड़ी जगह पर मनोचिकित्सक की मौजूदगी जरूरी है।
-डॉ महेश पंवार, पीएमओ जेएलएन अस्पताल, नागौर
Published on:
23 Feb 2023 09:27 pm

