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VIDEO...सडक़ किनारे खाली भूभाग को हड़पने की नीयत से निगल गए साढ़े तीन सौ से ज्यादा हरे पेड़.....!

locationनागौरPublished: Dec 09, 2023 10:37:10 pm

Submitted by:

Sharad Shukla

-पेड़ों की छाल उतारने, टहनियां काटने, केमिकल आदि डालकर इनको खत्म करने का चल रहा काला खेल

Nagaur news
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-इससे बचे हुए पेड़ों की बिगड़ रही हालत, नष्ट हो चुके पेड़ों के मामले की जांच के साथ ही देखभाल करने की मांग को अनसुना करने से बिगड़ रही स्थिति
-वर्ष 2012 में प्रशासन व नगरपरिषद के संयुक्त तत्वावधान में लगाए गए थे 750 नीम के पौधे, प्रशासनिक देखभाल में हुई उदासीनता के बाद रहस्यमय तरीके से समाप्त कर दिए गए साढ़े तीन सौ से ज्यादा पेड़
-खाली भूभाग पर लगे पेड़ों वाली जगह पर गोबर एवं कबाड़ आदि का संग्रह कर कब्जा करने का चल रहा कुचक्र
नागौर. गिनाणी रोड पर तकरीबन 11 साल गिनाणी रोड के खाली भूभाग में लगाए गए साढ़े सात सौ पेड़ों में से अब पचास प्रतिशत से भी कम पेड़ बचे हुए हैं। बताया जाता है कि इस पर अवैध रूप से कब्जा करने के लिए रचे गए कुचक्र में साढ़े तीन सौ से ज्यादा पेड़ों को तेजाब व अन्य केमिकल आदि डालकर खत्म कर दिए गए। अब रहे-सहे पेड़ों को भी समाप्त करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। इन पेड़ों को बचाने के लिए प्रशासन की ओर से जल्द ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया तो यह भी पूरी तरह से समाप्त हो जाएंगे। यह स्थिति तब है, जबकि इनको प्रशासन एवं नगरपरिषद के संयुक्त तत्वावधान में लगाया गया था। हालांकि इन पेड़ों को बचाने के लिए पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित हिम्मताराम भांभू ने जिला कलक्टर से मिलकर इन पेड़ों को संरक्षित करने के लिए आग्रह किया था, लेकिन इस भूभाग को विवादित बताकर इसे खारिज कर दिया। इसके चलते इन पेड़ों को बचाने के लिए किए जा रहे प्रयासों पर अब पानी फिरता नजर आने लगा है। इस संबंध में शहरवासियों का मानना है कि पेड़ों को तो संरक्षित करने के लिए कदम उठाए जा सकते थे।
गिनाणी रोड के खाली मैदान में लगाए गए पेड़ों में से अभी भी करीब ढाई सौ से तीन सौ पेड़ों को वजूद अब खत्म होने के कगार पर पहुंच गया है। इन पेड़ों की सांसे अब उखड़ती नजर आने लगी है। मौके पर बचे हुए कई पेड़ों की हालत अब बेहद खराब हो चुकी है। एक सिरे से देखने पर कहीं पेड़ों की पत्तियां जली हुई है तो, कुछ जगहों पर पेड़ों की डालियां इस तरह से कटी हुई मिली कि यह दोबारा पनप न सके। इनमें से कई स्थानों पर देखने से ही नजर आता है कि पेड़ों की जड़ों में कुछ डाला गया है। इन पेड़ों की जली हुई पत्तियां और जीर्ण-शीर्ण स्थिति देखकर लगता है कि अब खत्म हो रहे हैं। इनको जल्द ही बचाने के लिए विशेषज्ञों की सहायता नहीं ली गई तो फिर यहां से सारे पेड़ों का नामोनिशान मिट जाएगा।
पौधे लगाने के दौरान देखभाल किया था दावा
मिली जानकारी के अनुसार वर्ष 2012 में यहां पर साढ़े सात सौ नीम के पौधों को लगाया गया था। इनको लगाए जाने के साथ ही देखभाल की जिम्मेदारी प्रशासन की ओर से नगरपरिषद को दी गई थी। ताकि पौधों को पानी कमी की स्थिति का सामना न करना पड़े। इसके बाद बाद कुछ अर्सा तक नगरपरिषद की ओर से इसकी देखभाल की गई। यह सारे पेड़ विकसित भी हो गए थे। एक साथ साढ़े सात सौ पेड़ों के विकसित रूप में पहुंचने के साथ ही इस पूरे भूभाग का नजारा ही बदल गया था। यह लंबा-चौड़ा खाली रहा मैदान नीम के बाग के रूप में नजर आने लगा था। पेड़ों के विकसित होने के साथ ही शहर को उम्मीद जगी थी कि यह क्षेत्र ऑक्सीजन जोन के रूप में अब परिवर्तित हो जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कुछ समय के बाद रहस्यमय तरीके से इन पेड़ों में खतरनाक रसायान आदि के मिश्रण डालकर इनको पूरी तरह से समाप्त करने का काला खेल शुरू कर दिया गया था।
पेड़ों के रखरखाव का मांगा था जिम्मा, नहीं दिया
पेड़ों के लगातार जलने, कई जगहों से इनकी टहनियां काटने, और कटी हुई जगह पर केमिकल आदि लगाए जाने के बाद पेड़ों के विकसित होने पर विराम लग गया। जानकारी मिलने पर पद्मश्री हिम्मताराम भांभू भी पहुंचे। पेड़ों की खराब हालत देखकर उन्होंने प्रशासनिक अधिकारियों से मुलाकात कर इन पेड़ों को बचाने की गुहार लगाई, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। प्रशासनिक स्तर पर भी पेड़ों वाली पूरी जगह को विवादित बताकर इससे पल्ला झाड़ लिया गया। हालांकि अधिकारियों से यह भी आग्रह किया गया कि विवादित जमीन है तो क्या हुआ, पेड़ों को बचाया जाना चाहिए। प्रशासन इन पेड़ों को नहीं बचा सकता है तो इसके देखभाल की जिम्मेदारी पर्यावरण संगठन आदि को सौंप दे तो फिर वह इन पेड़ों की बेहतर तरीके से देखभाल कर लेंगे। तमाम आग्रह के बाद भी प्रशासनिक अधिकारी तैयार नहीं हुए। नतीजतन ज्यादातर पेड़ तो खत्म कर दिए गए। अब बचे हुए पेड़ों के वजूद पर भी संकट बना हुआ है। प्रशासनिक उदासीनता के चलते एक-दो कर क्रमश: क्रमबद्ध तरीके से इनको खत्म करने के प्रयास किए जा रहे हैं।
गोबर रखकर कब्जा करने के हो रहे प्रयास
बताते हैं कि इस जगह पर कथित रूप से भूमाफियाओं की नजर है। इसलिए इन पेड़ों को समाप्त करने के साथ ही यहां पर कबाड़ व गोबर आदि का संग्रह कर इस पर कब्जा करने के प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि कागजी आंकड़ों में इसे राजकीय भूमि बताते हैं, लेकिन इस पर इस तरह से गोबर संग्रह के साथ ही कबाड़ आदि एकत्रित कर रखने के कार्य को रोकने के लिए कोई प्रशासनिक कदम नहीं उठाए जाने से अब स्थिति विकट होती नजर आने लगी है। जानकारों का कहना है कि प्रशासनिक अधिकारियों के संज्ञान में फोटाग्राफ के साथ सारी चीजें संज्ञान में लाई जा चुकी है।

पेड़ों को जानबूझकर खत्म किया जा रहा
पद्मश्री हिम्मताराम भांभू से इस विषय पर बार नहीं है। तचीत हुई तो उन्होंने बताया कि भूभाग पर भूमाफियाओं की गिद्ध नजर लगी हुई है। राजकीय भूमि को विवादित बताया जा रहा है। विवादित है तो भी पेड़ों की देखभाल तो की ही जा सकती है। उन्होंने कहा कि प्रशासन ने ही वहां पर साढ़े सात सौ पौधे लगाए गए थे। उस दौरान तो यह विवादित का विषय नहीं उठा था। इसे बाद में विवादित बना दिया गया। अब विवादित है तो, क्या हुआ। पेड़ों को तो संरक्षित किया ही जा सकता है। भांभू का कहना है कि इन पेड़ों को बेशकीमती जमीन के लालच में समाप्त करने का खेल चल रहा है। पेड़ों को बचाने के लिए वह फोटोग्राफ के साथ जिला कलक्टर से पूर्व में मिल चुके हैं, नगपरिषद से भी संपर्क कर पेड़ों को बचाए जाने का अनुरोध किया गया। इसके बाद भी इन पेड़ों को बचाने के लिए प्रशासनिक जिम्मेदारों की चुप्पी इनकी ही कार्यशैली व नीयत पर सवालिया निशान लगा देती है।
इनका कहना है...
खाली भूभाग पर लगे पेड़ों की स्थिति के साथ इसकी पूरी जांच करा ली जाएगी। जल्द ही जांच के बाद फिर इस संबंध में वैधानिक कार्रवाई की जाएगी।
रामेश्वर गढ़वाल, तहसीलदार, नागौर

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