script लोकसभा चुनाव में भाजपा को दक्षिण से 'उत्तर' की उम्मीद, 2 से 303 सीटों का ऐसा रहा सफर | BJP expects answer from South states in Lok Sabha elections 2024 know the journey from 2 to 303 seats | Patrika News

लोकसभा चुनाव में भाजपा को दक्षिण से 'उत्तर' की उम्मीद, 2 से 303 सीटों का ऐसा रहा सफर

locationनई दिल्लीPublished: Feb 02, 2024 09:20:09 am

Submitted by:

Paritosh Shahi

नौ फरवरी को मौजूदा लोकसभा का आखिरी सत्र समाप्त होने के साथ ही 18वीं लोकसभा चुनाव का बिगुल बजने के आसार हैं। इसलिए न केवल राजनीतिक दल और राजनीतिक विश्लेषक बल्कि चुनाव सर्वे एजेंसियां भी अपने-अपने तरीके से मतदाताओं के मानस को टटोलने में जुट गई हैं। यहां पढ़िए अनंत मिश्रा का विशेष लेख...

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पांच साल में सियासत ने कई करवटें ली है। हमेशा की तरह इस बार भी राजनीतिक दल आगामी दिनों में होने वाले लोकसभा चुनावों में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए सियासी गुणा-भाग में जुट गए हैं। नौ फरवरी को मौजूदा लोकसभा का आखिरी सत्र समाप्त होने के साथ ही 18वीं लोकसभा चुनाव का बिगुल बजने के आसार हैं। इसलिए न केवल राजनीतिक दल और राजनीतिक विश्लेषक बल्कि चुनाव सर्वे एजेंसियां भी अपने-अपने तरीके से मतदाताओं के मानस को टटोलने में जुट गई हैं। आने वाले चुनाव में मतदाता किस दल अथवा गठबंधन को अगले पांच साल की बागडोर सौंपेंगे, इसका फिलहाल तो सिर्फ कयास ही लगाया जा सकता है।

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दक्षिण के तीन राज्यों में खाता खोल पाएगी अथवा नहीं?

बात पांच साल पहले हुए लोकसभा चुनावों की करें तो प्रचंड जीत हासिल कर लगातार दूसरी बार सत्ता पर काबिज होने वाली भारतीय जनता पार्टी नीत गठबंधन और कांग्रेस के नेतृत्व में बने 'इंडिया' गठबंधन के सहयोगी दल सीटों के तालमेल को अंतिम रूप देने में व्यस्त हैं। फिर भी यह सवाल जनमानस के मन में जरूर है कि अगली बार किसकी सरकार?

यह जानने के लिए पिछले चुनाव परिणामों की तरफ भी निगाह डालना जरूरी हो जाता है। देखा जाए तो हर राज्य में राजनीतिक समीकरण अलग-अलग हैं। कहीं समीकरण साफ हैं तो कहीं उलझी गांठों को सुलझाने का काम चल रहा है। एनडीए को मिली 331 सीटों में से भाजपा ने अपने दम पर 303 सीटें जीतकर सत्ता का स्वाद चखा था।

उसने उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और हरियाणा जैसे बड़े राज्यों में विपक्षी दलों का लगभग सूपड़ा साफ कर दिया था। लेकिन वह पिछली बार दक्षिण भारत के तीन बड़े राज्यों में अपना खाता तक नहीं खोल पाई। अब सवाल यही है कि क्या भाजपा अपना प्रदर्शन दोहराते हुए दक्षिण के तीन राज्यों में खाता खोल पाएगी अथवा नहीं?


सत्ता आने-जाने का दौर

पिछली लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा को 9 राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिए मैदान में उतरना पड़ा। इस दौरान पार्टी उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, गुजरात, गोवा और मणिपुर में अपनी राज्य सरकारों को बनाए रखने में कामयाब रही। इसके अलावा राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस से सत्ता छीनने में सफल रही। उसे कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के हाथों अपनी सत्ता गंवानी भी पड़ी।

चुनौती तीन राज्यों में

लोकसभा चुनाव के बाद इसी साल भाजपा को महाराष्ट्र और हरियाणा में अपनी सरकारों को बचाने की चुनौती का सामना करना पड़ेगा, तो झारखंड में झामुमो गठबंधन से सत्ता छीनने की चुनौती से भी रूबरू होना पड़ेगा।

उतार-चढ़ाव भी खूब

बीते पांच साल का सियासी सफरनामा भाजपा के लिए उतार-चढ़ाव का रहा। उसे पुराने सहयोगी शिवसेना, अकाली दल और अन्नाद्रमुक से बिछुड़ना पड़ा। वहीं शिवसेना में टूट के बाद एकनाथ शिंदे के रूप में पार्टी को नया साथी मिला, तो एनसीपी में विभाजन के बाद अजित पवार के साथ ने उसे महाराष्ट्र में खोई ताकत फिर पाने की कामयाबी दिलाई। कर्नाटक में जनता दल (एस) से सीटों का तालमेल भाजपा के लिए मददगार हो सकता है।

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2 से 303 सीटों का सफरनामा

कम समय में राष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल करने वाले दलों में भारतीय जनता पार्टी की यात्रा वाकई उल्लेखनीय मानी जा सकती है। लोकसभा में एक अंक से तीन अंकों तक पहुंचने का सफर उतार-चढ़ाव वाला रहा है। जनसंघ के बाद बनी जनता पार्टी का ही 1980 में भाजपा के रूप में उदय हुआ। इस तरह भाजपा की सफलता की कहानी दूसरे दलों के लिए प्रेरणादायी हो सकती है।

अपने गठन के बाद पहले आम चुनाव में सिर्फ दो सीटें हासिल करने वाली भाजपा 300 सीटों के पार पहुंची है। इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति के बीच हुए 1984 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा था। पार्टी के दिग्गज अटल बिहारी वाजपेयी समेत तमाम बड़े नेताओं को पराजय का सामना करना पड़ा था।

इसके बाद से भाजपा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। अपने गठन के बाद पार्टी को पहली बार 1995 में अपनी सरकार बनाने का मौका मिला, लेकिन बहुमत के अभाव में सरकार 13 दिन ही चल सकी। विचारधारा को बढ़ाते हुए पार्टी संघर्ष की राह पर चलती रही और 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में अपने दम पर बहुमत हासिल करने में कामयाब रही।

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