scriptBudget allocation for social sector is less than expected | आशा से कम है सामाजिक क्षेत्र के लिए बजट आवंटन | Patrika News

आशा से कम है सामाजिक क्षेत्र के लिए बजट आवंटन

locationजयपुरPublished: Feb 05, 2024 04:53:45 pm

तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के दौर में अंतरिम बजट में वास्तविक आंकड़ों के आधार पर सामाजिक व्यय का आवंटन बढऩा चाहिए। इस वर्ष कई महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों पर किए जाने वाले व्यय के आवंटन में वास्तविक रूप से कमी आई है

आशा से कम है सामाजिक क्षेत्र के लिए बजट आवंटन
आशा से कम है सामाजिक क्षेत्र के लिए बजट आवंटन
ज्यां द्रेज- जाने माने अर्थशास्त्री

आम लोगों में बजट को लेकर काफी उत्सुकता रहती है। उन्हें उम्मीद होती है कि शायद उनके हित में कोई अच्छी घोषणा हो। यही वजह है कि अखबारों के पन्ने बजट घोषणाओं से भरे रहते हैं और लोग अपने फायदे की बातों को उनमें ढूंढते हैंं। लेकिन इस बार का बजट उनकी उम्मीदों पर अधिक खरा नहीं उतरा। यह सच है कि आमतौर पर अंतरिम बजट में लोकलुभावनी घोषणाएं नहीं होतीं। यही वजह है कि हाल ही पेश किए गए देश के अंतरिम बजट में ऐसी कोई घोषणाएं नहीं हुईं। फिर भी, बजट से पहले विशेषज्ञों ने आम लोगों के जीवन-स्तर को सुधारने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण संकेत दिए थे।
वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने चिर-परिचित अंदाज में अपना दृष्टिकोण जनता के सामने रखा। उन्होंने मोदी सरकार की उपलब्धियों का बखान किया। लेकिन, पिछले दस वर्षों में कामकाजी लोगों के जीवन में क्या सुधार हुआ, इसका कोई उल्लेख नजर नहीं आया। यह चिंताजनक है कि कामकाजी लोगों में से अनेक वास्तव में कठिन दौर से गुजर रहे हैं। उदाहरण के लिए, पिछले दस वर्षों में आकस्मिक कामगारों की वास्तविक मजदूरी बमुश्किल ही बढ़ी है। फिर भी वित्तमंत्री ने अपनी नजर पर्दे के दूसरी ओर ही रखी। उनके भाषण को गौर से देखा जाए, तो उसमें गरीबी, असमानता, बेरोजगारी या मजदूरी जैसे शब्दों का कोई उल्लेख नहीं था।
वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में बच्चों के विकास से जुड़ा छोटा सा संदर्भ दिया। उन्होंने बताया कि आइसीडीएस (एकीकृत बाल विकास सेवाओं ) यानी आंगनबाड़ी योजना का विस्तार किया जाएगा। हालांकि, उनके इस वक्तव्य का स्पष्ट अर्थ समझ नहीं आया। यदि मुद्रास्फीति के नजरिए से देखें तो आइसीडीएस पर बजट आवंटन इस वर्ष फिर कम किया गया है। वास्तविक रूप से आइसीडीएस का बजट इस वर्ष पिछले वर्ष की तुलना में दो फीसदी कम है। पिछले दस वर्षों में आइसीडीएस के लिए बजट आवंटन में काफी कमी की गई है। वास्तविक आंकड़ों के आधार पर वर्ष 2014-15 के बाद से बजट आवंटन में 40 फीसदी से अधिक की कमी आई है
इस बात पर भी गौर किया जाना चाहिए कि आइसीडीएस के अलावा, सामाजिक क्षेत्र में भी निरंतर उपेक्षा का पैटर्न बना हुआ है। विश्व की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, जिसमें विकास दर ७ फीसदी से अधिक बनी हुई है, वहां अंतरिम बजट में भी वास्तविक आंकड़ों के आधार पर सामाजिक व्यय पर आवंटन बढऩा चाहिए। वास्तव में इस वर्ष कई महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों पर किए जाने वाले व्यय के आवंटन में वास्तविक रूप से कमी आई है। उदाहरण के लिए, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय दोनों के बजट आवंटन में वास्तविक आंकड़ों के रूप में कमी की गई है। स्कूली शिक्षा विभाग का बजट कमोबेश अपरिवर्तित है। राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम जैसे कुछ प्रमुख सामाजिक घटकों में 5 फीसदी तक की कटौती की गई है। गौरतलब है कि वास्तविक आंकड़े वर्तमान मुद्रास्फीति के संदर्भ में देखे जाते हैं।
स्पष्ट रूप से कहा जाए तो केंद्र की मोदी सरकार ने स्वयं की कुछ कल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं, जैसे पीएम-किसान और आयुष्मान भारत। हालांकि, इन योजनाओं ने पिछली सरकार की योजनाओं का स्थान लिया है। मुश्किल यह है कि भारत की जनता सामाजिक सुरक्षा के लिए किए गए स्थायी सुधारों के बारे में अधिक जागरूक नहीं है।
कुछ ही विकासशील देश होंगे, जहां लोगों के पास खाद्य सब्सिडी, वृद्धावस्था पेंशन, मातृत्व लाभ, स्कूल के मिड-डे भोजन और वैकल्पिक नौकरी के व्यापक अवसर होंगे। नई लोककल्याणकारी विचारधारा इस आधार पर है कि सामाजिक सुरक्षा पर सभी नागरिकों का अधिकार है, न कि केवल संगठित श्रमिक वर्ग का। आज नागरिकों से अपने अधिकारों को भुलाकर केवल कत्र्तव्य पूरे करने पर ध्यान देने की अपेक्षा की जा रही है। यह थोपी गई विवशता भारतीय लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। नागरिक अधिकारों को लेकर भी जागरूकता जरूरी है।

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