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भारत और भारतीयता

देश में शिक्षा की दशा और दिशा एवं इस कारण बिगड़ रही व्यवस्था की व्याख्या करता 'पत्रिका' समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी का यह विचारोत्तेजक अग्रलेख -

Published: January 09, 2022 08:08:27 am

Gulab kothari Article : जिस शिक्षा के द्वारा देश का चरित्र निर्माण किया जाता है, वह आज सरेराह बिकती नजर आ रही है। स्कूल, अध्यापक से लेकर पुस्तक विक्रेता सभी तो बेच रहे हैं। देश आज भी बेरोजगार है, गुलाम है। शिक्षा व्यवस्था में जनहित व राष्ट्रहित नहीं है। स्कूल स्तर पर जहां बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण के साथ उनमें जीवन जीने की समझ पैदा करनी चाहिए वहां पाठ्यक्रमों में देश-प्रदेश और संस्कार ही नदारद हैं। अंग्रेजी माध्यम तो विकास के नाम पर बच्चों को अपनी माटी से दूर कर रहा है। मां-बाप को भी मातृभाषा में पढ़ते बच्चे हीन और अंग्रेजी बोलते हुए विकसित नजर आते हैं।

शिक्षा नीति के निर्माता, संचालक व कार्यरूप देने वाले, शिक्षा विभाग के शीर्ष अधिकारी सूट-बूट वाले अंग्रेजी चिंतन के अनुयायी लगते हैं। खुद भी पेट भरने के लिए जी रहे हैं और शिक्षा के जरिए पेट भरने वाले (अर्थ पिपासु) ही तैयार कर रहे हैं। आज शिक्षा विभाग ही बेरोजगारों को ठग रहा है। कभी भर्ती तो कभी परीक्षा। सब वर्षों तक चलते हैं। परीक्षा के पेपर लीक होते हैं। बेरोजगारों से पैसे खा जाते हैं। आखिर कोई भी परीक्षा रद्द होने पर वसूला गया पैसा अगली परीक्षा में काम क्यों नहीं आता?

भला ऐसा विभाग देश का चरित्र निर्माण कैसे करेगा? चिंता यही है कि मानव को कलियुग में पेट भरना सिखाने के लिए बीस वर्ष तक शिक्षा लेनी पड़ रही है। शेष जीवन ऐसा व्यक्ति किसके काम आ सकेगा? अपना पेट भरेगा-रिटायर होकर बाद में इस दुनिया से विदा भी हो जाएगा।

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Gulab kothari Article
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शिक्षा में जीवन की समग्रता और संपूर्ण अध्यात्म का समावेश होना चाहिए। विडम्बना यह है कि आजादी के 75 साल बाद भी हम गुलाम ही हैं। क्या अर्थ है आजादी के अमृत महोत्सव का? कोई संकल्प नहीं भारत की अपनी पहचान प्राप्त करने का। आज भी हमारी विधायिका, हमारी कार्यपालिका व न्यायपालिका अंग्रेजी मानसिकता से ग्रस्त है। सारे कानून आज भी पराए जैसे हैं। संस्कृति से तो मेल खाते ही नहीं।

जीवन कहीं ओर चलता है, कानून का डंडा कहीं ओर। कानून बनाने वाला आज भी अंग्रेजों की तरफ देखता है। देशवासियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, यह उसका विषय नहीं है। कितने नए मुकदमे बढ़ जाएंगे, कितना जनमानस आंदोलित होगा, कोर्ट के सामने क्या रखा जाएगा, फरियादी के कुछ समझ में आएगा या नहीं, इनमें से किसी भी विषय पर चर्चा नहीं होती। पैराकारों का अपना कारोबार चलता है। फरियादी घर बेचता हुआ मर जाता है।

शास्त्र हों या इतिहास, हमारी न्याय व्यवस्था तो ऐसी नहीं थी। आज व्यवस्था भारी है, इंसान गौण हो गया। अस्पतालों में मरीजों से ज्यादा बिलों पर ध्यान होता है। अस्पतालों में मरीज हों या दफ्तरों में फरियादी, कहीं भी भारत दिखाई नहीं पड़ता। चारों ओर आज भी अंग्रेज बैठे हैं। यही शिक्षा नीति की उपलब्धि है। इसी कारण हर साल गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) जीने वालों संख्या बढ़ रही है। वे भारतीय हैं।

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देश खो गया, शरीर रह गया, आत्मा मर गई। देश को अन्य भाषाओं/ भाषाई ज्ञान के सहारे भारत नहीं बनाया जाता-न बना पाएंगे। हमें पुन: इतिहास में जाना होगा। जिन-जिन कारणों/आक्रमणों ने हमारी संस्कृति छीनी है, उनको सिरे से उखाड़कर फेंकना होगा। चाणक्य-कनिष्क-वाल्मीकि को लौटाना होगा। अफसरों को भारतीय बनाना होगा। सारे नियम-कानून भारतीयता के संदर्भ में सुधारने पड़ेगे। तीनों स्तंभों के प्रशिक्षण भारतीय सांस्कृतिक धरातल पर, भारतीय भाषाओं और परिवेश में देने होंगे। लेकिन आज तो ये सब मिलकर देश को पुन: अंग्रेजों की झोली में ही धरे हुए हैं। खुद भी गुलाम हैं।

सांसद-विधायक जनता के प्रतिनिधि कहां रहे? पैसे देकर टिकट खरीदने के आरोप लगते हैं। पांच साल में इस रकम को वसूल करना और अगले चुनाव की तैयारी करना, हार जाएं तो अगले पांच साल की व्यवस्था-यही उद्देश्य दिखने लगा है। जाति, धर्म, क्षेत्रीयता में देश के टुकड़े कर अपना व्यापार करना ही राजनीति बनती जा रही है। जो मंत्री बने वे उद्योगपति हो गए। भारतीय संस्कृति का कोई प्रतिनिधि नजर नहीं आता। पगड़ी-साफा का राजनीति से कोई अर्थ नहीं रह जाता। इसे संस्कृति का मुखौटा कह सकते हैं।

शिक्षा में न ज्ञान हैं न भारतीय विज्ञान की अवधारणा हैं, न यह तथ्य ही समाहित है कि हम भी (शरीर) अन्य जीवों-पेड़-पौधों आदि की तरह प्रकृति द्वारा उत्पन्न होते हैं। आत्मा अमर है, न मरता है, न ही पैदा किया जा सकता है। हर युग में सुर-असुर साथ रहते हैं। शिक्षा में आसुरी शक्तियों से संघर्ष करने की क्षमता का विकास होना चाहिए। आज पशु की तरह पेट से बंधा व्यक्ति 'वसुधैव कुटुम्बकम' की कैसे सोच सकता है! आज की शिक्षा नौकर बनाती है, दूसरों के लिए, परतंत्र रहकर जीना सिखाती है, डिग्री का अन्य उपयोग ही नहीं है।

यह देश आज भी शिक्षा से नहीं चल रहा। विदेशी विचारधारा से राष्ट्रीय चिंतन दूर होता जा रहा है। देश में, विदेशी कंपनियां ही व्यापार-उद्योग- तकनीक पर हावी हैं। कानून ही जब देश के दर्शन के विपरीत बनेंगे, शिक्षा भी विदेशी ज्ञान पर आधारित होगी, तब देश में तो 'विदेश' ही विकसित होगा। माटी बंजर होती ही चली जाएगी। बेरोजगारी, बीपीएल, महंगाई और भ्रष्टाचार ही विकास के पर्याय होंगे।

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