उत्तर प्रदेश में चुनाव की रणभेरी अभी बजी नहीं है लेकिन नेताओं को धर्म और जातियों की चिंता सताने लगी है। ठीक वैसे ही जैसे पांच साल पहले सताई थी। कहीं ब्राह्मण-दलित फार्मूले को मजबूत कर सत्ता की सवारी के सपने संजोए जा रहे हैं तो कहीं अल्पसंख्यक-यादव गठबंधन की चर्चा जोर पकड़ रही है। अन्य पिछड़ा वर्ग और दूसरी जातियों की सुध लेने वालों की भी कमी नहीं।
पूरा उत्तर प्रदेश वोटों की मंडी में तब्दील होता दिख रहा है। जातियों के सम्मेलनों में तमाम वायदे किए जा रहे हैं तो टिकट बंटवारे में भी पूरा ख्याल रखने का आश्वासन दिया जा रहा है। वोटों के इस खेल में न कोई राजनीतिक दल पीछे है और न कोई नेता। सौदेबाजी कहीं खुलेआम हो रही है तो कहीं पर्दे के पीछे। अकेले उत्तर प्रदेश में ही नहीं, चुनाव कहीं भी हो, ऐसे जोड़-तोड़ हर जगह नजर आ जाते हैं। इक्कीसवीं सदी में जब दुनिया सूचना क्रांति की बयार में सबसे आगे निकलने की होड़ में जुटी हो, जातियों के सहारे चुनावी नैया पार लगाने की बात अजीब लगती है।
इस सच से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि पांच साल तक उठापटक की राजनीति में मशगूल रहे राजनेता आखिर और करें भी तो क्या? न सत्तारूढ़ दल के पास गिनाने को उपलब्धियां रह गई हैं और न विपक्ष अपने आपको जनता के दुख-दर्द के साथी के रूप में पेश कर सकता है।
फिर चुनाव जीतने के लिए जाति और धर्म का सहारा लेने के अलावा दूसरा रास्ता भी शायद नजर नहीं आता। क्या इन्हीं हथकंडों के सहारे गांधीजी के सपने पूरे किए जा सकते हैं? ये हकीकत भी किसी से छिपी नहीं कि चुनाव जीतने के बाद नेताओं को न धर्म याद रहता है और न जाति। गरीब और गरीब होते जाते हैं और अमीर और अमीर। फिर भी जाति के नाम पर राजनीति की दुकान चलाने वालों का धंधा कभी मंदा नहीं पड़ता। इनकी पांचों अंगुलियां हमेशा घी में ही रहती हैं।