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भगवान शिव वैज्ञानिक दृष्टिकोण : शिवोहम् में समाहित सृष्टि

- शिव आदि योगी हैं, प्रथम गुरु हैं और प्रथम योगी हैं। बहुत कम अवसर होते हैं, जब शिव क्रोध करते हैं, परन्तु जब उन्हें क्रोध आता है तो वे विनाश कर देते हैं।

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भगवान शिव का वैज्ञानिक दृष्टिकोण : शिवोहम् में समाहित सृष्टि

भगवान शिव का वैज्ञानिक दृष्टिकोण : शिवोहम् में समाहित सृष्टि

संतोष गैरोला

भगवान शिव सनातन धर्म के सर्वशक्तिमान देवों में से एक हैं। शिव ऐसे अद्भुत देव हैं जो सभी को प्रिय हैं। न तो उन्होंने स्वर्णाभूषण और सुनहरे परिधान पहने हैं, न ही उन्हें विलासितापूर्ण जीवन प्रिय है। सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि भगवान शिव को संहारक भी कहा गया है। क्या यह विचित्र नहीं है कि वे संहारकर्ता हैं लेकिन सदा ध्यान मुद्रा में लीन रहते हैं? शिव आदि योगी हैं, प्रथम गुरु हैं और प्रथम योगी हैं। बहुत कम अवसर होते हैं, जब शिव क्रोध करते हैं, परन्तु जब उन्हें क्रोध आता है तो वे विनाश कर देते हैं।

प्रश्न यह है कि एक विनाशक के प्रति अत्यधिक प्रेम व श्रद्धा क्यों? वे क्या विनाश करते हैं? भगवान शिव अज्ञान, कामनाओं, मृत्यु, पीड़ा, अहंकार, वासना, मोह-माया और क्रोध का नाश करते हैं। इसलिए भक्त भगवान शिव की शरण में जाते हैं, जो सदा शांत एवं सच्चिदानंद स्वरूप हैं। भगवान शिव को त्रिमूर्ति का महत्त्वपूर्ण देव माना गया है। दो अन्य देव ब्रह्मा एवं विष्णु हैं।

आइए शिव के व्यापक स्वरूप को जानें-समझें। ब्रह्मा इस भौतिक जगत के सृजनकर्ता हैं और ब्रह्मांड के वैज्ञानिक नियमों के जनक हैं। विष्णु संसार के पालनकर्ता हैं। ब्रह्मा द्वारा रचित इस संसार को नष्ट करना उनके लिए असंभव था क्योंकि यह ब्रह्मा के बताए गए सृष्टि के नियमों के प्रतिकूल होता। इसीलिए ब्रह्मा व विष्णु दोनों अपने-अपने कत्र्तव्यों सृष्टि के सृजन और पालन के लिए प्रतिबद्ध थे। दूसरी ओर महेश यानी शिव सृष्टि के सभी नियमों से परे हैं। विश्व के सभी बंधनों से मुक्त वे परम वैरागी हैं। इसलिए संहार करने की शक्ति शिव में निहित है। ब्रह्मांड में एकमात्र शिव हैं जो द्रव्य को ऊर्जा में बदल सकते हैं।

अल्बर्ट आइंसटीन के वैज्ञानिक सूत्र ई = एमसी2 का अभिप्राय भी यही है कि द्रव्य को ऊर्जा में परिवर्तित किया जा सकता है लेकिन उसे नष्ट नहीं किया जा सकता। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार, जब सृष्टि का संहार होता है तो वह ऊर्जा रूप ले लेती है और यह ऊर्जा भगवान शिव है। परस्पर विनिमेय की यह अवस्था 'शिवोहम्' कहलाती है। इस प्रकार ब्रह्मांड की सारी ऊर्जाओं का परम स्रोत शिव ही हैं। इसलिए जब हम ब्रह्मांड की बात करते हैं तो व्यापक स्तर पर हम भगवान शिव की ही बात करते हैं।

अब सूक्ष्म परिप्रेक्ष्य में भगवान शिव को समझते हैं। एक चर ब्रह्मांड में ही जीवन की निरंतरता संभव है, अचर ब्रह्मांड में ऐसा संभव नहीं है। ब्रह्मा द्वारा रचित सृष्टि उस समय स्थायी नहीं थी। इसलिए ब्रह्मा और विष्णु ने शिव से आग्रह किया कि वे इस चराचर जगत को स्थायित्व प्रदान करें और शिव ने उनकी विनती स्वीकार ली। जगत को स्थिरता प्रदान करने के लिए भगवान शिव ने द्वैत रूप धारण किया। यह है शिवऔर शक्ति(भगवान शिव की द्विध्रुवीय प्रकृति)। यह भगवान शिव की तरंग-कण द्वैत प्रकृति है, जो भौतिक यथार्थ में विद्यमान है। इस रूप में शिव एक कण हैं और देवी शक्ति एक तरंग। दोनों इस जगत की स्थिरता बनाए रखने के लिए एक-दूसरे को पकड़े हुए हैं। शिव, शक्ति से कभी अलग नहीं हैं। भगवान शिव के इस स्वरूप के कारण ही जीवन सृष्टि का अनिवार्य अंग है।
(लेखक आइटी प्रोफेशनल और वैदिक साहित्य पर लेखन करते हैं)