2 फ़रवरी 2026,

सोमवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

भविष्य की तैयारी या फिर पुरानी समस्याओं से किनारा?

छात्राओं की उच्च शिक्षा में भागीदारी बढ़ाने के लिए देश के प्रत्येक जिले में एक गल्र्स हॉस्टल बनाने का प्रस्ताव है। हालांकि हमें उन चुनौतियों पर ध्यान देना होगा जिन्हें अक्सर चमकदार घोषणाओं के नीचे दबा दिया जाता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में यह स्पष्ट कहा गया था कि भारत को अपनी शिक्षा पर जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च करना चाहिए। वर्तमान में यह आवंटन लगभग 2.8 से 3 प्रतिशत के बीच झूल रहा है। सबसे गंभीर समस्या शिक्षकों की भारी कमी है।

3 min read
Google source verification
Education Budget 2026

Education Budget 2026

प्रो. अशोक कुमार, शिक्षाविद एवं पूर्व कुलपति

केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा शिक्षा मंत्रालय के लिए 1.39 लाख करोड़ का आवंटन करना एक स्वागत योग्य कदम है, जो पिछले वर्ष के 1.28 लाख करोड़ के मुकाबले लगभग 8.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है। यह आंकड़ा पहली नजर में शिक्षा के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, लेकिन यदि हम इसकी गहराई में उतरें, तो यह बजट ‘भविष्य की उड़ान’ और ‘भूतकाल के बोझ’ के बीच एक संघर्ष जैसा प्रतीत होता है। बजट 2026 की सबसे बड़ी विशेषता इसका उद्योग-केंद्रित दृष्टिकोण है। इस बजट के अनुसार औद्योगिक गलियारों के पास 5 एकीकृत ‘यूनिवर्सिटी टाउनशिप’ विकसित की जाएंगी। इनका उद्देश्य अनुसंधान और शिक्षा को सीधे उद्योगों से जोडऩा है। छात्राओं की उच्च शिक्षा में भागीदारी बढ़ाने के लिए देश के प्रत्येक जिले में एक गल्र्स हॉस्टल बनाने का प्रस्ताव है। आइआइटी में भविष्य की तकनीक के लिए विशेष लैब बनाई जाएंगी। पूर्वी भारत में एक नया राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान स्थापित किया जाएगा। एआइ और स्किलिंग 15,000 माध्यमिक स्कूलों और 500 कॉलेजों में ऑडियो-विजुअल, गेमिंग एवं कॉमिक्स (एवीजीसी) कंटेंट क्रिएटर लैब्स स्थापित की जाएंगी।
‘भारतीय भाषा पुस्तक योजना’ के तहत भारतीय भाषाओं में डिजिटल पाठ्यपुस्तकों का विस्तार किया जाएगा। लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम के तहत विदेश में पढ़ाई और इलाज के लिए टीसीएस की दरों में कटौती की गई है, जिससे विदेश में शिक्षा लेना थोड़ा सस्ता हो सकता है। तीन नए राष्ट्रीय औषधीय शिक्षा और अनुसंधान संस्थान खोले जाएंगे। डिजिटल माध्यम से स्थानीय भाषाओं में पाठ्यपुस्तकों की उपलब्धता शिक्षा के लोकतंत्रीकरण की दिशा में एक बड़ा कदम है, जो भाषा की बाधा को तोडक़र ज्ञान को सुलभ बनाएगी। लेकिन हमें उन चुनौतियों पर ध्यान देना होगा जिन्हें अक्सर चमकदार घोषणाओं के नीचे दबा दिया जाता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में यह स्पष्ट कहा गया था कि भारत को अपनी शिक्षा पर जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च करना चाहिए। वर्तमान में, यह आवंटन लगभग 2.8 से 3 प्रतिशत के बीच झूल रहा है। सबसे गंभीर समस्या शिक्षकों की भारी कमी है। डिजिटल उपकरण केवल ‘साधन’ हैं, ‘साध्य’ नहीं। आज भारत के कई प्रमुख विश्वविद्यालयों में 30 से 50 प्रतिशत तक शैक्षणिक पद रिक्त पड़े हैं। बजट में इन पदों को भरने के लिए किसी भी ‘विशेष भर्ती अभियान’ समर्पित फंड का अभाव खलता है। जब शिक्षक ही नहीं होंगे, तो प्रयोगशालाएं और डिजिटल बोर्ड धूल ही फांकेंगे।
राज्य विश्वविद्यालयों की उपेक्षा: बजट का बड़ा हिस्सा भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान और केंद्रीय विश्वविद्यालयों में सिमट जाता है। भारत के 80 प्रतिशत से अधिक विद्यार्थी राज्य विश्वविद्यालयों और उनसे संबद्ध कॉलेजों में पढ़ते हैं, जो आज भी फंड और उपकरणों की कमी से जूझ रहे हैं। शोध के लिए मिलने वाला अधिकांश फंड भी प्रीमियम संस्थानों तक ही सीमित रहता है, जिससे छोटे विश्वविद्यालयों में अनुसंधान की संस्कृति दम तोड़ रही है। जब तक हम अपने राज्य विश्वविद्यालयों को आधुनिक नहीं बनाएंगे, तब तक हम एक ‘असमान समाज’ का निर्माण करते रहेंगे। नए युग की तकनीक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) की बातें तो हैं, लेकिन पुराने लैब को आधुनिक बनाने या ग्राउंड लेवल पर शिक्षकों को ‘हैंड्स-ऑन’ ट्रेनिंग देने के लिए बजट अपर्याप्त लगता है। बजट 2026 तकनीक और आधुनिकता पर तो जोर देता है, लेकिन यह उस ‘जवाबदेही’ और ‘गुणवत्ता’ के सवाल पर मौन है जो भारतीय शिक्षा व्यवस्था को अंदर से खोखला कर रही है। एआइ और आधुनिक लैब निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे एक जीवंत शिक्षक का विकल्प नहीं हो सकते। हमें यह समझना होगा कि भ्रष्टाचार और गिरती शैक्षणिक गुणवत्ता का समाधान केवल डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है। इसके लिए हमें शिक्षकों की भर्ती, उनके निरंतर प्रशिक्षण और संस्थानों की स्वायत्तता पर निवेश करना होगा। यदि आधारभूत ढांचा (शिक्षक और बुनियादी सुविधाएं) कमजोर है, तो उस पर खड़ी की गई डिजिटल इमारत कभी भी ढह सकती है। यह बजट भविष्य की ओर एक साहसी कदम तो है, लेकिन यह अपनी पुरानी और बुनियादी समस्याओं से किनारा करता हुआ भी दिखता है। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार केवल नए संस्थान खोलने पर ही नहीं, बल्कि मौजूदा संस्थानों की आत्मा (शिक्षकों और शोध की गुणवत्ता) को पुनर्जीवित करने पर भी ध्यान दे।

Story Loader