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कर्म के कैनवस पर चेतना की चित्रकला हैं श्रीकृष्ण

जन्माष्टमी पर विशेष: कृष्ण साधना भी हैं सिद्धि भी

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Nitin Kumar

Sep 07, 2023

कर्म के कैनवस पर चेतना की चित्रकला हैं श्रीकृष्ण

कर्म के कैनवस पर चेतना की चित्रकला हैं श्रीकृष्ण

अजहर हाशमी
कवि और साहित्यकार
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महाभारत के ‘भीष्म पर्व’ के 43वें अध्याय के प्रथम श्लोक में स्पष्ट कथन है: ‘गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै: शास्त्र संग्रहै:। या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद् विनि:सृता।।’ अर्थात् द्ग ‘अन्य बहुत-से शास्त्रों का संग्रह करने की क्या आवश्यकता है? गीता का ही अच्छी तरह से गान करना चाहिए, क्योंकि वह स्वयं पद्मनाभ श्रीकृष्ण के मुख-कमल से निकली हुई है।’ यहां यह समझ लेना जरूरी है कि गीता-ग्रंथ दरअसल दिव्यवाणी है अर्थात् भगवान श्रीकृष्ण का वचनामृत। जिस वचन/वाक्य में दिव्यता होती है वह अजर-अमर होता है।

गीता, श्रीकृष्ण का वचन है इसलिए उसमें दिव्यता है क्योंकि वह पारलौकिक है। यहां लौकिक और पारलौकिक का अंतर समझना भी उचित होगा। जो पारलौकिक है वह दिव्य है, किंतु जरूरी नहीं कि वह भव्य भी हो। भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं में ऐसे अनेक उदाहरण हमें मिलते हैं। जैसे, कंस और रावण सज-संवरकर भले ही भव्य हो जाते थे किंतु दिव्य नहीं थे। अंतत: उनको नष्ट होना पड़ा, जिसके मूल में उनके दुष्कर्म ही थे। लौकिक भव्यता अपनी सांसारिकता के कारण नश्वर है। पारलौकिक दिव्यता अपनी आध्यात्मिकता के कारण अनश्वर है। क्षरण होने के कारण भव्यता होती है ‘क्षर’, किंतु क्षरण नहीं होने से दिव्यता होती है ‘अक्षर’।

मेरा यह भी मौलिक मत है कि जो ‘क्षर’ है वह भ्रम है, किंतु जो ‘अक्षर’ है वह ब्रह्म है। तात्पर्य यह कि भ्रम से ‘दूर’ रहो और ब्रह्म में ‘चूर’ रहो। मैं लौटकर पुन: भव्यता और दिव्यता यानी क्षर तथा अक्षर पर आता हूं। भगवान श्रीकृष्ण की दिव्यवाणी होने से गीता में दिव्यता है। भगवान की वाणी ‘अक्षर’ है, इसीलिए वह ब्रह्म है और इसीलिए गीता लोक के लिए सदा-सर्वदा सुखदायी-शुभदायी है। इसका अर्थ यह हुआ कि गीता कोई काल्पनिक कहानी/ कपोल-कल्पित कथा/ मनगढ़ंत उपन्यास नहीं है अपितु यह तो महाभारत के युद्ध में ंमोहग्रस्त अर्जुन के लिए ‘ब्रेकिंग न्यूज’ की तरह सिद्ध हुई जिसमें ‘ड्यूटी’ के ‘डिवाइन व्यूज’ हैं। यहां यह भी उल्लेख जरूरी है कि कल्पित कहानी या मनगढ़ंत किस्सा समय के साथ खत्म हो जाता है, क्योंकि उसका ‘वजूद’ नहीं होता। किंतु कर्म/भक्ति/ज्ञान की ईश्वरीय वाणी के रूप में गीता का वजूद कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा।

विभिन्न धर्मों को समझने की कोशिश करते हुए विद्यार्थी और विशेष रूप से गीता को जानने में लगे जिज्ञासु के नाते मेरा विनम्र मत है कि गीता कर्म का कदम्ब है जिस पर पुरुषार्थ के पंछी चहकते हैं/ गीता भक्ति का उद्यान है जिसमें मोक्ष के मोगरे महकते हैं/ गीता ज्ञान का गगन है जिसमें नैतिकता के नक्षत्र चमकते हैं/ गीता चेतना का चमन है जिसमें सुख-सुकून दमकते हैं। गीता केवल और केवल हिन्दू धर्म ग्रंथ नहीं है। मेरे मत में गीता नीति ग्रंथ है और नीति ग्रंथ सबका होता है।
मेरे मौलिक मत में भक्ति की तूलिका और ज्ञान के रंग से कर्म के कैनवस पर चेतना की चित्रकला हैं श्रीकृष्ण। काव्य-पंक्तियां भी हैं द्ग ‘कृष्ण यानी साधना भी सिद्धि भी, कृष्ण यानी सत्य भी प्रसिद्धि भी, कृष्ण यानी भावना की भव्यता, कृष्ण यानी दिव्यता ही दिव्यता, कृष्ण यानी तम का व्यूह भेदना, कृष्ण यानी चेतना ही चेतना।’

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