बिहार में शिक्षा की चिंता किसे, उपवास पर उपेन्द्र कुशवाहा

बिहार में शिक्षा की चिंता किसे, उपवास पर उपेन्द्र कुशवाहा

Gyanesh Upadhyay | Publish: Dec, 08 2018 05:58:36 PM (IST) Patna, Patna, Bihar, India

केन्द्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा एक शुरुआत कर रहे हैं, भले ही इसके पीछे उनकी राजनीति हो, लेकिन विकास के लिए ऐसे संघर्ष की बिहार में बड़ी जरूरत है।

पटना। नालंदा और विक्रमशिला का वह दौर इतिहास में दर्ज है। पहले पूरी दुनिया के छात्र अच्छी शिक्षा के लिए बिहार आते थे, लेकिन आज इसी बिहार में छात्र बाहर जाकर पढऩे को मजबूर हो रहे हैं। केन्द्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा दो दिवसीय उपवास पर हैं, ताकि शिक्षा की दिशा में बिहार सरकार काम करे और सुधार हो। यह बिहार के लिए भी दुर्लभ क्षण है कि कोई नेता वाकई विकास के लिए उपवास कर रहा है। तमाम विशेषज्ञ यह बात कई बार बोल चुके हैं कि बिहार के नेताओं में विकास के लिए तड़प नहीं है, इसलिए राज्य पिछड़ गया।

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साक्षरता में सबसे पीछे बिहार
साक्षरता के मामले में बिहार बाकी राज्यों के तुलना में पीछे है। वर्ष 2011 की जनगणना में बिहार में महज 63.8 प्रतिशत लोग साक्षर थे, जबकि देश की साक्षरता दर 74 प्रतिशत थी। अनुमान है कि आज बिहार में 71 प्रतिशत लोग साक्षर हो चुके हैं, लेकिन यह आंकड़ा देश के आंकड़े से अभी भी 10 प्रतिशत से भी कम है। केन्द्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाहा बोल चुके हैं कि बिहार में ऐसे प्राथमिक शिक्षक हैं, जिन्हें 1 से 100 तक गिनती भी नहीं आती। वे मांग कर रहे हैं कि वर्ष 2003 के बाद बिहार में जो शिक्षक रखे गए हैं, उनका मूल्यांकन होना चाहिए और शिक्षकों की नियुक्ति बिहार लोकसेवा आयोग के जरिये होनी चाहिए। उपेन्द्र कुशवाहा ने आरोप लगाया है कि विद्यालयों को भोजनालय बना दिया गया है।

स्कूल खोलने के लिए जमीन नहीं
बिहार सरकार की शिक्षा के प्रति ज्यादा रुचि नहीं दिखती। देश भर में 200 केन्द्रीय विद्यालयों को मंजूरी मिली थी। बिहार सरकार ने केवल दो विद्यालयों के लिए प्रस्ताव भेजा था, प्रस्ताव केन्द्र सरकार ने मान लिया, लेकिन इन विद्यालयों के लिए देवकुंड और नवादा में बिहार सरकार जमीन नहीं दे पाई है। उपेन्द्र कुशवाहा की तात्कालिक मांग यही है कि इन विद्यालयों के लिए जमीन दी जाए।

चरवाहा मॉडल बनाम नालंदा मॉडल
लालू प्रसाद यादव शिक्षा सुधार के लिए विद्यालय का चरवाहा मॉडल लेकर आए थे, जो नाकाम रहा। अब नीतीश कुमार के नालंदा मॉडल की बात हो रही है, लेकिन जिस तरह के शिक्षकों को रखा जा रहा है, उससे यह नया मॉडल भी फेल हो जाएगा। शिक्षकों की भर्तियों में घोर जातिवाद, भाई भतीजावाद और रसूख की भूमिका रही है, जिसकी वजह से शिक्षकों की गुणवत्ता बिहार में बहुत खराब हो चुकी है।

क्या यहां नहीं होती अच्छी पढ़ाई?
आईएएस और आईपीएस की नौकरी में बिहार के युवा बड़ी संख्या में चुने जाते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि इनमें से ज्यादातर युवा बाहर जाकर पढ़ते हैं, तभी कामयाब होते हैं। हालांकि विशेषज्ञ बताते हैं कि अच्छी नौकरी में बिहार के युवाओं की संख्या अब घट रही है। इसके लिए मुख्य रूप से बिहार की खराब शिक्षा व्यवस्था जिम्मेदार है।

बिहार में साक्षरता प्रतिशत
वर्ष 1951 - 13.49
वर्ष 1981 - 32.32
वर्ष 2001 - 47.53
वर्ष 2011 - 63.8
वर्ष 2018 - 71 (अनुमानित)

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