बद्रीनाथ के दर्शन से मिलता है दिव्यलोक

भगवान सूर्य अपनी किरणों से मंदिर के पीछे के बर्फ के पहाड़ों पर जब अपनी किरणें डालते हैं तो सारे बर्फीले पहाड़ स्वर्णिम से नजर आते हैं

By: सुनील शर्मा

Published: 01 Jun 2016, 12:19 PM IST

पत्रिका यमुनोत्री, गंगोत्री, गोमुख और केदारनाथ के बाद पहुंच गया बद्रीनाथ धाम। पेश है बद्रीनाथ धाम से उरुक्रम शर्मा की जीवंत रिपोर्ट-
केदारनाथ की भांति सूर्यादय पर बद्रीनाथ भी स्वर्णजडि़त मुकुट धारण कर लेते हैं। भगवान सूर्य अपनी किरणों से मंदिर के पीछे के बर्फ के पहाड़ों पर जब अपनी किरणें डालते हैं तो सारे बर्फीले पहाड़ स्वर्णिम से नजर आते हैं। इतना मनोरम दृश्य होता है कि मनुष्य आत्मिक शांति के लोक में खो जाता है। भगवान बद्रीनाथ के चरणों में अलखनंदा नदी बहती है और कहा जाता है कि इस स्थान के दर्शन मात्र से ही सारे दुख दूर हो जाते हैं और मनुष्य को परमलोक की प्राप्ति होती है।

नर और नारायण पर्वतों के बीच में स्थित भगवान बद्रीनाथ विराजमान हैं। केदारनाथ से जब बद्रीनाथ के लिए रवाना हुए तो ऊखीमठ होकर ही बद्रीनाथ का रास्ता है। ऊखीमठ वो ही स्थान है, जहां भगवान केदारनाथ सर्दियों में वास करते हैं। कहने को तो बद्रीनाथ के मंदिर तक वाहन सुविधा उपलब्ध है, लोगों को तकलीफ ना हो, इसका तो  ध्यान  रखा गया है, मगर बद्रीनाथ तक जाने का रास्ता सबसे कठिन और दुर्गम सा लगता है। समूचे रास्ते में खतरनाक घुमावदार मोड़, कच्चे पहाड़, संकरे रास्ते एवं टूटे रास्ते, भू-स्खलन। कब कौनसा पर्वत ऊपर से दरक जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता है। जगह-जगह इस संबंध में चेतावनी बोर्ड लगा रखे हैं। पहाड़ों से पत्थर गिरने की भी बड़ी समस्या है। हमारी  कार पर ऊपर से आकर अचानक पत्थर गिरा और आगे का शीशा दरक गया।

इन सब परेशानियों के बावजूद बद्रीनाथ धाम की ओर बढ़े  जा रहे थे। समूचा रास्ता पेड़ों से आच्छादित और आध्यात्मिक एवं आत्मिक शांति दे रहा था। हजारों  की  तादाद में तीर्थयात्री पहुंच रहे थे। बड़ी संख्या में ऐसे भी लोग थे, जो जय बद्री विशाल के  जय घोष के साथ पैदल ही बढ़े जा रहे थे। ऊंचे-ऊंचे पहाड़ और उन पर गिरी बर्फ सुकून देती  है। रास्ते में इतने रमणीक स्थान हैं जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

चौपता, तुंगनाथ, गोपेश्वर, चमोली और ज्योर्तिमठ। सबकी अपनी  अद्भुत कहानी है। करीब 12 घंटे का सफर तय करके बद्रीनाथ पहुंचे तो ऐसा लगा कि किसी दूसरी लोक में आ गए। मन को स्वयं ही ऐसी शांति का  अहसास हो रहा था, जैसा और कहीं संभव नहीं। दीन-दुनिया से दूर के भाव पैदा होने लगे। अलखनंदा नदी का कलकल और मंदिर की घंटियां जब वादियों में गूंज रही थी तो ऐसा लग रहा था कि  दुनियादारी से दूर ईश्वर की शरण में आ गए।

चारों तरफ पहाड़ों से गिरते ठंड़े झरने, शीतल अलखनंदा, पहाड़ों पर बर्फ। इसके बीच ही गर्म पानी का कुंड़। कल्पना से परे था। कहा जाता है कि इस तप्त कुंड में स्नान करने के बाद ही जय बद्री विशाल के दर्शन किएजाते हैं। इस तप्तकुंड़ में नहाने के साथ ही सारी थकान दूर हो गई। हर कोई इसमें स्नान करके स्वयं को धन्य मान रहा था। पुराणों में भी इसका उल्लेख है और कहा जाता है कि जो कोई इसमें स्नान करके भगवान बद्री को स्मरण करते हुए उनके दर्शन करता है, देवता भी उसकी स्तुति करते हैं।

बद्रीनाथ में दर्शन के लिए जा रहे लोगों के हाथों में पूजा  की थाली। इसमें एक अत्यंत ही  सुंदर गुथी हुई तुलसी की माला। तुलसी को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, तभी भगवान बद्री के इसे चढ़ाया जाता है। हर किसी को पूजा करने का अवसर मिलता है।

आभूषणों से सुसज्जित हैं जय बद्री विशाल
भगवान बद्रीनाथ की प्रतिमा को स्वर्ण एवं रजत आभूषणों के साथ-साथ हीरे से सजा रखा है। भगवान पदमासन ध्यान में हैं और ललाट पर हीरा लगा हुआ है। आसन भी स्वर्ण से जडि़त है। इस मंदिर की पूजा सिर्फ केरलीय नंबूदरी ब्राह्मण ही कर सकते हैं।

बद्रीनाथ की महिमा
बदरिकाश्रम में ऋषि गण रहा करते थे। यहीं वे तपस्या और साधना में लीन रहते थे। प्राकृतिक सुषमा की दृष्टि से भी बद्रीनाथ संसार के दर्शनीय स्थलों में से एक है। हिमशृंगों की कांति इस पुण्यधाम की आज भी शोभा बढ़ा  रही है। यहां की प्रकृति का वर्णन दिव्य-दिव्य शब्द के रूप में किया जा सकता है। प्रकृति की शोभा ब्रह्म की शोभा है। यहां ईश्वर ही हिम संहिता के रूप में शोभायमान है। यह क्षेत्र प्राकृतिक और आध्यात्मिक शक्तियों से संपन्न है।
सुनील शर्मा
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned