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सोनिया पर लिखी इस कविता के चलते निशाने पर हैं मुनव्वर राणा

राणा ने कहा, जिस कविता के चलते मुझ पर कांग्रेस के करीबी होने का आरोप लग रहा है उसमें मैंने सोनिया के साथ सिंधु का भी किया था जिक्र
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Puneet Parashar

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Updated: 19 Oct 2015, 4:21 PM IST

Sonia-Munavvar

Sonia-Munavvar

नई दिल्ली। इस बात का इल्म कम ही लोगों को है कि उर्दू के जाने माने शायर मुनव्वर राणा ने कभी सोनिया गांधी की तारीफ में भी एक कविता लिखी थी। अब उस कविता को लेकर मुनव्वर राणा पर निशाना साधा जा रहा है। इस कविता के चलते राणा पर कांग्रेस के करीबी होने का आरोप लग रहा है। अपनी सफाई में राणा ने कहा है कि, '"तरूण विजय पर जो लेख लिखा है वो क्या है? मैं सिंधु नदी पर कविता लिखी थी। जिस किताब के लिए मुझे अवार्ड मिला है उसमें अगर सोनिया गांधी पर नज्म है तो सिंधु नदी पर भी है। हम लुका छिपी का खेल तो करते नहीं हैं। किसी पार्टी से चंदा लाते नहीं है, कोई एनजीओ चलाते नहीं हैं। कोई दुकान हमारी है नहीं।" आइए आपको पढ़ाते हैं यह कविता-

रुख़सती होते ही मां-बाप का घर भूल गयी।
भाई के चेहरों को बहनों की नज़र भूल गयी।
घर को जाती हुई हर राहगुज़र भूल गयी,
मैं वो चिडि़या हूं कि जो अपना शज़र भूल गयी।
मैं तो भारत में मोहब्बत के लिए आयी थी,
कौन कहता है हुकूमत के लिए आयी थी।
नफ़रतों ने मेरे चेहरे का उजाला छीना,
जो मेरे पास था वो चाहने वाला छीना।
सर से बच्चों के मेरे बाप का साया छीना,
मुझसे गिरजी भी लिया, मुझसे शिवाला छीना।
अब ये तक़दीर तो बदली भी नहीं जा सकती,
मैं वो बेवा हूं जो इटली भी नहीं जा सकती।
आग नफ़रत की भला मुझको जलाने से रही,
छोड़कर सबको मुसीबत में तो जाने से रही,
ये सियासत मुझे इस घर से भगान से रही.
उठके इस मिट्टी से, ये मिट्टी भी तो जाने से रही।
सब मेरे बाग के बुलबुल की तरह लगते हैं,
सारे बच्चे मुझे राहुल की तरह लगते हैं।
अपने घर में ये बहुत देर कहां रहती है,
घर वही होता है औरत जहां रहती है।
कब किसी घर में सियासत की दुकान रहती है,
मेरे दरवाज़े पर लिख दो यहां मां रहती है।
हीरे-मोती के मकानों में नहीं जाती है,
मां कभी छोड़कर बच्चों को कहां जाती है?
हर दुःखी दिल से मुहब्बत है बहू का जिम्मा,
हर बड़े-बूढ़े से मोहब्बत है बहू का जिम्मा।
अपने मंदिर में इबादत है बहू का जिम्मा।
मैं जिस देश आयी थी वही याद रहा,
हो के बेवा भी मुझे अपना पति याद रहा।
मेरे चेहरे की शराफ़त में यहां की मिट्टी,
मेरे आंखों की लज़ाजत में यहां की मिट्टी।
टूटी-फूटी सी इक औरत में यहां की मिट्टी।
कोख में रखके ये मिट्टी इसे धनवान किया,
मैंन प्रियंका और राहुल को भी इंसान किया।
सिख हैं, हिन्दू हैं मुलसमान हैं, ईसाई भी हैं,
ये पड़ोसी भी हमारे हैं, यही भाई भी हैं।
यही पछुवा की हवा भी है, यही पुरवाई भी है,
यहां का पानी भी है, पानी पर जमीं काई भी है।
भाई-बहनों से किसी को कभी डर लगता है,
सच बताओ कभी अपनों से भी डर लगता है।
हर इक बहन मुझे अपनी बहन समझती है,
हर इक फूल को तितली चमन समझती है।
हमारे दुःख को ये ख़ाके-वतन समझती है।
मैं आबरु हूं तुम्हारी, तुम ऐतबार करो,
मुझे बहू नहीं बेटी समझ के प्यार करो।

आपको बता दें अवॉर्ड लौटाए जाने के साथ ही मुनव्वर राना ने एलान किया कि अब वह भविष्य में कभी कोई सरकारी अवॉर्ड नहीं लेंगे। हालांकि, शो के दौरान कई दूसरे साहित्यकारों, लेखकों और कवियों ने मुनव्वर राना से अपील कि वह अभी अपना अवॉर्ड नहीं लौटाएं, लेकिन मुनव्वर राना ने ऐसा करने से मना कर दिया।