
छत्तीसगढ़ महतारी के रतन बेटा स्वतंत्रता सेनानी अनंतराम बरछिहा
बिचार ल जब बेवहार म लानबो तब सच्चा गांधीवादी कहाबो। सच्चा चेला ल बलिदान देबर तियार रहना चाही। हम बनबो सच्चा गांधीवादी। समता, एकता के बेवहार करके बताबो। ए संकलप लिस चंदखुरी वाले अनंतराम बरछिहा ह।
1920 म जब गांधीजी रइपुर अइस त तीस बछर के जवान बरछिहाजी उंकर पक्का अनुयायी, चेला, भगत बनगे। 1923 के झंडा सत्याग्रह म भाग लिन। छह महीना के सजा मिलिस। फेर, 1930 म चंदखुरी गांव आजादी के आंदोलन के गढ़ बनगे। असहयोग आंदोलन म नेता के रूप म अनंतरामजी सबले आगू आ गे। छुआाछूत मिटाना, खादी ग्रामोद्योग के परचार, सहभोज, गांव के साफ -सफाई सब जुर मल के करंय। एक बटालियन पुलिस चंदखुरी म तैनात कर दे गिस।
ए गांव म एकता अइसन के पुलिस वालामन ला मांगे म आगी-पानी घलो नइ देवत रिहिस। बरछिहाजी पो_ किसान अउ बड़े दुकानदार राहय। इलाका म उनला सेठ केहे जाय। पुलिस वाला साहेब ह बरछिहाजी ल सामान लेबर संदेस दिस। बरछिहाजी जवाब दिस सगा बनके आहू त सुवागत हे अउ अंगरेज के सेवा करइया साहेब बनके आहू त जय रामजी की। हम तुंहला चिन्हन नइ। अंगरेज जमाना के साहेब खिसियागे। दुकान ल लुटवा दिस। इलाकाभर म खबर कर दिस के जौन उधारी हे तेला झन पटावव। दुकानदार ल सहजोग झनदव। लूट लव दुकान ल।
इंकरे संग बरछिहाजी संग गांव के सात झन अउ आजादी के सिपाहीमन ल जेल म धांध दीन। गिरफ्तार लोगन रिहिन बरछिहाजी के छोटे भार्ई सुखराम बरछिहा, बड़े बेटा वीर सिंह, नन्हें लाल वरमा, गनपत मरेठा, हजारी लाल वरमा अउ हीरालाल साहू। बरछिहाजी के लाखों रुपिया डूबगे। दुकान बंद होगे। धनी मानी मनखे फकीर होगे। खेती किसानी ठप होगे। अंगरेजमन अनंतरामजी ल बड़े दुस्मन समझ के अतियाचार सुरू कर दीन। जेल म बरछिहाजी गांधीवाद के अलख जगइस। खादी के कपड़ा के मांग करिस। एक बछ्र के सजा दीन अउ जुरमाना लाद दीन। उंकर नागर बक्खर, बइला गाय गरू के नीलामी होगे।
1930-32 के जमाना के जेल। आजादी के सिपाहीमन ल किसिम -किसिम के सजा दे जाय। बड़े-बड़े के हौसला पस्त होय लगय। बरछिहाजी डटे रिहिस । गांधी जी के बिचारधारा के सच्चा सिपाही के रूप म निखरत चलेगे। चारो मुड़ा गांधीवाद के उजियारा फैले लगिस। एकता-समता के बात होय लगिस। जेल ले निकल के फेर बरछिहाजी धर लिस गुरु गांधी के बाना।
बरछिहा जी किहिस के गांधीजी सबला एक करना चाहत हे। ऊंच-नीच, छोटे-बड़े के बात बेकार हे। हमर गुरु बाबा घासीदास ह केहे हे मनखे-मनखे ल मान सगा भाई के समान। उही बात ल गांधीजी केहे हे । सत के मारग म चलना हे। अंगरेज तब भागही सत के जर पताल म रहिथे । झूठ चरदिनिया ए। सच सदा जगमगाथे। लोगन किहिन कइसे होही समाज ह अनुसूचित जात के भाईमन के कुआं अलग। मरदनिया नाउ ऊंकर दाढ़ी-मेछा सांवर नइ बनावय। धोबी ऊंकर कपड़ा नइ धोवय। त भेद तो हे। बरछिहाजी किहिस- आज ले मोर घर के कुआं म सब बर पानी मिलही। मंय खुदे ऊंकर कपड़ा धोहूं अउ ऊंकर सांवर बना के गांधीजी के सच्चा सेऊक चेला कहाहूं।
बरछिहाजी ऊंकर सांवर बना दिस जिंकर सांवर नाऊ नइ बनावत रिहिस। कपड़ा धो दिस। कुआं के पानी सब पर खोल दिस। मंदिर म सबला लेगे के हिम्मत देखइस। चारो मुड़ा सोर उडग़े, देखो-देखो होगे। गांव के बरछिहाजी के कुरमी समाज के मनखेमन एक होके अइसन काम ल ठीक नइ मानिन। सबला एक मानना माने बड़े-छोटे के भेद सनातन हे, तेला बिगाडऩा सामाजिक अपराध आय। सजा दिन के बरछिहाजी के पांचो पवनी नाऊ, धोबी, मेहर, राउत अउ लोहार बंद रइही।
बरछिहाजी नइ डिगिस। गांधीवाद के रद्दा म चलके परान चले जाय फेर परन नइ जाना चाही, ए बात बरछिहाजी किहिन। सबला संसो होगे। डॉ. खूबचंद बघेल बरछिहाजी ले दस बछर छोटे रिहिस। पक्का वोकर संगवारी। गजब मान करय खूबचंद बघेलजी ह। वोहा सोचिस कुरमी समाज के पुराना बिचार वालामन ल मंय समझाहूं, त नइ मानय। ‘नवा बइला के नवा सींग चल रे बइला टींगे-टींग’ अइसना हाना सुनाथें। त मंय अइसे करहूं के एकठन नाटक लिखके चंदखुरी म खेलना हे। जेमा ऊंच-नीच के बात के खिलाफ एकता, समता के कथा चलही। बड़े किताब ऊंच-नीच लिखिन। वोमा लिमतरा गांव के दामाद सिलघट वाला गुरुजी स्यामलाल टिकरिहा अउ लिमतरा वाला तेजराम मढ़रिया पाठ करिन। कथा के दुवारा बताए गिस नाटक म के ऊंच-नीच के बनावटी भेद समाज ल खोखला कर देथे। देस कमजोर हो जथे। हम आपस म नइ लड़बो त विदेसीमन कहां ले राज करहीं। पूरा तइयारी के बाद जब 1933 म नाटक चंदखुरी म खेले गिस त पंडित रविसंकर सुक्ल, दुधाधारी मठ के महंत अउ सौंहत लेखक डॉ. खूबचंद बघेल उहां रिहिस । नाटक ल देख के गांव के मन अइन अउ पंडित रविसंकर शुक्ला अउ महंतजी ल पैलागी करके किहिन- डॉ. खूबचंद बघेल ह हमर आंखी ल उधार दिस।
Published on:
21 Aug 2023 03:57 pm

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