कड़े मुकाबले में फंसी कोलकाता की दोनों सीटें, चर्चा बस एक ही मोदी या दीदी

कड़े मुकाबले में फंसी कोलकाता की दोनों सीटें, चर्चा बस एक ही मोदी या दीदी

Anjalee Singh | Publish: May, 14 2019 02:08:59 PM (IST) Raipur, Raipur, Chhattisgarh, India

कोलकाता (Kolkata)की रेंगती हुई ट्राम हो, चुनिंदा जगहों को जोडऩे वाली मेट्रो हो या फिर खचाखच भरी सिटी बसें। चर्चा नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) और दीदी (ममता बनर्जी) (Mamata Banerjee) से शुरू होती है और इन्हीं दोनों पर खत्म भी हो जाती है। (Lok sabha Election 2019)

राजेश लाहोटी@कोलकाता. कोलकाता (Kolkata)की रेंगती हुई ट्राम हो, चुनिंदा जगहों को जोडऩे वाली मेट्रो हो या फिर खचाखच भरी सिटी बसें। चर्चा नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) और दीदी (ममता बनर्जी) (Mamata Banerjee) से शुरू होती है और इन्हीं दोनों पर खत्म भी हो जाती है। (Lok sabha Election 2019)  राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा, इसे लेकर लोगों में भारी जिज्ञासा है। कोलकाता की दोनोंं महत्वपूर्ण सीट लंबे समय से सीपीआई (एम) के कब्जे में रहने के बाद पिछलेे दो लोकसभा चुनावों से तृणमूल के दबदबे में है, लेकिन इस बार दमदार रैलियों और प्रभावी प्रचार के कारण दीदी के इलाके में दादा नरेन्द्र मोदी बेहद असरदार बने हुए हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में जिस तरह से भाजपा का वोटिंग परसेंटेज बढऩे से दीदी के चेहरे पर शिकन आई थी वही शिकन अब चिंता की लकीरों में बदल गई है।

कोलकाता की दोनों महत्वपूर्ण सीट कोलकाता नार्थ और कोलकाता साउथ में चुनावी लड़ाई केवल टीएमसी और भाजपा के बीच ही है। मैदान में खड़े बाकी सारे दल केवल अपनी प्रजेंट लगाने के लिए हैं। भारी संख्या में रह रहे बिहार, झारखंड के वोटर्स के सपोर्ट पर उत्साहित भाजपा को इस बार परंपरागत बंगाली वोटर्स का भी समर्थन हासिल हो रहा है। माक्र्सवादी पार्टी के कार्यकर्ता ममता को बेदखल करने के लिए भाजपा के साथ खड़े हो गए हैं। तृणमूल के बड़े नेताओं के पार्टी छोड़कर भाजपा में आने से भी परंपरागत बंगाली वोटर्स की सोच बदल रही है। भाजपा के सामने यहां सबसे बड़ी चुनौती अपने वोटर्स को घर से बाहर निकालने की रहेगी, जिसमें उसे माक्र्सवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं की मदद मिल सकती है,वहीं ममता के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपना वोट बैंक संभालने की है।

कोलकाता नार्थ
राजधानी का महत्वपूर्ण हिस्सा होने के कारण कोलकाता नार्थ लोकसभा सीट सत्ताधारी पार्टी के लिए हमेशा महत्वपूर्ण रही है। यहां से टीएमसी ने अपने दिग्गज नेता सुदीप बंधोपाध्याय को फिर मैदान में उतारा है। सुदीप 2009 से इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वे तीसरी बाद मैदान में उतारे गए हैं, वहीं भाजपा ने भी अपने पुराने उम्मीद्वार पर ही दांव लगाया है। राहुल सिन्हा के जरिए भाजपा ने पिछले चुनाव में टीएमसी को जबरदस्त चुनौती दी थी। करीब सवा लाख वोट से हारे राहुल सिन्हा ने भाजपा के खाते में 20 फीसदी से ज्यादा वोटों का इजाफा करके टीएमसी को हैरान कर दिया था। टैक्सी ड्राइवर शुभोजित कहते हैं यदि राहुल सिन्हा आखरी समय में पस्त नहीं पड़ते तो शायद परिणाम कुछ और होता। खैर, शुभोजित की इस राय से दूसरे लोग इतने सहमत नजर नहीं आते हैं। उनका मानना है कि राहुल सिन्हा कितना ही जोर लगा लेते हार का अंतर ही कम कर पाते।

हालांकि पिछले प्रदर्शन को देखते हुए भाजपा के साथ ही सिन्हा भी आत्मविश्वास से भरे हुए हैं। बात अगर इस सीट के दोनों प्रमुख उम्मीद्वारों की हो तो राहुल सिन्हा की तुलना में सुदीप बंधोपाध्याय काफी भारी नजर आते हैं। व्यवहार, प्रभाव और सरल होने के कारण लोगों से उनका जुड़ाव काफी हद तक है, लेकिन विकास की बात पर भाजपा उम्मीद्वार से पिछड़ते नजर आते हैं। जोरासांको में सुदीप के समर्थन में मीटिंग कर रहे तृणमूल नेता संजय बख्शी कहते हैं-लोग हमारे साथ हैं। ये किसी लालच में नहीं आएंगे। वैसे बख्शी के इस संबोधन में कहीं न कहीं घबराहट नजर आती है। वहीं, चौरंगी, बड़ा बाजार, मोहम्मद अली मार्ग, एमजी रोड इलाके में लोगों के छोटे-छोटे समूह में भी लोगों की बातचीत में विकास का मुद्दा नजर आता है। लोग कहते भी हैं कि हमारा शहर बहुत पीछे रह गया है। साथ ही अफसोस भी जताते हैं। वैसे यहां से टीएमसी, भाजपा के अलावा कांग्रेस और माक्र्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी भी उम्मीद्वारी जता रही है। कांग्रेस ने जहां सैयद शाहिद इमाम को खड़ा किया है, वहीं कम्यूनिस्ट पार्टी ने कनिनिका बोस को अपना उम्मीद्वार बनाया है।

कोलकाता साउथ
टीएमसी के लिए यह सीट काफी प्रतिष्ठापूर्ण है। इसे टीएमसी चीफ ममता बनर्जी की ही सीट कहा जाता है। करीब 19 साल यहां से सांसद रहने के बाद ममता बनर्जी ने 2011 में यह सीट छोड़ी थी और अपने खास सिपहसालार सुब्रत बख्शी को सौंपी थी। सुब्रत यहां से 2011 फिर 2014 में सांसद चुने गए। लेकिन, इस बार ममता ने अपनी इस सबसे सुरक्षित सीट से अपने सिपहसालार की ही टिकट काट दी। सुब्रत की जगह ममता ने 2014 के लोकसभा चुनाव में चौथे नंबर पर रही कांग्रेस उम्मीद्वार माला राय को मैदान में उतारा है। माला फिलहाल कोलकाता नगर निगम की चेयरपर्सन है। भाजपा ने भी अपना प्रत्याशी बदला है। तथागत राय जिन्होंने पिछले चुनाव में जोरदार प्रदर्शन किया था, उन्हें पिछले साल ही पार्टी हाईकमान ने मेघालय का राज्यपाल बना दिया है। अब उनकी जगह चंद्र कुमार बोस को मैदान में उतारा है, जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस के भतीजे हैं और शरत चंद्र बोस के बड़े लड़के हैं। एक तरह से बीजेपी ने यहां बंगाली वोटर्स को देखते हुए इमोशनल कार्ड खेला है।

हालांकि चंद्र कुमार बोस राजनीति के नए खिलाड़ी है। लेकिन, उन्हें तथागत राय के प्रदर्शन और भाजपा के प्रभावी प्रचार के साथ ही नेताजी का भतीजा होने का लाभ मिल सकता है। वहीं माला राय पिछले 24 साल से कोलकाता नगर निगम से जुड़ी हुई है। लोगों के साथ जुड़ाव और टीएमसी चीफ ममता की सुरक्षित सीट उन्हें चंद्र कुमार बोस की तुलना में एक कदम आगे खड़ा करती है। शांतनू चक्रवर्ती कहते हैं-फैसला कुछ भी हो, इस सीट पर रोचक मुकाबला देखने को मिलेगा। वहीं 20 साल से कोलकाता में रहकर काम कर रहे झारखंड के शिवकुमार झा कहते हैं भैया प्रत्याशी कोई भी हो, इस बार बीजेपी यहां धमाका कर सकती है। इन्हीं के बिरादर मधुबन भी इसी बात का समर्थन करते नजर आते हैं। इसी लोकसभा से तीसरी प्रमुख प्रत्याशी माक्र्सवादी पार्टी की नंदिनी मुखर्जी है जो पिछले चुनाव में तीसरे नंबर पर थी। नंदिनी की भूमिका को भी इस चुनाव में नकारा नहीं जा सकता। बंगाली वोटर्स में उनका खासा दबदबा है। इस सीट से कौन जीतेगा, यह तय करने में इनकी भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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