scriptvanvasi jingi ke bkhan lalaji ke kvita m milthe | साहित्य रिसि लाला जगदलपुरी ल बस्तर के लोक संस्करीति के बिकट जानकारी रिहिस | Patrika News

साहित्य रिसि लाला जगदलपुरी ल बस्तर के लोक संस्करीति के बिकट जानकारी रिहिस

locationरायपुरPublished: Dec 11, 2023 03:52:39 pm

Submitted by:

Gulal Verma

लालाजी ल बस्तर के लोक सांस्करीतिक के बिकट जानकारी रिहिस, तेकरे सेती आजो मनखे उनला बस्तर के चलत-फिरत गियान-कोस घलो कहिथें। छत्तीसगढ़ी अउ हल्बी आदि के अनगिनत कथा संग्रह, कविता, गजल, गीत संग्रह, छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह, हल्बी-भतरी लोकोतियां के वरगीकरन आदि पढ़े बर मिलथे।

साहित्य रिसि लाला जगदलपुरी ल बस्तर के लोक संस्करीति के बिकट जानकारी रिहिस
छत्तीसगढ़ महतारी के कोरा म लाला जगदलपुरी 17 दिसम्बर 1920 म जगदलपुर (बस्तर) म जनम लिन। वोकर बाबू के नाव रामलाल अउ दाई के नाव जीरा बाई रिहिस। छोटे भाई केसव लाल सिरीवास्तव, सुदरसन लाल सिरीवास्तव, छोटे बहिनी रुक्खमनि बाई सिरीवास्तव आय। जब बाबू रामलाल सिरीवास ह ए दुनिया ले गिस तब लालाजी ह नानकुन लइका रहिन। अब इंकर घर परिवार के जुमेदारी महतारी जीरा बाई के मुड़ी म आ गिस। लालाजी के लाइकापन के जानकारी मिलथे कि जगदलपुर म बालाजी के मंदिर के तीर बालातरई तरिया म एक पइत लालाजी डूबत रहिस फेर हम छत्तीसगढ़वासीमन बर खुसी के बात आय कि पानी पी के बाद घलो लालाजी ह बचगे।

लालाजी के पीढ़ी नाव लालाराम सिरीवास्तव रिहिस। अपन नाव ले सिरीवास्तव ल हटा के जगलपुरी ल मिलाईच अउ देस-दुनिया म लाला जगदलपुरी के नाव ले परसिद्ध होइस। रियासत काल म लालाजी महारानी अस्पताल जगदलपुर म कम्पाउंडर के बुता करत रिहिस। 1950 के पहिली ये नउकरी ल छोड़ दिस अउ पूरा साहित्य जिनगी म लगगे। लालाजी साहित्य जिनगी म अतका लगे रहिस कि अपन बिहाव घलो नइ कराइस अउ अपन भाईमन के संग बडक़ा परिवार म अपन जिनगी ल बिताइस। लाला जी 1936 ले साहित्त लिखे के सुरू करिन। 1939 ले देस के परतिस्ठित पतरिकामन म उंकर कविता, बस्तर ऊपर मउलिक अउ परमानिक लेखमन परकासित होय हवय।

एक दिन हरिहर वैस्नवनजी ह लालाजी ल पूछिस के कि आपमन बस्तर के ऊपर अतेक लिखे हवव जेकर तुलना नइ करे जा सकय। आपके पूरा रचना संसार म बस्तर दिखथे। ऐकर का कारन हवय। त लालाजी ह कहिन- कोनो रचनाकार तभे सफल होथे जब वोहा अपन धरातल ले जुड़े होथे। कोनो रचनाकार आन गांव-सहर जाथे तभो ले अपन धरातल ल संग म ले जाथे मेहा जिहां जाथव उहां बस्तर मोर संग रिहिथे। आज घलो मेहा अपन ल बस्तर म पाथंव। ऐकर सेती कभु बस्तर ले बाहिर जाय के परयास घलो नइ करेव।

बस्तर के परकरीति अउ वोकर संगी बनवासी कइसे अपन छोटकुन जिनगी म हांसत - गावत, नाचत खुस रहिथे उंकर बखान लालाजी के कविता म बड़ सुग्घर ढंग ले मिलथे.
हरे-हरे पत्तों के भरे-भरे दानें।
तूंबी की पेज धार,
सरगी की छाया।
कलश, दीप, मंडप,
शहनाई की आलम।
हरदी, रोचन, कटार,
सरगी की छाया।

जिंदगी के लिए जुझती गजलें, गजल संग्रह म कविता के जिनगी सकती अउ वोकर परभाव के बिसय म उंकर बिकट आस्था ह चमकत मिलथे।
कविता आग जब उगलती है।
काजर की कोठी जलती है।
टूटते हैं प्रकाश के बन्धन,
परम्परा दिशा बदलती है।
बांध कर सूर्य किरन गठरी में
एक यात्रा अनन्त चलती है।’

लालाजी ल बस्तर के लोक सांस्करीतिक के बिकट जानकारी रिहिस, तेकरे सेती आजो मनखे उनला बस्तर के चलत -फिरत गियान-कोस घलो कहिथें। छत्तीसगढ़ी अउ हल्बी आदि के अनगिनत कथा संग्रह, कबिता संग्रह, गजल संग्रह, गीत संग्रह, मुक्तक संग्रह, छत्तीसगढ़ी काव्य संग्रह, इतिहास संस्करीति, हल्बी-भतरी लोकोतियां के वरगीकरन आदि पढ़े बर मिलथे।

परमुख किरितियां : : कविता/गजल संग्रह : मिमियाती जिंदगी दहाड़ते परिवेश (1983), आन्दोलन प्रकाशन, जगदलपुर, पड़ाव 1992, हमसफऱ 1986, आंचलिक कविताएं 2005, जिंदगी के लिये जूझती गजलें 2005, गीत धन्वा 2011, इतिहास-संस्कृति : बस्तर, इतिहास एवं संस्कृति 1994, बस्तर लोक : कला-संस्कृति प्रसंग 2003, बस्तर की लोकोक्तियां 2008। हल्बी लोक कथाएं 1972, वनकुमार और अन्य लोक कथाएं 1990, बस्तर की मौखिक कथाएं 1991।

14 अगस्त 2013 म लालाजी हमर बीच नइ रिहिन। फेर, उंकर किरितिह आज घलो गियान के उजियारी बगरावय हावय। जिला ग्रंथालय जगदलपुर, बस्तर के नाव ल लाला जगदलपुरी जिला ग्रंथालय जगदलपुर रखे हवय।

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