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राजस्थान के इस जंगल में गूंज सकती है बाघों की दहाड़, बस... इतना सा कर दे भजनलाल सरकार

locationराजसमंदPublished: Feb 04, 2024 09:00:05 pm

Submitted by:

jitendra paliwal

Kumbhalgarh Tiger Reserve राज्य के पाले में गेंद : कुम्भलगढ़ में बाघ आए तो लौटेगा मेवाड़ का एक और गौरव, एनटीसीए की सैद्धांतिक सहमति को भी छह माह बीत चुके, राज्य सरकार की विशेषज्ञ समिति के दौरे और नोटिफिकेशन का इंतजार

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मेवाड़ के जंगलों में बाघ खत्म हुए अर्सा गुजर गया, मगर पुनर्वास की प्रक्रिया का अंतिम चरण भी लम्बा खिंच रहा है। कुम्भलगढ़ टाइगर रिजर्व को राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) से सैद्धांतिक सहमति मिलने के छह माह बाद भी राज्य सरकार गेंद अपने पाले में रखे हुए है। राज्य विशेषज्ञ समिति का दौरा और फिर अधिसूचना जारी करने की प्रक्रिया में देरी हो रही है।
राज्य सरकार को वन विभाग के उच्चाधिकारियों और विशेषज्ञों की एक कमेटी का गठन करना है, जो कुम्भलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य का दौरा करेगी। कमेटी में सीसीएफ, डीएफओ सहित चार से पांच वन्यजीव विशेषज्ञ शामिल होंगे। इनकी रिपोर्ट के बाद राज्य सरकार टाइगर रिजर्व का नोटिफिकेशन जारी करेगी, लेकिन यह काम करीब छह महीने से लम्बित है।
22 अगस्त, 2023 को एनटीसीए ने कुम्भलगढ़ बाघ संरक्षण परियोजना के लिए सैद्धांतिक मंजूरी दे दी थी। इसी अवधि में एनटीसीए की सिफारिश के बाद धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व को विशेषज्ञ समिति के परामर्श के बाद राज्य सरकार ने अधिसूचित कर दिया था, लेकिन कुम्भलगढ़ के मामले में उतनी तेजी नहीं दिखाई जा रही है।
पर्यटन को मिलेगा बूस्ट
वन्यजीव विशेषज्ञ बताते हैं कि कुंभलगढ़ में आवास की बनावट, पानी की उपलब्धता, बाघिनों कबे लिए पर्याप्त प्रसवस्थल और लोगों का बाघों के साथ पुराना रिश्ता ऐसे कारक हैं, जो यहां बाघ लाने के लिए सकारात्मक माहौल बनाते हैं। यहां पर्यटकों की कोई कमी नहीं रहेगी। होटल, गाइड, वाहन संचालक, संरक्षणवादी स्वयंसेवी संस्थाएं, छोटे दुकानदार, होमस्टे से जुड़े स्थानीय बाशिन्दे और तमाम लोग इससे लाभान्वित होंगे। कुंभलगढ़ में बाघ लाने से यह मेवाड़ के गौरव में भी बढ़ोतरी करेगा। अमूमन यहां पर्यटक दो दिन ठहरते हैं, जो तीन से चार-दिन तक का हो जाएगा। शैक्षणिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा।
211 हैक्टैयेर में शाकाहारी वन्यप्राणियों का पुनर्वास केन्द्र
प्री-बेस (पूर्वाधार) बाधा को दूर करने के लिए सादड़ी के नजदीक मोडिया वनखण्ड में करीब 211 हैक्टेयर का शाकाहारी वन्यप्राणियों का रिहेबिलिटेशन और रिलोकेशन केन्द्र बनाया जा चुका है। उसमें प्री-बेस बढ़ाने का कार्य प्रगतिरत है। रणकपुर, ठंडीबेरी से कुछ आगे छोटी औदी के पास एवं जवाई में पुराने प्राणी रिहेबिलिटेशन व रिलोकेशन केंद्र बने हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ सुधार कर इनको जंगली सुअर, खरगोश, सांभर, चीतल, चिंकारा आदि का प्रजनन केंद्र बनाकर प्री-बेस बढ़ाने का कार्य किया जा सकता है। वन विभाग के पास बाघ परिचय का करीब 15 वर्ष का तजुर्बा भी है।
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बढ़ती जनसंख्या के जैविक दबाव ने 1960 से 1970 के बीच बाघों को मेवाड़ से लगभग समाप्त कर दिया था। यह जीवित विरासत हमसे छिन गई। हालांकि बाघ समाप्त हो गए, लेकिन अच्छा वन क्षेत्र बचा रह गया। उनमें टॉडगढ़-रावली, भैंसरोडग़ढ़, बस्सी, जयसमंद, सीतामाता, सज्जनगढ़, फुलवारी की नाल, कुंभलगढ़ अभयारण्य क्षेत्र बने। यदि बाघ की वापसी होती है तो संपूर्ण मूल परिस्थितिकी तंत्र की वापसी होगी एवं यह एक बड़ा कार्य होगा। राज्य सरकार को इसमें तेजी दिखानी होगी।
राहुल भटनागर, सदस्य, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण
राज्य सरकार के निर्देशों के मुताबिक काम करेंगे। हमारी तैयारी पूरी है। प्री-बेस पर भी अच्छा काम हुआ है। विशेषज्ञ कमेटी का गठन बाकी है। रामगढ़ टाइगर रिजर्व की पूरी प्रक्रिया में मैं शामिल रहा हूं और अब कुम्भलगढ़ को लेकर भी हमारी टीम में उत्साह है।
आलोक कुमार गुप्ता, उपवन संरक्षक (वन्यजीव), राजसमंद

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