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Navratri 2021 शिवजी के तेज से बना मुख, विष्णुजी ने दीं भुजाएं, जानें कैसे बने दुर्गाजी के केश और नेत्र

दुर्गा सप्तशती में दिए गए विवरण के अनुसार दुर्गाजी का मुख शिवजी के तेज से बना।
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deepak deewan

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Updated: 6 Oct 2021, 11:20 AM IST

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मां दुर्गा को पर्वतराज हिमालय ने भेंटस्वरूप शेर प्रदान किया

7 अक्टूबर यानि गुरुवार से शारदीय नवरात्रि प्रारंभ हो रही है। शारदीय नवरात्रि के दौरान अलग—अलग दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि में मां दुर्गा की साधना त्वरित फलदायी मानी जाती है। मां दुर्गा महिषासुर नामक दैत्य का वध करने के लिए प्रकट हुई थीं। मान्यता है कि उनमें सभी देवताओं की शक्ति समाहित थी।

ज्योतिषाचार्य पंडित सोमेश परसाई बताते हैं कि इस संबंध में दुर्गा सप्तशती में विस्तार से वर्णन किया गया है। इसके अनुसार महिषासुर को मारने के लिए मां दुर्गा की उत्पत्ति सभी देवताओं के तेज से हुई थी। दुर्गा माता ने देवताओं की इस सम्मिलित शक्ति के बल पर महिषासुर का वध कर संसार को उसके आतंक से मुक्त कर दिया था।

IMAGE CREDIT: patrika

दुर्गा सप्तशती में दिए गए विवरण के अनुसार दुर्गाजी का मुख शिवजी के तेज से बना। इसके बाद विष्णुजी ने अपने तेज से उन्हें भुजाएं प्रदान कीं. सूर्य के तेज से दुर्गाजी के पैरों की उंगलियां और चंद्रमा के तेज से वक्षस्थल बना. देवी दुर्गा की नाक कुबेर के तेज से बनी, दक्ष प्रजापति के तेज से दांत बने, संध्या के तेज से भृकुटि बनी और वायु के तेज से कान बने। दुर्गाजी के केश यमराज के तेज से बने और उनके नेत्रों ने अग्नि के तेज से आकार लिया।

महिषासुर का वध करने के लिए दुर्गा रूप में अवतरित होने के बाद देवी को सभी देवताओं ने शक्तियां भी दीं। ज्योतिषाचार्य पंडित नरेंद्र नागर बताते हैं कि दुर्गा सप्तशती के अनुसार भगवान विष्णु ने मां दुर्गा को सुदर्शन चक्र दिया जबकि भगवान शिव ने उन्हें त्रिशूल भेंट किया। इसी प्रकार मां दुर्गा को देवराज इंद्र ने वज्र प्रदान किया तो यमराज ने कालदंड, वरुणदेव ने शंख, पवनदेव ने धनुष-बाण दिए।

अनेक देवताओं ने दुर्गाजी को सुसज्जित भी किया। इसके लिए समुद्रदेव ने उन्हें आभूषण भेंट किए। प्रजापति दक्ष ने देवी दुर्गा को स्फटिक की माला दी तो सरोवर ने अक्षय पुष्प माला प्रदान की। कुबेरदेव ने दुर्गाजी को शहद का दिव्य पात्र भेंट किया। मां दुर्गा जिस शेर की सवारी करते हैं वह उन्हें पर्वतराज हिमालय ने भेंटस्वरूप प्रदान किया था।