दोनों दल में कांटे की टक्कर

दोनों दल में कांटे की टक्कर

Manoj Vishwkarma | Publish: Sep, 06 2018 11:05:03 PM (IST) Sehore, Madhya Pradesh, India

दोनों पार्टी के नेता लगा रहे अपना जोर

सीहोर. सीहोर विधानसभा में दोनों ही पार्टी के वजनदार नेता शक्ति प्रदर्शन के साथ अपनी-अपनी दावेदारी जता रहे हैं। इसके चलते यह बात निश्चित है कि इस बार के चुनाव बड़े रोमांचक होने हैं।

 

1957 में बनी सीहोर विधानसभा के प्रथम विधायक कांग्रेस के उमराव सिंह बने थे। सन 72 में कांग्रेस से अजीज कुरैशी जीते। पूर्व मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा भी 1980 के चुनाव में यहां जीते थे। सीहोर सीट बनने के बाद चार बार कांग्रेस ने जीत हासिल की है तो भारतीय जनसंघ एवं जनता पार्टी के एक-एक विधायक भी यहां प्रतिनिधित्व कर चुके हैं, जबकि दो बार निर्दलीय और सर्वाधिक पांच बार भाजपा ने जीत का परचम लहराया है।

इस चुनाव में भाजपा से वर्तमान विधायक सुदेश राय, जिला सहकारी बैंक अध्यक्ष उषा सक्सेना, पूर्व जिपं अध्यक्ष जसपाल अरोरा, युवा गौरव सन्नी महाजन मैदान में हैं। इसी तरह कांग्रेस से वरिष्ठ नेता सुरेन्द्र सिंह ठाकुर, कांग्रेस उपाध्यक्ष दामोदर राय, कमलेश कटारे, कांग्रेस प्रदेश सचिव राहुल यादव, पूर्व नपाध्यक्ष और सेवादल के राकेश राय, राजाराम कसोटिया, अल्पसंख्यक वर्ग के अनीस खान, युवा नेता राजू राजपूत, हरपाल सिंह ठाकुर, पूर्व आइपीएस एके सिंह की पत्नी व सीहोर प्रभारी रही आभा सिंह दौड़ में हैं। इसके साथ ही आप पार्टी ने केपीएस बघेल और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने माखन सोलंकी को उम्मीदवार घोषित कर दिया है।

मुद्दे जो चर्चा मेंं हैं

- विधानसभा क्षेत्र में उद्योग धंधों की तरफ ध्यान नहीं देने पर बेरोजगारी की समस्या का बढऩा।

- सीवेज के कारण शहर की बेदर्दी से खुदाई, सड़क निर्माण के बाद पार्किंग को लेकर कोई व्यवस्था नहीं होना।

- गल्ला मंडी के पास निर्माणाधीन ओवर ब्रिज के पूरा होने में समय लगना चर्चा में है।

बदलते समीकरण

-सीहोर विधानसभा क्षेत्र भाजपा का गढ़ है, लेकिन स्थानीय मुद्दे समीकरण बदलते रहे हैं।

-विधानसभा के मतदाता प्रत्याशी को देखकर वोट करने पर अधिक विश्वास करते हैं। इसके चलते यहां दो बार निर्दलीय प्रत्याशी भी जीते।

-भाजपा भले ही यहां मजबूत स्थिति मान रही है। टिकट वितरण में यहां विद्रोह भारी पड़ सकता है।

बड़ी पार्टियों की चुनौतियां

दोनों की पार्टी के नेताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती भीतरधात की सामने आ सकती है। जिसे टिकट नहीं मिला वह अपने लोगों के साथ विरोध में काम करेगा। इसके साथ ही चुनाव में निर्दलीय उतरने पर परिणाम किसी के भी पक्ष में जा सकता है

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