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पंचपर्वा विश्व में प्राणों के समावेश और देव समन्वय की सटीक परिभाषा, ‘प्राणों द्वारा देवों का समन्वय’ पर प्रतिक्रियाएं

locationजयपुरPublished: Jan 20, 2024 04:37:59 pm

Submitted by:

santosh Trivedi

आध्यात्मिक यज्ञ और इसमें जीवात्मा को पार्थिव आकर्षण से विमुक्त कर दिव्यशक्ति से समन्वित कर देने को यज्ञ के एकमात्र फल के रूप में निरूपित करते पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी की आलेखमाला ‘शरीर ही ब्रह्मांड’ के आलेख ‘प्राणों द्वारा देवों का समन्वय’ को प्रबुद्ध पाठकों ने सराहा है।

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आध्यात्मिक यज्ञ और इसमें जीवात्मा को पार्थिव आकर्षण से विमुक्त कर दिव्यशक्ति से समन्वित कर देने को यज्ञ के एकमात्र फल के रूप में निरूपित करते पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी की आलेखमाला ‘शरीर ही ब्रह्मांड’ के आलेख ‘प्राणों द्वारा देवों का समन्वय’ को प्रबुद्ध पाठकों ने सराहा है। उनका कहना है कि लेख पंचपर्वा विश्व में प्राणों के समावेश और प्राणों के जरिए देवता के समन्वय को सटीक परिभाषित करता है। पाठकों की प्रतिक्रियाएं विस्तार से-

‘प्राणों द्वारा देवों का समन्वय’ लेख में गुलाब कोठारी ने जीव के प्राण देवता की गति के ग्रहों का महत्त्व बताया है। यह बात सत्य है कि सूर्य का तेज न मिले तो जीव की गति रुक जाएगी। सूर्य से ही मनुष्य को ऊर्जा प्राप्त होती है।
शिवप्रताप भदौरिया, प्रांताध्यक्ष पंचायत समन्वयक, भिण्ड

गुलाब कोठारी ने आध्यात्मिक यज्ञ व माता पिता के दाम्पत्य भाव की बहुत ही सारगर्भित व्याख्या से लोगों को समझाया है। आलेख में शरीर में नाड़ी व ग्रहों के प्रभाव और पृथ्वी से संबंध व प्रभाव का चित्रण किया गया है।
विकास दशोत्तर, ज्योतिषाचार्य, रतलाम

गुलाब कोठारी ने लेख में आध्यात्मिक यज्ञ से लेकर सम्वत्तर मंडल तक की जानकारी दी है। लेख में मौलिक तत्त्व सहित अन्य बिंदुओं पर भी उपयोगी जानकारी दी गई है।
डॉ. अश्विनी तिवारी, जिलाध्यक्ष जिला योग समिति, सिंगरौली

लेख में मनुष्य जीवन का सार बताया गया है। मनुष्य शरीर नश्वर है। जिस तरह शनै: शनै: शरीर की वृद्धि होती है, वैसे ही धीरे-धीरे इसका विनाश भी होता है, जो प्रकृति का नियम है। देवत्व से मिला यह शरीर फिर से देवत्व में मिल जाता है। कोठारी ने बताया है कि घट-नष्ट होने पर मिट्टी में, मिट्टी पानी में, पानी तेज में, तेज वायु में, वायु प्राण में और प्राण मन में लीन हो जाता है। इस प्रकार जिस क्रम से सृष्टि सर्जन होता है, उसी क्रम में विसर्जन भी हो जाता है। हमारी आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाए ऐसा कर्म करना चाहिए।
निशा चंद्रौल, गृहिणी, मंडला

ज्योतिष के अनुसार सूर्य ग्रह आयु, अस्थि, सिर, हृदय, प्राण, शक्ति, रक्त तथा पित्त को प्रभावित करते हैं। इनके बली होने पर शरीर स्वस्थ रहता है तथा निर्बल होने पर हृदय, नेत्र, पित्त, चर्म आदि प्रभावित होते हैं। इसके साथ ही उष्णवात, मूर्छा, शिरोरोग, अस्थि रोग की आशंका होती है।
पिंकी दिकचित, ज्योतिषाचार्य, बालाघाट

पंचपर्वा विश्व में दोनों प्राणों का समावेश और प्राणों के जरिए देवों के समन्वय को सटीक परिभाषित किया गया है। लेख में स्पष्ट है कि जिस तरह से उत्सर्जित प्राण की क्षतिपूर्ति के लिए अन्न का भोग आवश्यक है, उसी प्रकार प्राण देवता सदा पार्थिव देवताओं का आलंभन करते हैं। इसका मतलब साफ है कि विश्व का प्रत्येक प्राणी कुछ लेता और कुछ देता है। आध्यात्मिक यज्ञ में प्राणों द्वारा देवों का समन्वय भी कुछ ऐसा ही है। श्रीकृष्ण भी इसी तथ्य का प्रतिपादन कर रहे है कि यज्ञ द्वारा देवताओं को उन्नत करो और देवता लोगों को उन्नत करें।
केपीएस परिहार, छतरपुर

जीव के प्राणों में उसकी देह विद्यमान होती है। पूरे समय इंसान के प्राण उसके साथ ही रहते हैं। इस देह के बलबूते ही वह अपना पूरा जीवन निकालता है। आध्यात्मिक यज्ञ माता-पिता के दाम्पत्य भाव से होता है। इंसान का मन और प्राण दोनों ही ईश्वर प्रदत्त है, फिर भी उसका मन यहां-वहां भटकता रहता है।
गौरव उपाध्याय, ज्योतिषाचार्य, ग्वालियर

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