इस समाज की विशिष्ट पहचान है सिडोली प्रथा, मृतक का शव दफन कर करते हैं ये काम

Sidoli Pratha: अनोखी परंपराओं, मान्यताओं व रहन-सहन के विशिष्ट तरीकों के लिए जाना जाता हैं जनजातीय समुदाय, जिले में बसे आदिवासियों की विशिष्ट परंपराओं की अलग पहचान

By: rampravesh vishwakarma

Published: 24 Sep 2021, 10:19 PM IST

सूरजपुर. Sidoli Pratha: सूरजपुर जिले की संस्कृति सांस्कृतिक विविधता का एक उत्तम उदाहरण है। जहां एक ओर बड़ी संख्या में यहां अंचल के स्थानीय आदिवासियों के समूह हैं, वहीं कई दशकों से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड,राजस्थान, पंजाब तथा बंगाल जैसे राज्यों के लोग भी यहां बड़ी संख्या में हैं।

यहां के आदिवासियों की विशिष्ट परंपराएं और रीति-रिवाज (Custom) यहां खिलते हैं, वहीं अन्य राज्यों से यहां आकर बसे लोगों के रीति रिवाज भी यहां की संस्कृति को विविधता से परिपूर्ण बनाते हैं।


सूरजपुर जिले की सांस्कृतिक विशेषताओं का मुख्य प्रतिनिधित्व जनजातीय समुदाय करता है, जो अपने रहन सहन के विशिष्ट तौर तरीकों के लिए जाना जाता है। यहां निवासरत कोरकू जनजाति के लोग भूमि खोदने का कार्य करने के लिए जाने जाते हैं। साथ ही काष्ठ पर की गई अपनी विशिष्ट कला में भी ये अद्वितीय हैं।

नवरात्रि के महीने में ये खम्भस्वांग जैसा मनोरंजक लोकनाट्य प्रस्तुत करते हैं और विभिन्न अवसरों पर ये अपना थापटी और ढांढल जैसे मनोरम लोकनृत्य भी करते हैं। मृतक संस्कार में इनके द्वारा की जाने वाली सिडोली प्रथा भी अपने आप में विशिष्ट है, जिसमें ये मृत व्यक्ति को दफनाकर उसकी स्मृति में एक स्तंभ लगा देते हैं।

यहां निवासरत कोल जनजाति कोयला खोदने का पारंपरिक कार्य करने के साथ साथ अपने कोलदहका नाम नृत्य के लिए प्रसिद्ध हैं। कंवर आदिवासी समूह जो स्वयं को कौरवों का वंशज मानते हैं ये सैन्य कार्य करने के लिए लालायित रहते हैं। इनके द्वारा किया जाने वाला बार नृत्य इनके द्वारा ही किया जाने वाला विशिष्ट नृत्य है।

Dance by Tribal society
IMAGE CREDIT: sidoli Pratha

वहीं इनकी धरजन नामक विवाह पद्धति भी अनूठी है जिसमें विवाह हेतु जमाई को अपने भावी ससुर के घर रहकर अपनी सेवा से उसे खुश करना पड़ता है।


वृक्षों पर मचान बनाकर रहते हैं कोरवा
कोरवा जनजाति के लोग भी अपना विशिष्ट महत्व रखते हैं। ये दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में वृक्षों पर मचान बनाकर रहने के लिए जाने जाते हैं। साथ ही साथ कृषि कार्य से संबंधित कोरा और धेरसा जैसे पर्व भी इनकी सांस्कृतिक विशिष्टता को दर्शाते हैं। इनके द्वारा संपादित दमनक नृत्य बड़ा भयोत्पादक नृत्य माना जाता है। चावल से बनाई जाने वाली हडिय़ा शराब भी इनका विशिष्ट पेय पदार्थ है।


खैरवार जनजाति की ये है पहचान
खैरवार जनजाति भी निवासरत है जो कत्था बनाने के लिए जानी जाती है। यहां के आदिवासियों के खुडिय़ारानी,सगराखण्ड, भटुवा देव,सिंगरी देव जैसे देवी देवता भी अपने आप मे विशिष्ट हैं। फसलों से संबंधित करमा नृत्य त्योहार यहां सभी आदिवासी और अन्य पिछड़े वर्गों में बड़े स्तर पर प्रचलित है।


सुआ व शैला नृत्य मोह लेता है मन
सुआ गीत नृत्य भी यहां की महिलाएं बड़े मनोरंजक ढंग से संपन्न करती हैं। शैला या डंडा नृत्य भी व्यापक रूप से चलन में है। यहां के आदिवासी अब अन्य समुदायों से घुल मिलकर होली,दीवाली,तीज और छठ जैसे त्योहारों को भी चाव से मनाने लगे हैं। गणेश उत्सव और दुर्गापूजा के साथ साथ काली पूजा भी धूमधाम से बनाई जाती है।


मोहर्रम और ईद जैसे त्योहारों में भी यहां इतनी ही धूम रहती है। आदिम और जनजातीय समूहों के त्योहार और रीति रिवाज तथा हिंदुओं, मुस्लिमों, ईसाइयों और सिखों के तीज त्योहार मिलकर सूरजपुर क्षेत्र को सांस्कृतिक सम्पन्नता और विविधता से लबरेज कर देते हैं।

rampravesh vishwakarma Desk
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