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हमें कैसी हरियाली चाहिए, दिखावे की या सेहत वाली?

locationसूरतPublished: Dec 09, 2023 09:59:02 pm

Submitted by:

pradeep joshi

हमें किस तरह की हरियाली चाहिए? गुड या बेड ग्रीनरी ? क्योंकि ग्रीनरी दिखाने के कई तरीके हैं, लेकिन हमें ऐसी ग्रीनरी की ज़रूरत नहीं है, जो जैव विविधता में योगदान नहीं देती या ऑक्सीजन नहीं देती, उल्टा एलर्जी का कारण बनती है।

विरल देसाई, (लेखक पर्यावरणविद् और 'सत्याग्रह अगेंस्ट पोल्युशन एन्ड कलाइमेट चेंज' आंदोलन के प्रणेता हैं)
हमें कैसी हरियाली चाहिए, दिखावे की या सेहत वाली?
कुछ साल पहले की बात है कोनोकार्पस पेड़ के खिलाफ कई पर्यावरणविद् अभियान चला रहे थे, लेकिन लोगों को समझ नहीं आया। नर्सरी वाले भी लोगों को प्रोत्साहित कर रहे थे कि कोनोकार्पस मज़ेदार पौधा है, जो बहुत तेज़ी से बढ़ता है, उससे बहुत ग्रीनरी दिखती है। रखरखाव की आवश्यकता भी नहीं होती है। यह सच भी है कि नेटिव स्पिसिस के पेड़ों की तुलना में कोनोकार्पस को रखरखाव की आवश्यकता नहीं होती। आम, अम्बाली, पीपल, बरगद, जम्बू या सरगवा आदि काे भी साढ़े तीन साल तक देखभाल करनी होगी। तब वे भूमि में स्थापित होंगे और फल लगेंगे। जबकि कोनोकार्पस पर बोने के छह माह के भीतर ही ग्रीनरी आ जाती है।
सवाल यह उठता है कि हमें किस तरह की हरियाली चाहिए? गुड या बेड ग्रीनरी ? क्योंकि ग्रीनरी दिखाने के कई तरीके हैं, लेकिन हमें ऐसी ग्रीनरी की ज़रूरत नहीं है, जो जैव विविधता में योगदान नहीं देती या ऑक्सीजन नहीं देती, उल्टा एलर्जी का कारण बनती है। हमें ऐसी ग्रीनरी चाहिए जो हवा से कार्बन सोख कर ज्यादा ऑक्सीजन छोड़ सके। हमें उस ग्रीनरी की ज़रूरत है, जिसमें पक्षी, जानवर, सरीसृप या कीड़े आराम से रह सकें और जैव विविधता समृद्ध हो।
घरों व बंगलों में सुदरता दिखाने के लिए जल्दी फैलने वाली ग्रीनरी का ट्रेंड चल पड़ा है। कोनोकार्पस या नॉननेटिव स्पिसिस की अधिकांश प्रजातियां बेड ग्रीनरी देती है। वे पेड़-पौधे केवल शो-पीस हैं, जैसे नकली फूल या प्लास्टिक के पौधे। सूरत व कई शहरों में कोनोकार्पस के मामले में ऐसा हुआ जैसे इंस्टाग्राम पर कोई रील ट्रेंड करती है, वैसे ही लोग कोनोकार्पस के दीवाने हो गए और एक बड़ी आबादी ने खेतों, फार्म हाउसों, सोसायटी या सड़कों के किनारे चारदीवारी के रूप में कोनोकार्पस लगा दिए हैं।
कोनोकार्पस पर अभी तक व्यवस्थित शोध नहीं हुआ, लेकिन विशेषज्ञों के निष्कर्ष से कहा जा सकता है कि यह विदेशी पेड़ हमारे लिए शैतान का पेड़ साबित हुआ होगा। कुछ शोध कहते हैं कि कोनोकार्पस भूजल पर प्रभाव डाल रहा है। कोनोकार्पस देशी प्रजाति को उगने नहीं देता और मिट्टी से पोषक तत्व ले लेता है।
इसके अलावा, एक बात जो मैंने देखी है कि तितलियां भी कभी कोनोकार्पस पर नहीं उड़ती, पक्षी भी घोंसला नहीं बनाते या गाय, बकरी जैसे जानवर भी कोनोकार्पस की पत्तियां नहीं सूंघते। इसका मतलब है कि हमारी जैव विविधता ने हमसे पहले ही कोनोकार्पस को नकार दिया था। कोनोकार्पस की जड़ें मिट्टी में इतनी गहराई तक फैलती है कि पाइप लाइनों या भवनों को नुकसान पहुंचाती हैं।
इसके वावजूद, हमने युद्धस्तर पर कोनोकार्पस लगाना जारी रखा, जिससे केवल पांच वर्षों में बीस प्रतिशत क्षेत्र में कोनोकार्पस लग गया है। इसका मतलब है कि हमने फल और ऑक्सीजन वाले पेड़ों के क्षेत्र में कोनोकार्पस का अतिक्रमण करवा दिया है। जबकि हमारे पास पर हेड ट्रीज की संख्या कम है और हम शहरीकरण को स्वीकार कर रहे हैं। जिससे हरियाली और खेती की जमीन कम है। यदि हम बची हुई जगह पर भी देशी पेड़ नहीं लगाएंगे तो स्वास्थ्य का क्या होगा? देशी पेड़ों का प्रदूषण और तापमान से सीधा संबंध है। वे हवा से विषाक्त पदार्थ अवशोषित करते हैं। साथ ही उनकी मौजूदगी तापमान को सामान्य से दो डिग्री कम करती है। जिस तरह जंक फूड से हम स्वास्थ्य खराब करते हैं, उसी तरह हम जंक ट्रीज लगाकर स्वास्थ्य खराब कर रहे हैं। ऐसे नॉननेटिव ट्रीज से जलवायु पर पड़ने वाले प्रभाव भी चर्चा का अलग विषय है। हमे खुशी है कि गुजरात सरकार ने कोनोकार्पस की बिक्री और खेती पर प्रतिबंध लगा दिया है। उम्मीद है कि अन्य राज्य सरकारें भी ऐसा करेंगी।
- विरल देसाई, (लेखक पर्यावरणविद् और 'सत्याग्रह अगेंस्ट पोल्युशन एन्ड कलाइमेट चेंज' आंदोलन के प्रणेता हैं)

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