
मोहम्मद इलियास/उदयपुर
आदिवासियों को हथकढ़ शराब से दूर रखने के लिए सरकार ने कई निजी कंपनियों से शराब बनवाते हुए घूमर, गुलाब और ढोला मारू जैसे फ्लेवर उतारे लेकिन इनके हथकढ़ से मोह भंग नहीं कर पाए। आदिवासी अब भी गुड़ व महुआ निर्मित बनाई हथकढ़ शराब बनाकर ही पीते हैं क्योंकि उसे इस शराब में अपना मन चाहा ‘करंट’ मिलता है। आदिवासी अंचल में आज भी बहुतायत मात्रा में हथकढ़ शराब बनाई जा रही है लेकिन धरपकड़ के नाम पर महज खानापूर्ति होती है।
दिनभर मजदूरी के बाद आदिवासी की शराब पीने की चाह को देखते हुए दोनों ही सरकार ने इनकी हथकढ़ छुड़वाने के लिए कई निजी कंपनियों को ठेका देकर पव्वे में शराब उपलब्ध करवाई। सरकारी ब्रांड गुलाब को छोडकऱ अन्य कंपनियों ने अलग-अलग फ्लेवर दिए। इनमें घूमर, गुलाब, ढोला मारू, प्रिंस, लॉयन के साथ नींबू फ्लेवर भी दुकान पर पहुंचा लेकिन आदिवासी को पसंद नहीं आया। गुलाब तो मजबूरीवश दुकानों पर स्टॉक में भरी पड़ी है।
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देसी पव्वे से महंगी है हथकढ़
सरकार ने अंग्रेजी शराब की तरह देसी शराब पर कीमत निर्धारित नहीं की। शराब कारोबारी देसी पव्वा सरकार से 20 से 25 रुपए उठा रहा है लेकिन वह उसे अलग-अलग क्षेत्र के अनुसार 35 से 50 रुपए के बीच मिल रहा है जबकि देसी हथकढ़ शराब आदिवासी अंचल में 50-60 रुपए में मौजूद है और उसमें आदिवासी का मनचाहा पव्वे से ज्यादा करंट है।
बनाने का भी अपना तरीका
बाजार में पशु आहार के रूप में बिकने वाले महुए को आदिवासी खरीदकर शराब बनाने के काम में लेते हैं। वह उसे ड्रमों में गुड़ के साथ मिलाकर रखता है। इन ड्रमों को नदी-नालों में भारी भरकम पत्थरों के नीचे दबाकर रखा जाता है। जब वह सडऩे लग जाता है तब मटके में भरकर भट्टियों में गर्म कर उबालते हुए शराब निकाली जाती है।
Published on:
24 Jan 2019 06:00 am
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