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Ahmedabad NEWS : इस बार बेटी ने दिया पिता को ‘कलेजे’ का टुकड़ा

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Ahmedabad  NEWS : इस बार बेटी ने दिया पिता को 'कलेजे' का टुकड़ा

Ahmedabad NEWS : इस बार बेटी ने दिया पिता को 'कलेजे' का टुकड़ा

दाहोद. सामान्यतया एक पिता अपने कलेजे के टुकड़े यानी पुत्री को पाल-पोसकर, पढ़ा-लिखाकर उसके हाथ पीले कर जीवनसाथी को सौंपता है, लेकिन एक पुत्री ने भी जरूरत पडऩे पर अपने जिगर (लीवर) का टुकड़ा अपने पिता को दिया है। सामान्यतया एक पत्नी अपने पति को, बहू अपनी सास को लीवर देती है लेकिन दाहोद जिले की एक पुत्री ने अपनी नौकरी ठुकराकर पिता को लीवर का 45 प्रतिशत टुकड़ा देकर जीवनदान दिया। फिलहाल दोनों ही स्वस्थ हैं।
दाहोद के परेल चार रास्ता क्षेत्र निवासी व रेलवे में नौकरी करने वाले 54 वर्षीय महेश कुमार की हालत बिगडऩे पर दाहोद के रेलवे अस्पताल में पीलिया का निदान हुआ। मुंबई के रेलवे अस्पताल में चिकित्सक ने महेश कुमार का लीवर क्षतिग्रस्त बताते हुए लीवर का प्रत्यारोपण करवाने की सलाह दी।
यह सलाह सुनकर परिवार के सदस्य स्तब्ध रह गए लेकिन हिम्मत हारे बिना ही महेश कुमार के इलाज की दिशा में आगे बढ़ते रहे। मुंबई रेलवे अस्पताल के चिकित्सक ने समीप के अस्पताल में उपचार करवाने की सलाह भी दी। इस कारण उन्होंने अहमदाबाद में सिविल अस्पताल परिसर स्थित एच.एल. त्रिवेदी इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रांसप्लांट में उपचार करवाने का निर्णय किया।
हालांकि उनको लीवर दान करने के लिए अन्य लोग भी आगे आए लेकिन मिलान ना होने के कारण अंतत: उनकी दोनों पुत्रियां चेतना व निकिता भी लीवर देेने के लिए तैयार हुई। बड़ी पुत्री चेतना विवाहित है इस कारण छोटी पुत्री निकिता ने अपनी बड़ी बहन को इनकार किया और वह स्वयं अपने पिता को लीवर देने के लिए तैयार हुई। पिता-पुत्री की शारीरिक जांच के बाद जून महीने में करीब 12-15 घंटे तक चले ऑपरेशन के दौरान लीवर प्रत्यारोण भी सफल रहा। निकिता का 45 प्रतिशत लीवर काटकर उसके पिता महेश कुमार को प्रत्यारोपित किया गया। इस दौरान करीब 40-50 यूनिट रक्त चढ़ाया गया।
दाहोद जिले में लीवर प्रत्यारोपण का संभवतया पहला मामला
माना जा रहा है कि दाहोद जिले में लीवर प्रत्यारोपण का यह संभवतया पहला मामला है। इस प्रत्यारोपण में हजारों रुपए खर्च हुए। बड़ी पुत्री व दामाद के साथ एकमात्र पुत्र उदय सहित परिवार के सदस्य दौड़-भाग करते रहे। रेलवे व मित्रों की ओर से भी महेश कुमार को हरसंभव सहयोग मिला। चिकित्सकों के अनुसार निकिता का लीवर करीब 2-3 महीनों में पूर्ववत होगा और महेश कुमार का लीवर भी करीब 9 महीनों में पूरा आकार लेगा। निकिता को शल्यक्रिया के 8 दिन बाद और महेश कुमार को एक महीने बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।
अस्पताल के डॉ. प्रांजल मोदी के साथ डॉ. वैभव सुतरिया, डॉ. विकास पटेल, डॉ. अंकुर वागडिय़ा की टीम ने लीवर का सफल प्रत्यारोपण किया। महेश कुमार के अनुसार उनका लीवर क्षतिग्रस्त होने की बात सुनकर परिवार के सदस्यों ने अपना-अपना लीवर देने की बात कही लेकिन छोटी पुत्री निकिता ने अधिक जिद की, उन्होंने कभी नहीं बोला था। चिकित्सकों ने उन्हें समझाया कि प्रत्यारोपण के बाद कोई परेशानी नहीं होगी, तब वे तैयार हुए।
अस्पताल में मनाया जन्मदिन
निकिता ने अपना जन्मदिन भी अस्पताल में मनाया। 29 जून को उसका जन्मदिन था, इसलिए अस्पताल में ही उसका जन्मदिन मनाया गया, उसने केक भी काटा। बी.ए., बी.एड. पाठ्यक्रम उत्तीर्ण निकिता को नौकरी के लिए अनेक प्रस्ताव मिले, लेकिन उसने पिता को जिगर का टुकड़ा देने के लिए नौकरी भी ठुकरा दी।

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