
अलवर. जिले के ज्यादातर बांधों का वर्ष 1993 के बाद ऐसा गला घुटा कि मानसून में भी जलराशि को तरस गए। साल भर बांधों का खाली रहना ही अलवर जिले के पेयजल संकट का मूल कारण है। करीब तीन दशक से पानी के संकट से जूझ रहे अलवर जिले के जनप्रतिनिधि इस लंबे समय में एक भी नहरी जल परियोजना लाने में विफल रहे और अब तक चुप्पी साधे बैठे हैं। जबकि साल भर पानी रहने के कारण सिलीसेढ़ से अलवर तक पानी लाने की योजना को राज्य सरकार से स्वीकृति दिलाना जनप्रतिनिधियों के लिए आसान है।
अलवर जिला लंबे समय से पेयजल संकट से जूझ रहा है। वैसे तो जिले में सिंचाई विभाग के 21 बड़े बांध हैं, वहीं पंचायती राज के अधीन करीब 107 छोटे- बड़े बांध है, लेकिन ज्यादातर बांध वर्ष 1993 के बाद पानी से लबालब नहीं हो सके।
बांधों में घटती गई पानी की आवक : अलवर जिले के बांधों में वर्ष 1993 तक पानी की खूब आवक होती रही, इस दौरान कई बार बांध लबालब भी हुए, लेकिन बाद में बांधों में पानी की आवक घट गई। वर्ष 2022 में भी सिंचाई विभाग के 21 में से मात्र चार बांधों में ही पानी आया।
योजना ठंडे बस्ते में : अलवर शहर सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट गहराने के बाद भी जिले के जनप्रतिनिधियों की चुप्पी नहीं टूट पाई है। इसी का परिणाम है कि मात्र 38 करोड़ रुपए लागत की यह जल परियोजना ठंडे बस्ते में चली गई है।
पांच लाख आबादी की प्यास
जिले में सिलीसेढ़ बांध में साल भर जलराशि बनी रहती है। इस पानी को सिंचाई, झील में बोटिंग व मत्स्य पालन में काम में लिया जाता है। इस बांध की जलराशि अलग- अलग उपयोग के लिए हर साल आरक्षित की जाती है। पूर्व में सिलीसेढ़ बांध के आसपास खेती योग्य जमीन होने से काश्त का रकबा ज्यादा था, प्रशासन की ओर से काश्त के इस रकबे के आधार पर ही पानी की मात्रा आरक्षित की जाती थी, लेकिन धीरे- धीरे सिलीसेढ़ बांध के पास आबादी व व्यावसायिक गतिविधि बढ़ती गई और काश्त का रकबा कम होता गया। लेकिन सिंचाई के लिए आरक्षित पानी की मात्रा में कमी नहीं की गई। अब पेयजल संकट बढ़ने पर सिंचाई के लिए आवश्यक जलराशि की मात्रा के अतिरिक्त पानी 100 एमसीएफटी को अलवरवासियों की प्यास बुझाने के लिए आरक्षित कर जलदाय विभाग ने शहरी जल योजना स्वीकृत कराने के लिए राज्य सरकार के पास भेजी है।
Published on:
03 May 2023 10:03 am

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