प्रयागराज

‘अफसरों की वफादारी संविधान से हो, नेताओं से नहीं’: इलाहाबाद हाईकोर्ट की अफसरशाही को कड़ी नसीहत

Allahabad High Court : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिल्ली यूनिवर्सिटी की स्टूडेंट एक्टिविस्ट आकृति चौधरी पर लगाए गए रासुका (NSA) को रद्द कर दिया है और इस पर एक सख्त आदेश भी जारी किया है।
2 min read
court
court : फाइल फोटो

Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत की गई नजरबंदी को रद्द करते हुए प्रशासन और पुलिस पर कड़ी टिप्पणी की है। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की खंडपीठ ने 15 पेज के विस्तृत आदेश में कहा कि सिविल सेवकों की वफादारी संविधान के प्रति होनी चाहिए, राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति नहीं।

एनएसए नजरबंदी रद्द, 5 लाख मुआवजा

कोर्ट ने 2 सितंबर को आकृति चौधरी की एनएसए नजरबंदी रद्द कर दी थी और उन्हें 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था। अब जारी विस्तृत आदेश में गौतमबुद्ध नगर प्रशासन और पुलिस की कार्रवाई को निशाना बनाया गया है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस डोजियर में सिर्फ आरोप थे, ठोस सबूत नहीं। ऐसे में जिला मजिस्ट्रेट को गहन जांच करनी चाहिए थी।

डीएम की कार्रवाई पर कड़ी आलोचना

खंडपीठ ने गौतमबुद्ध नगर की जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम की कार्रवाई को ‘उपहास के योग्य’ बताया। अदालत ने कहा कि जब अधिकारी अपने संवैधानिक शपथ की अनदेखी करते हैं तो वे ब्रिटिश साम्राज्य के दमनकारी अवशेष की तरह दिखते हैं। इससे नागरिक अशांति पैदा हो सकती है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि गलत अधिकारी उत्तर प्रदेश को ‘ऑरवेलियन डिस्टोपिया’ बना सकते हैं।

कोई हिंसा भड़काने का सबूत नहीं

आकृति चौधरी नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन से जुड़ी थीं। कोर्ट ने व्हाट्सएप चैट, वीडियो और अन्य सामग्री की जांच की। राज्य कोई ऐसा सबूत नहीं दे सका जिससे साबित हो कि उन्होंने हिंसा, दंगा या आगजनी भड़काई हो। वीडियो में सिर्फ बेहतर मजदूरी और काम की स्थिति की मांग दिख रही थी। आकृति का कोई आपराधिक इतिहास नहीं था।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार

अदालत ने कहा कि भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में शांतिपूर्ण सभा और अधिकारों के लिए आंदोलन का अधिकार शामिल है। सिर्फ शांति भंग की आशंका पर सभा रोकना सही नहीं। एनएसए असाधारण शक्ति है, इसे सामान्य आपराधिक कानून का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। नजरबंदी के आधार दोहराव, अनुमान और राय पर आधारित थे।

सेवा अभिलेख में दर्ज होगी नाराजगी

कोर्ट ने जिला मजिस्ट्रेट और डोजियर तैयार करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अपनी नाराजगी उनके सेवा अभिलेख में दर्ज करने का निर्देश दिया। इस आदेश को अफसरशाही के लिए महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है कि सत्ता के दबाव में संवैधानिक मूल्यों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

Updated on:
08 Sept 2026 05:42 pm
Published on:
08 Sept 2026 05:42 pm